गोरखपुर के वीडियो में बच्ची द्वारा Yogi Adityanath को बुलडोज़र भेंट करने से शक्ति के पारंपरिक प्रतीक Durga से ध्वंसात्मक छवि की ओर बदलाव पर सवाल उठते हैं।
गोरखपुर से सामने आया एक छोटा-सा वीडियो इन दिनों बड़े सवालों की वजह बन गया है। वीडियो में एक लगभग पांच साल की बच्ची उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री Yogi Adityanath को खिलौना बुलडोज़र भेंट करती दिखाई देती है।
पहली नज़र में यह एक मासूम और सहज क्षण लगता है एक बच्ची, एक खिलौना, और एक मुस्कुराता हुआ नेता। लेकिन जैसे-जैसे इस दृश्य को लोग ध्यान से देखते हैं, इसके भीतर छिपे संकेतों और प्रतीकों को लेकर असहजता भी बढ़ती जाती है। यह केवल एक गिफ्ट नहीं रह जाता, बल्कि एक ऐसे समय का आईना बन जाता है जिसमें शक्ति, राजनीति और समाज के अर्थ बदलते दिख रहे हैं।
भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में शक्ति का अर्थ हमेशा से गहरा और बहुआयामी रहा है। लेकिन यह केवल बल या ताकत नहीं, बल्कि सृजन, संरक्षण और न्याय की ऊर्जा मानी जाती रही है।
देवी दुर्गा इस शक्ति का सर्वोच्च प्रतीक हैं वह जो दुष्टों का विनाश करती हैं, लेकिन साथ ही संसार की रक्षा और संतुलन भी बनाए रखती हैं। हिंदी के महान कवि Suryakant Tripathi Nirala की प्रसिद्ध कविता ‘राम की शक्तिपूजा’ में भी शक्ति का यही स्वरूप सामने आता है।
वहां राम युद्धभूमि में असमंजस में हैं, उन्हें लगता है कि शक्ति अन्याय के पक्ष में खड़ी है। तब भगवान जाम्बवान उन्हें सलाह देते हैं कि वे शक्ति की मौलिक कल्पना करें और उसकी साधना करें। राम तपस्या करते हैं, अपना सर्वस्व अर्पित करने को तैयार होते हैं, और आखिरी में शक्ति उनके भीतर समाहित हो जाती है। यह कथा बताती है कि शक्ति प्राप्त करने के लिए त्याग, धैर्य और आत्मबल की आवश्यकता होती है।
लेकिन आज के इस वीडियो में दिखाई देने वाला बुलडोज़र एक बिल्कुल अलग तरह की शक्ति का संकेत देता है। बुलडोज़र, जो मूल रूप से निर्माण और विकास का औज़ार है, पिछले कुछ वर्षों में एक राजनीतिक प्रतीक के रूप में उभरा है।
कई राज्यों में प्रशासनिक कार्रवाई के दौरान इसका इस्तेमाल अवैध निर्माण हटाने के लिए किया गया, लेकिन धीरे-धीरे यह एक संदेश देने का माध्यम भी बन गया कठोर कार्रवाई, तुरंत दंड और बिना लंबी कानूनी प्रक्रिया के न्याय की छवि। इस प्रक्रिया को लेकर समाज में अलग-अलग मत हैं। कुछ लोग इसे कानून-व्यवस्था बनाए रखने का प्रभावी तरीका मानते हैं, तो कुछ इसे न्याय की स्थापित प्रक्रियाओं से विचलन के रूप में देखते हैं।
यही वह संदर्भ है जिसमें एक बच्ची का खिलौना बुलडोज़र लेकर मुख्यमंत्री के पास जाना और उसे उपहार देना एक सामान्य घटना नहीं रह जाती। सवाल उठता है कि क्या यह बच्ची इस प्रतीक के अर्थ को समझती है? क्या उसे पता है कि बुलडोज़र आज के राजनीतिक विमर्श में किस तरह की छवि बना चुका है?
