दुनिया एक बार फिर गरीबों की ज़िंदगी के भरोसे है, कोरोना ने ये साबित कर दिया कि सबको समानता का अधिकार जरुरी, कोरोना के जरिये मार्क्सवाद को समझिये
सुनील कुमार (संपादक डेली, छत्तीसगढ़ )
बुरा वक्त बहुत सी अच्छी नसीहतें लेकर आता है। बहुत सी नई संभावनाएं भी। इस बात को हमने इसी जगह कई मुद्दों को लेकर बार-बार लिखा है। एक बार फिर इस पर लिखने का मौका आया है। आज कोरोना के खतरे को देखते हुए दुनिया के बहुत से देशों ने कुछ देशों की पहले शुरू की गई एक पहल को आगे बढ़ाने का फैसला लिया है कि अपनी सबसे गरीब आबादी को एक न्यूनतम वेतन या भत्ता दिया जाए। ताकि उसका जीवन स्तर सुधरे। एक-एक करके समझदार देश आगे बढ़ते जा रहे है। यह बात सबको समझ में आ रही है कि देश के एक तबके को बहुत गरीबी में रखने का एक मतलब यह भी होता है कि
उसे बीमारियों के खतरे में छोड़ देना।
फिर ऐसा नहीं है कि देश की गरीब आबादी किसी टापू पर रहती है। उसकी बीमारी से बाकी लोगों को खतरा नहीं होगा। बाकियों को भी ऐसे गरीब और बीमार से खतरा रहेगा। कोरोना जैसी अदृश्य बीमारी का खतरा तो कहीं नजर आता भी नहीं है। जब किसी के बदन में कोरोना घुस जाता है। संक्रमित कर चुका रहता है,तभी जाकर उसका पता लगता है।
इसलिए यह बात साफ है कि जब तक दुनिया में आबादी का एक हिस्सा, जो कि हिन्दुस्तान में तकरीबन आधी आबादी है, वह खतरे में रहेगा तो बाकी आधी आबादी भी खतरे में रहेगी। हमने कुछ अरसा पहले इसी संदर्भ में मशहूर शायर जॉन एलिया की लाईनें लिखी थीं- अब नहीं कोई बात खतरे की, अब सभी को सभी से खतरा है..।
यह बात अब सब पर लागू हो रही है। बहस के लिए तो यह कहा जा सकता है कि गरीब तबका तो अमीर तबके के बिना जिंदा रह लेगा। अमीर तबका गरीब नौकर-चाकर मिले बिना, कामगार मिले बिना जिंदा नहीं रहेगा। गरीबों ने तो पिछले दो महीनों में हिन्दुस्तान की सड़कों पर एक अंतहीन पैदल सफर करके दिखा दिया है कि वे तो जिंदगी की आंच में तपकर फौलाद बने हुए लोग हैं।
यह अलग बात है कि अपने आलीशान घरों में बैठे संपन्न लोगों की जिंदगी मुश्किल हुई है। फिर जिस तरह आज दुनिया के सबसे संपन्न और सबसे विकसित देशों में, न्यूयार्क जैसे सबसे अधिक चिकित्सा सुविधा वाले शहर में एक अकेले कोरोना के गिराए दिन भर में सैकड़ों लाशें गिरी हैं, उनको देखते हुए लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि यह तो विज्ञान या कुदरत का एक नमूना है। ऐसे और भी नमूने आ सकते हैं। सबसे संपन्न चिकित्सा सुविधा वाले देशों के रईस भी मारे जा सकते हैं। इसलिए आगे का रास्ता कुल एक है, धरती पर सहूलियतों की एक न्यूनतम बराबरी की गारंटी।
ऐसा लगता है कि कार्ल मार्क्स का मार्क्सवाद पूरी दुनिया में गिनी-चुनी जगहों पर कामयाब हुआ। बचा हुआ है। बाकी जगहें या तो पूंजीवाद की गिरफ्त में हैं, या फिर पूंजीवाद को मर्जी से अपनाया हुआ है। ऐसे तमाम लोगों को इस एक कोरोना से यह बात समझ तो आ चुकी है कि जब तक पूरी आबादी खतरे के बाहर नहीं रहेगी कोई भी महफूज नहीं रहेंगे।
अब देखना यह है कि यह ताजा-ताजा समझ कोरोना के रहते हुए जनकल्याण के फैसलों में तब्दील होती है, या फिर यह श्मशान वैराग्य की तरह तेरहवीं के पहले चल बसेगी, और एक बार फिर गरीब अपने हाल पर जीने, और मरने के लिए छोड़ दिए जाएंगे? ऐसा लगता है कि दुनिया के संपन्न, पूंजीवादी, और मार्क्सवाद-विरोधी तबकों के बीच भी उस बात को लेकर एक खलबली तो मची हुई है कि एयरकंडीशंड कमरों में अगर चैन से सोना है, तो गरीबों की झोपड़पट्टियों को भी कम से कम इंसानों के जीने लायक रिहायशी इलाकों में तब्दील करना होगा।
