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Imran Pratapgadhi on waqf bill-दिल्ली। कई बार कुछ कहा गया इस अंदाज़ में होता है की ये भूल जाने को दिल करता है कि वो किस सन्दर्भ में बोलै गया है। आज सदन में कुछ इसी तरह का नजारा देखने को मिला। वे सदन में वक़्फ़ संशोधन बिल के विरोध में बोल रहे थे। राज्यसभा में कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी ने अपनी पूरी बात जिस लहजे में रखी वो सुनते हुए सभापति को मुस्कुराते देखा जा सकता है। प्रतापगढ़ी का विरोध एक शेर के साथ… उन्होंने कहा कि- हम ही को कातिल कहेगी दुनिया और हमारा ही कत्लेआम होगा।
इसके बाद सधी हुए आवाज में उन्होंने जिस तरह से अपनी बात सदन में रखी वो अंदाज़ कबीले तारीफ है। जाहिर है वे वक़्फ़ संशोधन बिल के विरोध में बात कर रहे थे। उन्होंने जो बोला वो एक दस्तावेज की तरह था। ढेर साडी जानकारी के साथ। ना गली गलौज, न बदज़ुबानी।
हम शब्दशः आपको बता रहे हैं आखिर क्या कहा इमरान प्रतापगढ़ी ने-
उन्होंने कहा- हम को कातिल कहेगी दुनिया हमारा ही कत्लेआम होगा, हम ही कुए खोदते फिरेंगे हम पर पानी हराम होगा।
सभापति महोदय सन 1947 में दिल्ली की जामा मस्जिद की तारीखी सीढ़ियों पर खड़े होकर के भारत मौलाना अबुल कलाम आजाद साहब ने कहा था कि मुसलमानों कहां जा रहे हो? यह है तुम्हारा मुल्क। यहां तुम्हारे आबा अजदाद की कब्रें हैं। उस वक्त मौलाना आजाद की यह सदाएं सुन कर के लोगों ने अपने सरों की गठरिया उतार करके रख दी थीं। आज उसी दिल्ली में मौजूद देश की संसद में बिल आया है। जो हमसे उसी जामा मस्जिद की सीढ़ियों के सबूत मांगेगा।
उन्हीं सीढ़ियों के पास अपनी कब्र में सोए हुए मौलाना आजाद को फिर से कब्र से सदा देनी पड़ेगी कि यह जो कब्र है वह मेरी कब्र है। यह किसी सरकार की जागीर नहीं है। सभापति महोदय मैं जहां खड़ा हूं इसी संसद भवन के सामने सड़क के उस पार अपनी कब्र में सोए हुए भारत के पूर्व राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद की कब्र है शायद अब उस कब्र से भी सदाएं आएं कि यह कब्र मेरी कब्र है। यह सरकार की जागीर नहीं है। सभापति महोदय में वक्फ कानूनों में किए जा रहे संविधान विरोधी बदलाव के खिलाफ बोलने के लिए खड़ा हुआ हूं संविधान का आर्टिकल 14 हो 29 हो 30 हो। चीख चीख कर कहता है कि देश में सब बराबर के हकदार हैं। आर्टिकल 26 कहता है कि सबको अपने अपने मजहबी कामों के लिए मंदिर- मस्जिद- गिरजाघर- गुरुद्वारों का निर्माण करने का हक है और उसका रखरखाव का भी हक़ है। लेकिन डॉक्टर बाबा साहेब अंबेडकर के संविधान को हर दिन कुचलने वाली यह सरकार देश के मुसलमानों से नफरत में इतनी अंधी हो गई है कि खुलेआम देश की संसद में देश सरकार के माइनॉरिटी मिनिस्टर साहब और होम मिनिस्टर साहब झूठ बोलते हैं और देश को गुमराह करते हैं असत्य बोलते हैं। सरकार ने इस बिल का नाम “उम्मीद” रखा है। मंत्री जी कल से इसे देश के मुसलमानो के लिए नई उम्मीद बता रहे हैं।
नहीं मंत्रीजी ना तो यह बिल मुसलमानों के लिए नई उम्मीद है और ना ही उम्मीद की नई किरण।
सभापति महोदय भाजपा ने पूरे देश में वक्फ के नाम पर कई सारे झूठ फैलाए हैं। आइए आज उनकी सच्चाई पर बात करते हैं। वक्फ ट्रिब्यूनल को ऐसे बताया जाता है जैसे वक्फ ट्रिब्यूनल कोई मजहबी खाप पंचायत हो। सभापति महोदय जबकि सच्चाई यह है कि वक्फ ट्रिब्यूनल भी तो सरकारी न्यायिक विभाग है जिसमें सरकार द्वारा नियुक्त जज होते हैं। जिसमें प्रशासनिक अधिकारी होते हैं कहीं ऊपर से थोड़ी आ गए। सभापति महोदय देश के गृह मंत्री जी ने इसी सदन में कहा कि वक्फ ट्रिब्यूनल के फैसले के खिलाफ कोई कोर्ट नहीं जा सकता। जबकि सच यह है कि वक्फ एक्ट 1995 की धारा 839 के तहत हाई कोर्ट वक्फट्रिब्यूनल के फैसले की ना सिर्फ समीक्षा कर सकता है बल्कि उसे बदल भी सकता है। सच तो यह है कि वक्फ बोर्ड खुद अपनी जमीनों के लिए कई सारी कोर्ट में मुकदमे लड़ रहा है।
