11 दिन के धरने के बाद शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद माघ मेला छोड़ा
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने प्रयागराज माघ मेला 11 दिनों के धरने के बाद छोड़ दिया। बुधवार सुबह प्रेस कॉन्फ्रेंस कर उन्होंने बिना संगम स्नान किए काशी लौटने का ऐलान किया। उन्होंने कहा कि उनका मन अत्यंत व्यथित है और वे दुखी हृदय से विदा ले रहे हैं।
प्रयागराज, जिसे वे हमेशा आस्था और शांति की भूमि मानते रहे हैं, वहां हुई घटना ने उन्हें गहरा आघात पहुंचाया है।
मौनी अमावस्या की घटना से शुरू हुआ विवाद
18 जनवरी को मौनी अमावस्या के दिन संगम स्नान के लिए जाते समय शंकराचार्य की पालकी रोके जाने के बाद विवाद शुरू हुआ। शिष्यों के साथ धक्का-मुक्की और शिखा पकड़कर घसीटने के आरोप लगे।
इसके विरोध में शंकराचार्य शिविर के बाहर धरने पर बैठ गए और 11 दिनों तक शिविर में प्रवेश नहीं किया। उन्होंने बसंत पंचमी पर भी स्नान नहीं किया और प्रशासन से सार्वजनिक माफी की मांग पर अड़े रहे।
प्रशासन का प्रस्ताव और शंकराचार्य की असहमति
माघ मेला प्रशासन ने शंकराचार्य को पूरे सम्मान के साथ पालकी से संगम ले जाकर स्नान कराने का प्रस्ताव भेजा था, जिसमें फूल बरसाने की बात भी शामिल थी। हालांकि, अविमुक्तेश्वरानंद ने इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया।
उन्होंने कहा कि जब मन में दुख और आक्रोश हो, तब पवित्र जल भी शांति नहीं दे सकता। उनका आरोप था कि प्रस्ताव में घटना के लिए कहीं भी माफी नहीं मांगी गई।
आत्मा को झकझोरने वाली घटना और कड़े बयान
शंकराचार्य ने कहा कि इस घटना ने उनकी आत्मा को झकझोर दिया और न्याय व मानवता पर उनका भरोसा कमजोर हुआ है। उन्होंने राज्य सरकार को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया और कहा कि दिखावे वाला सम्मान स्वीकार करना संतों और भक्तों के अपमान को दबाने जैसा होता।
उन्होंने यह भी कहा कि किसकी जीत और किसकी हार हुई, यह समय तय करेगा और फैसला सनातनी समाज करेगा।
संत समाज में विभाजन और राजनीतिक असर
इस विवाद ने संत समाज को दो हिस्सों में बांट दिया, हालांकि तीनों शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के समर्थन में रहे। मामले का असर प्रशासन पर भी पड़ा बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट ने समर्थन में इस्तीफा दिया, जबकि बाद में अयोध्या के डिप्टी कमिश्नर ने मुख्यमंत्री के समर्थन में पद छोड़ा।
शंकराचार्य ने संकेत दिए कि यदि सनातनी समाज चाहेगा तो इस अन्याय के खिलाफ आगे भी आंदोलन जारी रहेगा।
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