SIR को लेकर अर्थशास्त्री परकला प्रभाकर ने गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने इसे ‘सवर्ण हिंदू राष्ट्र’ की दिशा में कदम बताते हुए बुनियादी विरोध की अपील की।
चेन्नई में मतदाता अधिकारों को लेकर आयोजित एक कार्यक्रम में अर्थशास्त्री और लेखक परकला प्रभाकर ने स्पेशल इंटेंसिव रिविजन यानी SIR को लेकर केंद्र सरकार और चुनावी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि मतदाता सूची में चल रही यह कवायद केवल चुनावी प्रक्रिया तक सीमित नहीं है,
बल्कि इसके व्यापक राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव हो सकते हैं। प्रभाकर ने SIR को भारत को ‘सवर्ण हिंदू राष्ट्र’ की दिशा में ले जाने की कोशिश बताया। हालांकि यह उनका राजनीतिक विश्लेषण और आरोप है, जिसकी स्वतंत्र पुष्टि इस रिपोर्ट में नहीं हुई है।
प्रभाकर ने चेन्नई के पेरियार थिडल में ‘मूवमेंट फॉर रिट्रीविंग वोटर राइट्स’ की ओर से आयोजित कार्यक्रम में यह बात कही। कार्यक्रम का विषय EVM के इस्तेमाल पर रोक और SIR को खारिज करने की मांग से जुड़ा था।
उन्होंने कहा कि SIR का विरोध सिर्फ चुनावी प्रक्रिया में संभावित बदलावों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि इस पूरी प्रक्रिया के संभावित सामाजिक और राजनीतिक असर पर भी बहस होनी चाहिए।
अपने संबोधन में प्रभाकर ने दावा किया कि मतदाता सूची से बड़ी संख्या में लोगों के नाम हटाए गए हैं और इससे अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी तथा समाज के दूसरे हाशिए के वर्गों के मताधिकार पर असर पड़ सकता है। उन्होंने राजनीतिक दलों से इस मुद्दे पर एकजुट होकर विरोध करने की अपील की। उनका कहना था कि मतदाता अधिकारों से जुड़े सवाल को केवल चुनाव के समय का मुद्दा नहीं समझना चाहिए।
प्रभाकर ने EVM को लेकर भी अपनी आपत्तियां दोहराईं। उन्होंने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों से जुड़े कुछ सवाल अभी भी अनुत्तरित हैं। इसी क्रम में उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव के जनादेश को लेकर भी गंभीर दावा किया और उसे ‘चुराया हुआ जनादेश’ बताया।
यह भी उनका व्यक्तिगत राजनीतिक दावा है, जिसे स्थापित तथ्य के रूप में नहीं माना जा सकता।
SIR को लेकर देश में पहले से राजनीतिक और कानूनी बहस चल रही है। तमिलनाडु में भी चुनाव संबंधी सरकारी पोर्टल पर SIR 2026 के निर्देश, ड्राफ्ट मतदाता सूची और दावों-आपत्तियों से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराई गई है।
इससे स्पष्ट है कि SIR मतदाता सूची के पुनरीक्षण की औपचारिक प्रक्रिया का हिस्सा है, जबकि इसके राजनीतिक प्रभाव और प्रक्रिया को लेकर अलग-अलग पक्षों के बीच मतभेद बने हुए हैं।
परकला प्रभाकर की पहचान अर्थशास्त्री और राजनीतिक टिप्पणीकार के तौर पर है। वह केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के पति हैं। भारत सरकार के आधिकारिक रिकॉर्ड में भी निर्मला सीतारमण के जीवनसाथी के रूप में डॉ. परकला प्रभाकर का नाम दर्ज है।
SIR को लेकर प्रभाकर के बयान के बाद मतदाता अधिकार, चुनावी प्रक्रिया और EVM को लेकर चल रही राजनीतिक बहस को एक बार फिर नया मुद्दा मिल गया है।
अब इस बहस में मुख्य सवाल यही है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर उठाए जा रहे राजनीतिक आरोपों और चुनावी संस्थाओं की ओर से दी जाने वाली आधिकारिक जानकारी के बीच जनता के सामने तस्वीर किस तरह स्पष्ट होती है।
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