या फिर यह उसके आसपास के वयस्कों परिवार, समाज, मीडिया द्वारा निर्मित एक विचार का प्रतिबिंब है? अक्सर बच्चे वही दोहराते हैं जो वे अपने आसपास देखते और सुनते हैं। ऐसे में यह घटना इस बात की ओर इशारा करती है कि हमारे समाज में शक्ति की जो नई कल्पना बन रही है, वह अब बच्चों तक भी पहुंच रही है।
यह केवल एक वीडियो का असर नहीं है। शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुभव भी यही बताते हैं कि बच्चे आजकल ऐसे नारे और प्रतीक इस्तेमाल करने लगे हैं, जिनके पीछे का अर्थ वे पूरी तरह नहीं समझते।
कई बार वे धार्मिक या राजनीतिक नारों को उत्साह में दोहराते हैं, लेकिन उनके भीतर छिपे सामाजिक और ऐतिहासिक संदर्भ से अनजान रहते हैं। इससे यह चिंता पैदा होती है कि कहीं हम अनजाने में बच्चों के मन में शक्ति की एक ऐसी छवि तो नहीं बना रहे, जो सृजन से अधिक ध्वंस से जुड़ी हो।
भारतीय परंपरा में शक्ति का संबंध हमेशा संतुलन से रहा है। दुर्गा का स्वरूप केवल युद्ध का नहीं, बल्कि करुणा और संरक्षण का भी है। राम की कथा भी यही सिखाती है कि विजय केवल बाहरी बल से नहीं, बल्कि आंतरिक साधना और नैतिकता से मिलती है। इसके विपरीत, बुलडोज़र का प्रतीक तत्काल और प्रत्यक्ष प्रभाव का है वह जो सामने की चीज़ को तुरंत मिटा देता है। यह अंतर केवल उपकरणों का नहीं, बल्कि सोच का भी है ऐसा कहा जा सकता है।
इस पूरे प्रसंग में एक और महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या ऐसे दृश्य स्वाभाविक होते हैं या किसी तरह से निर्मित किए जाते हैं। एक छोटी बच्ची का सुबह-सुबह तैयार होकर मुख्यमंत्री से मिलना, उपहार देना और फिर उसका वीडियो बनना यह सब संयोग भी हो सकता है, लेकिन इसमें एक नियोजित तत्व की संभावना से इनकार भी नहीं किया जा सकता।
राजनीति में प्रतीकों का इस्तेमाल नया नहीं है। नेता और उनके समर्थक अक्सर ऐसे दृश्य रचते हैं जो एक विशेष संदेश दें। ऐसे में यह घटना भी एक बड़े नैरेटिव का हिस्सा हो सकती है, जहां बुलडोज़र को शक्ति, सख्ती और निर्णायक नेतृत्व के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है।
लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब यह प्रतीक समाज के गहरे सांस्कृतिक अर्थों को प्रभावित करने लगता है। अगर शक्ति की पारंपरिक, सृजनात्मक और संतुलित छवि की जगह एकतरफा, दंडात्मक और ध्वंसात्मक छवि ले लेती है, तो इसका असर समाज की सोच पर पड़ता है।
बच्चे, जो अभी दुनिया को समझने की प्रक्रिया में हैं, उसी छवि को स्वाभाविक मानने लगते हैं। उनके लिए शक्ति का अर्थ बदल सकता है वह जो बनाती नहीं, बल्कि तोड़ती है जो समझाती नहीं, बल्कि दबाती है।
यह बदलाव केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक भी है। जब किसी समाज में शक्ति को इस तरह परिभाषित किया जाता है, तो लोगों के बीच संबंध भी उसी अनुसार बदलने लगते हैं। संवाद की जगह टकराव ले सकता है, सह-अस्तित्व की जगह वर्चस्व की भावना बढ़ सकती है। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि हम रुककर सोचें हम अपने बच्चों को कैसी दुनिया और कैसी सोच दे रहे हैं?
गोरखपुर की उस बच्ची का वीडियो एक छोटा-सा दृश्य है, लेकिन उसके पीछे छिपे सवाल बहुत बड़े हैं। यह हमें हमारे समय की मानसिकता, हमारी राजनीति के तौर-तरीकों और हमारी सांस्कृतिक दिशा के बारे में सोचने पर मजबूर करता है। क्या हम शक्ति को उसी रूप में देख रहे हैं, जैसा हमारे ग्रंथों और साहित्य ने सिखाया है या हम उसे एक नए, अधिक कठोर और एकांगी रूप में ढाल रहे हैं?
यह बहस किसी एक नेता, एक घटना या एक वीडियो तक सीमित नहीं है। यह उस व्यापक बदलाव की ओर इशारा करती है जो धीरे-धीरे समाज में आकार ले रहा है। और शायद यही इस पूरे प्रसंग का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है कि हमें यह तय करना होगा कि हम शक्ति को किस रूप में स्वीकार करते हैं सृजन की शक्ति के रूप में, या ध्वंस की
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