अब यह बात सोची-विचारी तो जा रही है कि क्या हर गरीब को इलाज का एक हक देना तय नहीं किया गया, तो फिर दुनिया का कोई इलाज अमीरों को बचा भी नहीं सकेगा। अब यह बात सत्ता के बंद कमरों के टेबिलों पर तो है कि हर किसी को एक न्यूनतम आय दी जाए ताकि वे ठीक से जिंदा रह सकें, और वे कोरोना या अगली किसी बीमारी का डेरा न बनें।
लोगों को याद होगा कि पिछले आम चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने उस वक्त नोबल पुरस्कार न पाए हुए अर्थशास्त्री अभिजीत बैनर्जी की सलाह पर चुनावी घोषणापत्र में एक न्याय योजना की घोषणा की थी जिसमें न्यूनतम आय योजना के अक्षरों से न्याय योजना नारा बनाया गया था, और पांच करोड़ परिवारों को साल में 72 हजार रूपए देने का वायदा किया गया था।
यह देश की सबसे गरीब 20 फीसदी परिवार होते हैं, और कांग्रेस ने अभिजीत बैनर्जी की राय पर यह कार्यक्रम घोषणापत्र में जोड़ा था। कांग्रेस सत्ता में नहीं आई, और इस योजना की नौबत नहीं आई, इसलिए इसका नफा-नुकसान अभी गिन पाना मुमकिन नहीं है, लेकिन इस साल भर में बाकी दुनिया के सभ्य और विकसित लोकतंत्रों में बहुत से देशों ने न्यूनतम आय की ऐसी योजनाएं चालू की हैं, और समाज में उनका फायदा भी देखा है।
एक दिलचस्प बात यह है कि दुनिया के गरीब लोगों की तरफ तो नजरें गई ही हैं, उनसे भी अधिक बेजुबान जो जानवर हैं, उनकी तरफ भी नजर गई है। इंसान की नस्ल पैदा होने के बाद से पिछले दो महीने शायद पहले ऐसे रहे होंगे जब पशु-पक्षियों को, मछलियों को इतना कम खाया गया है।
अब एक बात यह भी उठ रही है कि कुछ जानवरों से कोरोना और ऐसी दूसरी बड़ी बीमारियां शुरू हुई हैं तो क्या मांस खाना बंद कर दिया जाए, या कम कर दिया जाए? बेबस इंसानों की फिक्र के साथ-साथ अब खाए जाने वाले प्राणियों की भी एक फिक्र हो रही है कि किसी चमगादड़ की आह से अगर कोरोना शुरू हो सकता है तो इस नौबत से कैसे बचा जाए?
कोरोना ने पूंजीवाद, तानाशाह, और बाहुबली लोकतंत्र को उनकी औकात दिखा दी है। कोरोना जॉन एलिया के शेर को पढ़कर आया है, और उसी पर अमल करते हुए उसने यह नौबत खड़ी कर दी है कि सबको सबसे खतरा है। बड़े-बड़े घरों में काम न करने की आदी सेठानियों को बर्तन मांजने की नौबत इसी कोरोना ने ला दी है। इसी कोरोना ने कफन-दफन से लेकर अंतिम संस्कार, कपालक्रिया, और अस्थि विसर्जन जैसी सदियों की परंपराओं को तहस-नहस कर दिया है। आल-औलाद अपने मां-बाप का अंतिम संस्कार नहीं कर पा रहे हैं। श्मशान में एक के ऊपर एक इतने अंतिम संस्कारों की अस्थियां जमा हो रही हैं कि उनके बीच कोई चाहकर भी अपने पुरखे की अस्थियां छांट न सके।
ऐसी दुनिया में आज रास्ता एक ही है कि सबसे कमजोर, सबसे बेबस, और सबसे वंचित इंसान को न्यूनतम आय और बराबरी की चिकित्सा दोनों मुहैया कराई जाए। अगर कोरोना दुनिया को इस तरफ आगे बढऩे के लिए मजबूर कर सकता है, तो हमारा ख्याल है कि कोरोना मार्क्सवादी है, और वह चीन की किसी प्रयोगशाला में न भी बना हो, वह एक वामपंथी विचारधारा लेकर आया है, और दुनिया में एक अभूतपूर्व बराबरी की संभावना भी लेकर आया है।
एक वाक्य में कहें तो यूबीआई और यूएचएस की नौबत आ गई है। हमने इस भाषा में इसलिए लिखा है कि भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ऐसी भाषा सुहाती है, वरना आम लोगों के समझने के लिए यह बताना जरूरी है कि यूनिवर्सल बेसिक इन्कम, और यूनिवर्सल हेल्थ सर्विस आज की जरूरत है, और जो अंग्रेजी के इतने शब्दों से सबक न ले सकें, उनके लिए तो जॉन एलिया ने लिखा ही था- अब नहीं कोई बात खतरे की, अब सभी को सभी से खतरा है..।
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