Subhash Chandra

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सुभाष चंद्रा को बड़ा झटका, 22 हजार करोड़ के कर्ज पर एनसीएलटी की रोक

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सुभाष चंद्रा के 22 हजार करोड़ रुपये के कर्ज के बदले 6.25 करोड़ के भुगतान वाले फैसले पर एनसीएलटी की पांच सदस्यीय पीठ ने रोक लगा दी।

जी ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्रा से जुड़े करीब 22 हजार करोड़ रुपये के कर्ज मामले में नया मोड़ सामने आया है। राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण की पांच सदस्यीय पीठ ने उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें चंद्रा के भारी-भरकम बकाये के बदले महज 6.25 करोड़ रुपये के भुगतान वाले पुनर्भुगतान प्रस्ताव को मंजूरी दी गई थी। ताजा आदेश के बाद फिलहाल सुभाष चंद्रा के लिए इस योजना के तहत कर्ज से राहत का रास्ता रुक गया है।

साथ ही न्यायाधिकरण ने उन्हें अपनी किसी भी संपत्ति को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से बेचने अथवा हस्तांतरित करने से भी रोक दिया है। मामले से जुड़े सभी पक्षों को नोटिस जारी किए गए हैं। खास बात यह है कि इस प्रकरण की सुनवाई के लिए न्यायाधिकरण के इतिहास में पहली बार पांच सदस्यीय पीठ का गठन किया गया है। पीठ की अध्यक्षता अध्यक्ष न्यायमूर्ति अनूपिंदर सिंह ग्रेवाल कर रहे हैं।

22 हजार करोड़ के बदले 6.25 करोड़ का प्रस्ताव

मामला सुभाष चंद्रा की व्यक्तिगत गारंटी से जुड़े दावों का है। बैंकों और वित्तीय संस्थानों के मुताबिक उन पर कुल 22,006.57 करोड़ रुपये के दावे किए गए हैं। इसके मुकाबले चंद्रा की ओर से महज 6.25 करोड़ रुपये के भुगतान का प्रस्ताव रखा गया था।

इससे पहले 25 अगस्त को न्यायाधिकरण के एक आदेश में इस योजना को मंजूरी मिली थी। हालांकि कई प्रमुख कर्जदाताओं ने इस प्रस्ताव का विरोध किया था। उनका तर्क था कि इतनी बड़ी रकम के मुकाबले इतनी कम राशि स्वीकार करना व्यावहारिक नहीं है और इससे कर्जदाताओं के हित प्रभावित होंगे। अब पांच सदस्यीय पीठ के हस्तक्षेप के बाद उस मंजूरी पर तत्काल प्रभाव से रोक लग गई है।

बैंकों की आपत्ति और मतदान का विवाद

इस मामले में एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस समेत कई कर्जदाताओं ने प्रस्ताव पर गंभीर आपत्ति जताई थी। एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस का दावा 1,322.39 करोड़ रुपये का बताया गया, जबकि प्रस्ताव के तहत उसे लगभग 38.09 लाख रुपये मिलने थे।

कुछ अन्य बैंकों और वित्तीय संस्थानों ने भी योजना के खिलाफ मतदान किया था। दूसरी ओर, योजना को मंजूरी देने के पक्ष में पर्याप्त मतदान होने का तर्क दिया गया था। इसी आधार पर पहले इसे स्वीकृति मिली थी। लेकिन अब पांच सदस्यीय पीठ ने पूरे मामले की वैधता और पहले दिए गए आदेश की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए आगे की कार्रवाई पर रोक लगा दी है।

तीन अलग-अलग राय से पैदा हुआ विवाद

इस मामले में मूल सुनवाई करने वाले सदस्यों के बीच भी एक राय नहीं बन सकी थी। पहली राय में केवल सहमत कर्जदाताओं के संदर्भ में योजना को मंजूरी देने की बात सामने आई, जबकि दूसरी राय में प्रक्रिया संबंधी कमियों के आधार पर प्रस्ताव को खारिज करने की बात कही गई।

बाद में तीसरे सदस्य को मामले में शामिल किया गया और उन्होंने कुछ बदलावों के साथ योजना को मंजूरी दी। इस तरह स्पष्ट बहुमत नहीं बनने की स्थिति पैदा हुई। इसी मतभेद के बाद न्यायाधिकरण के अध्यक्ष ने पांच सदस्यीय विशेष पीठ गठित की, जिसने अब पहले के आदेश पर रोक लगा दी है।

संपत्ति बेचने पर भी रोक, आगे क्या होगा?

ताजा आदेश का सीधा असर सुभाष चंद्रा की संपत्तियों पर भी पड़ेगा। जब तक मामले में आगे कोई आदेश नहीं आता, वह अपनी निजी या कारोबारी संपत्तियों को बेच या हस्तांतरित नहीं कर सकेंगे।

दूसरी ओर, असहमत कर्जदाताओं ने इस मामले को राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण के सामने भी उठाया है। बैंकों की ओर से दलील दी गई है कि 22 हजार करोड़ रुपये से अधिक के दावों के मुकाबले केवल कुछ करोड़ रुपये का भुगतान स्वीकार करना दिवाला कानून की मूल भावना के विपरीत होगा।

फिलहाल मामला न्यायिक प्रक्रिया में है और सुभाष चंद्रा को 6.25 करोड़ रुपये देकर कर्ज से राहत देने वाली पिछली मंजूरी पर रोक लगी हुई है।

व्यक्तिगत गारंटी का क्या है पूरा मामला?

यहां यह समझना भी जरूरी है कि 22,006.57 करोड़ रुपये की पूरी रकम सुभाष चंद्रा द्वारा व्यक्तिगत रूप से लिया गया कर्ज नहीं है। एस्सेल समूह की कंपनियों ने विभिन्न वित्तीय संस्थानों से कर्ज लिया था और उन कर्जों के लिए सुभाष चंद्रा ने व्यक्तिगत गारंटी दी थी

कंपनियों के भुगतान में चूक के बाद कर्जदाताओं के दावे उनकी व्यक्तिगत गारंटी से जुड़े मामले में सामने आए। चंद्रा की ओर से यह भी सवाल उठाया गया है कि कुछ कर्जदाताओं को उनका पैसा पहले ही लौटाया जा चुका था, इसके बावजूद उन्होंने न्यायाधिकरण के समक्ष अपने दावे पेश किए। अब पांच सदस्यीय पीठ के आदेश के बाद इस पूरे मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया पर सबकी नजर है।

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