संसद बजट सत्र 2026: 9 करोड़ का शोर, संवाद शून्य: जब संसद बहस नहीं, सियासी अखाड़ा बन गई!

Share Politics Wala News

संसद बजट सत्र 2026: 9 करोड़ का शोर, संवाद शून्य: जब संसद बहस नहीं, सियासी अखाड़ा बन गई!

भारतीय संसद लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्था मानी जाती है, जहां देश के सबसे अहम सवालों पर चर्चा होनी चाहिए। लेकिन हालिया बजट सत्र में जो देखने को मिला, उसने इस विश्वास को गहरी ठेस पहुंचाई।

छह घंटे की कार्यवाही पर लगभग नौ करोड़ रुपये खर्च हुए यानी हर घंटे डेढ़ करोड़ और हर मिनट ढाई लाख रुपये। सवाल यह है कि इस भारी खर्च के बदले देश को क्या मिला? न कोई ठोस नीति-चर्चा, न जनहित से जुड़े सवालों के जवाब, और न ही कोई निर्णायक बहस।

हंगामा, नारेबाज़ी और स्थगन ही इस सत्र की पहचान बन गए। संसद का यह स्वरूप करदाताओं के साथ अन्याय जैसा लगता है, क्योंकि उनकी गाढ़ी कमाई राजनीतिक शोरगुल में ज़ाया होती दिखी।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भूमिका भी इस सत्र में सवालों के घेरे में रही। परंपरा के अनुसार राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव का जवाब लोकसभा में प्रधानमंत्री द्वारा दिया जाता रहा है, लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ।

विपक्ष के हंगामे और ‘अनुचित घटना’ की आशंका का हवाला देकर उन्हें लोकसभा में न आने की सलाह दी गई। नतीजा यह रहा कि 2014 के बाद पहली बार लोकसभा में प्रधानमंत्री का जवाब दर्ज नहीं हुआ, जबकि राज्यसभा में उन्होंने 85 मिनट तक भाषण दिया।

उस भाषण का बड़ा हिस्सा विपक्ष द्वारा “कब्र खोदने” जैसे कथनों और खुद पर होने वाली आलोचनाओं पर केंद्रित रहा। इससे यह धारणा बनी कि सरकार ने लोकसभा की बहस से दूरी बनाई, जिससे संसदीय परंपरा और लोकतांत्रिक संवाद—दोनों को नुकसान पहुंचा।

विपक्ष की भूमिका भी उतनी ही विवादास्पद रही। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सरकार पर कई मुद्दों को लेकर तीखा हमला किया, लेकिन केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू के लिए ‘गद्दार’ जैसे शब्दों का सार्वजनिक इस्तेमाल संसदीय भाषा की मर्यादा के खिलाफ माना गया।

कैमरों के सामने दिया गया यह बयान बहस को मुद्दों से भटका कर व्यक्तिगत आरोपों की दिशा में ले गया। लोकतंत्र में तीखी असहमति स्वीकार्य है, लेकिन शब्दों की गरिमा टूटते ही बहस का स्तर गिर जाता है और जनता के असल सवाल पीछे छूट जाते हैं।

लोकसभा स्पीकर ओम बिरला की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठे। सदन की निष्पक्षता और गरिमा बनाए रखना स्पीकर की संवैधानिक जिम्मेदारी होती है, लेकिन इस सत्र में प्रधानमंत्री को सदन से दूर रखने की सलाह, विपक्ष पर की गई टिप्पणियां  और कुछ संदर्भों पर रोक ने उनकी निष्पक्षता की छवि को प्रभावित किया।

विपक्ष ने आरोप लगाया कि स्पीकर सरकार के दबाव में काम कर रहे हैं। वहीं प्रियंका गांधी वाड्रा, अमित शाह और जेपी नड्डा के बयानों ने भी माहौल को और गर्माहट दी, जिससे बहस मुद्दों के बजाय आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रह गई।

यह भी पढ़ें- राज्यसभा में पीएम मोदी का विपक्ष पर तीखा हमला, कहा—‘मोदी की कब्र खोदना चाहते हैं

कुल मिलाकर, यह सत्र किसी एक पक्ष की विफलता नहीं बल्कि पूरे संसदीय तंत्र की सामूहिक चूक का उदाहरण बन गया। हंगामा, वॉकआउट और निलंबन ने संसद की उत्पादकता घटाई और जनता का भरोसा कमजोर किया।

जब संसद जो जनता की आवाज़ का मंच होनी चाहिए राजनीतिक स्कोर-सेटलिंग का अखाड़ा बन जाए, तो लोकतंत्र को नुकसान तय है। करदाताओं का पैसा व्यर्थ जाता है और संसदीय व्यवस्था पर सवाल खड़े होते हैं


 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *