सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह दूर करना सही नहीं। जानें ऑनलाइन सुरक्षा, सोशल मीडिया चाइल्ड मोड और निजता पर अदालत की अहम बातें।
नई दिल्ली: बच्चों के इंटरनेट और सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि ऑनलाइन खतरों से बचाने के लिए बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह दूर करना उचित रास्ता नहीं है। अदालत के अनुसार, डिजिटल दुनिया तक पहुंच बच्चों की शिक्षा, जानकारी हासिल करने, अपनी बात रखने और दूसरों से जुड़ने के लिए जरूरी हो सकती है। इसलिए उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करते समय स्वतंत्रता और निजता जैसे अधिकारों का भी ध्यान रखना होगा।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी चंद्रन की पीठ ने 15 अक्टूबर को पारित आदेश में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर विचार किया। अदालत ने संकेत दिया कि केवल उम्र के आधार पर इंटरनेट के इस्तेमाल पर रोक लगाने के बजाय ऐसी व्यवस्था विकसित करने की जरूरत है, जो बच्चों को ऑनलाइन शोषण और आपत्तिजनक सामग्री से बचा सके।
प्रतिबंध लगाने से बच्चों के लिए बढ़ सकती है मुश्किल
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई कि इंटरनेट पर पूरी तरह रोक लगाने से बच्चे ऐसे प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल कर सकते हैं, जहां निगरानी और सुरक्षा के इंतजाम कमजोर हों। इंटरनेट कई बच्चों के लिए पढ़ाई और नई जानकारियां हासिल करने का माध्यम है। दूरदराज के क्षेत्रों में रहने वाले बच्चों और विशेष जरूरतों वाले बच्चों के लिए भी डिजिटल माध्यम उपयोगी साबित हो सकता है।
अदालत ने यह भी आगाह किया कि यदि बच्चों को इंटरनेट इस्तेमाल करने के कारण सजा मिलने या डांट पड़ने का डर होगा, तो वे ऑनलाइन उत्पीड़न, धमकी, ग्रूमिंग अथवा यौन शोषण की घटनाएं परिवार या किसी भरोसेमंद वयस्क को बताने से हिचक सकते हैं। ऐसी स्थिति में उनकी सुरक्षा और मुश्किल हो सकती है। इसलिए बच्चों को दोषी मानने के बजाय उनका शोषण करने वालों और आपत्तिजनक सामग्री फैलाने वालों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई पर ध्यान देने की जरूरत है।
सोशल मीडिया पर बच्चों के लिए अलग सुरक्षा व्यवस्था
बच्चों को ऑनलाइन सुरक्षित रखने के लिए अदालत ने सोशल मीडिया पर विशेष सुरक्षा सुविधाओं की संभावना भी सामने रखी। इनमें बच्चों के अकाउंट डिफॉल्ट रूप से निजी रखना, अनजान वयस्कों के संदेशों और संपर्कों को नियंत्रित करना तथा बच्चों तक पहुंचने वाली सामग्री और विज्ञापनों की निगरानी जैसे उपाय शामिल हैं। कम उम्र के बच्चों के मामले में अभिभावकों की सहमति की पुष्टि भी एक विकल्प हो सकती है।
इन उपायों को किस तरह लागू किया जाए, इसका निर्धारण केंद्र सरकार पर छोड़ा गया है। हालांकि, अदालत की टिप्पणियों का अर्थ यह नहीं है कि सरकार बच्चों के लिए स्पष्ट रूप से हानिकारक वेबसाइटों तक पहुंच सीमित नहीं कर सकती।
उम्र की पुष्टि के साथ निजता की सुरक्षा भी जरूरी
अदालत ने उम्र आधारित पाबंदियों से जुड़े निजता के सवालों की ओर भी ध्यान दिलाया। उम्र सत्यापित करने के लिए उपयोगकर्ताओं की पहचान या संवेदनशील व्यक्तिगत जानकारी जुटानी पड़ सकती है। इससे डेटा के दुरुपयोग और निगरानी संबंधी चिंताएं पैदा हो सकती हैं। ऐसे में ऑनलाइन सुरक्षा के उपायों को बच्चों की निजता की रक्षा के साथ संतुलित करना महत्वपूर्ण होगा।
पीठ ने डिजिटल जागरूकता और उम्र के अनुरूप यौन शिक्षा की जरूरत पर भी जोर दिया। बच्चों को सहमति, सुरक्षित-असुरक्षित स्पर्श, निजी जानकारी की सुरक्षा, ऑनलाइन ब्लैकमेल और दुर्व्यवहार की पहचान तथा शिकायत करने के तरीकों की जानकारी देना जरूरी है। बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर उम्र आधारित पाबंदियों की मांग वाली एक अलग याचिका पर भी सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और संबंधित संस्थाओं से जवाब मांगा है। इससे साफ है कि बच्चों की डिजिटल सुरक्षा, इंटरनेट तक पहुंच और निजता के बीच संतुलन का मुद्दा कानूनी बहस में अहम बना हुआ है।
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