सभापति महोदय दिल्ली की जिन 123 संपत्तियों को लेकर कल माइनॉरिटी मिनिस्टर होम मिनिस्टर साहब और अभी आदरणीय नेता सदन में बात कर रहे थे आइए उनकी सच्चाई पर भी बात करते हैं। 1911 में जब अंग्रेजी हुकूमत ने कोलकाता के बजाय दिल्ली को राजधानी बनानेका फैसला किया तो रायसीना हिल्स के चारों तरफ जो मुसलमानों की ढेर सारी जमीनें थी उनको एक्वायर किया गया और लुटियन को इसकी तामीर की जिम्मेदारी सौंपी गई। सेंट्रल बिटा की तरह लुटियन जोन का मेगा प्लान तैयार हुआ लेकिन उस वक्त के मुसलमानों ने उस वक्त की अंग्रेजी हुकूमत से अपनी इबादत गाहों को बचाने के लिए के लिए लड़ाई लड़ी। मामला ब्रिटिश गवर्नमेंट तक पहुंचा तब यह तय हुआ कि वह जो धार्मिक स्थल हैं उन्हें जस का तस रहने दिया जाएगा।
इंडिया गेट के बगल वाली मस्जिद हो जाप गंज सुनहरी बाग मस्जिद हो पार्लियामेंट रोड वाली मस्जिद हो ऐसी 133 संपत्तियों केमैनेजमेंट के लिए 1913 में मुसलमान वक्फ वैलिडेशन एक्ट बना और उसके बाद एक नया शहर बसाया गया जिसे लुटियंस जोन का नाम दिया गया। फिर 1943 45 के बीच एक और समझौता हुआ। आजादी से पहले उसके तहत काफी सारी वक्फ जायदाद को सुन्नी मजलिस औका बनाकर उसकेअंडर किया गया ताकि उसकी देखरेख की जा सके।
गृह मंत्री जी दो दिन से सदन में जो बात कह रहे हैं वह दरअसल 123 संपत्तियां उसी सुन्नी मजलिस औका के तहत आती हैं। सभापति महोदय आजादी के बाद भारत में 1954 में वक्फ एक्ट लागू हुआ। जिसकी धारा नौ के तहत 1964 में केंद्रीय वक्फ काउंसिल का गठन हुआ दिल्ली की वही123 प्रॉपर्टीज को 1970 में सर्वे गजट करके गजट नोटिफाई किया गया। इसके निपटारे के लिए पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा जी के द्वारा 1974 में बर्नी कमेटी बनाई गई बर्नी कमेटी ने 1976 में इन 123 संपत्तियों को दिल्ली वक्फ बोर्ड की संपत्ति होने की रिपोर्ट सौंपी उस रिपोर्ट के आधार पर 1984 में कांग्रेस सरकार ने उन 123 प्रॉपर्टीज को दिल्ली वक्फ बोर्ड को सौंपने का फैसला किया जिसके खिलाफ विश्व हिंदू परिषद कोर्ट गई। मामला 2011 तक पेंडिंग रहा। फिर 2011 में कोर्ट ने सरकार को आदेशित किया कि इसका निपटारा करो तब 2013 में तत्कालीन यूपीए सरकार ने दिल्ली की उन्हीं 123 जायदाद को बर्नी कमेटी की सिफारिशों के मुताबिक वक्फ बोर्ड के हवाले किया यही वह प्रॉपर्टीज है जिनके नाम से गृहमंत्री जी कल से कांग्रेस को कोस रहे हैं।
फिर आई 2014 में भाजपा की सरकार जो तब से इन जमीनों को हड़पने की साजिश कर रही है। जिस बिल को मुसलमानों के हुकूक की हिफाजत करने वाला बिल बताया जा रहा है उसी को पेश कर के लिए और उस पर बात करने के लिए लोकसभा में भाजपा सरकार के पास एक भी मुस्लिम सांसद नहीं है। जिस वक्त मैं लोकसभा कह रहा हूं सुना करिए जिस वक्फ बिल को मुस्लिम महिलाओं को हक दिलाने वाला बताया जा रहा है उसे संसद में पेश करने वाली पार्टी के पास ना तो राज्यसभा में ना लोकसभा में ना देश की किसी विधानसभा में एक भी मुस्लिम महिला सदस्य नहीं।
कल किरण रिजू जी कह रहे थे कि रेलवे की जमीनें, देश की जमीनें हैं। डिफेंस की जमीनें देश की जमीनें हैं। हां, मंत्री जी हैं बिल्कुल हैं यह जो वक्फ की जमीने हैं यह हमारे पुरखों ने धार्मिक कामों के लिए डोनेट किया है। तो हम भी तो इसी देश के नागरिक हैं। हम भी तो इसी देश के बेटे हैं। तो वक्फ की जमीनें भी तो इसी देश की जमीनें हैं उनको पराया क्यों बोलते हैं आप। सभापति महोदय अफाक उल्ला खान जब फैजाबाद की जेल में फांसी के फंदे पर झूल रहे थे तो इसी देश की जमीन के लिए झूल रहे थे ना। सभापति महोदय अंडमान की जेल में काला पानी की सजा काटकर अपनी जान देने वाले मौलाना फजले हक खैराबादी हो या शेर खान अफरीदी हो वह भी तो इसी जमीन के लिए अपनी जान दे रहे थे ना। सभापति महोदय पाकिस्तान के खिलाफ लड़ते हुए अपनी जान देने वाले महावीर चक्र विजेता ब्रिगेडियर उस्मान हो या पाकिस्तान के पैटर्न टैंक उड़ाने वाला परमवीर चक्र विजेता वीर अब्दुल हमीद हो वो भी तो इसी जमीन के लिए अपनी जान दे रहा था ना और
