क्या दान की मशीनों से मरीजों की ज़िंदगी पर ट्रायल होगा ?


 

गुजरात में बने स्वेदशी वेन्टीलेटर्स पर उठे सवाल, मीडिया और इस मशीन के पीछे की राजनीति और मरीजों से खिलवाड़ जैसे कई सवाल अभी भी बाकी, भले सरकार ने कह दिया हो ये मशीनें खरीदी नहीं दान में मिली है.

पंकज मुकाती 

वेंटिलेटर्स यानी ज़िंदगी की वापसी की अंतिम उम्मीद। गुजरात के राजकोट की एक कंपनी ने स्वदेशी वेंटिलेटर्स बनाये। खुद गुजरात के मुख्यमंत्री ने इसे मेक इन इंडिया की कामयाबी बताया। इसका स्विच ऑन भी रुपानी जी ने ही किया। करीब 5000 मशीनों के आर्डर की बात भी आई। इसमें से 1100 अस्पतालों में पहुंचे भी। दो सप्ताह बाद डॉक्टर्स ने कहा कि ये उपयोगी नहीं। ज़िंदगी की इस अंतिम उम्मीद पर सवाल उठे।
गुजरात के फिर देश के मीडिया में स्वदेशी वेंटिलेटर्स पर सवाल उठे। अब सरकार का पक्ष आया कि हमने कभी इसे वेन्टीलेटर्स कहा ही नहीं। ये धमन-1 है। फिर ये हॉस्पिटल कैसे पहुंचे। सरकारी स्पष्टीकरण आया। ये ख़रीदे नहीं गए दान में मिले हैं।

अब सवाल ये है कि जब बड़ी संख्या में लोग ज़िंदगी और मौत से जूझ रहे हो, तब क्या हम दान में मिली बिना टेस्टिंग वाली मशीनों से उनका इलाज करेंगे ? क्या हम किसी को भी दान के नाम पर अपनी मशीनों के ट्रायल की अनुमति दे देंगे? क्या रुपानी सरकार राजकोट की इस फर्म को मरीजों पर क्लीनिकल ट्रायल का मौका दे रही थी? वैसे ये प्रयोग का अच्छा वक्त है। दान के नाम पर दवाएं और मेडिकल किट भी ट्रायल हो सकते हैं। आखिर जब सैकड़ों जाने जा रही है, कुछ और सही। आमतौर पर इंसानों की ज़िंदगियों की कीमत पर ही देश और राजनीति आत्मनिर्भर होते हैं।

मीडिया में खबरों के बाद इस कंपनी को क्लीन चिट देने का अभियान चल पड़ा। राजकोट के इस पराक्रमी परिवार के पुराने दान के किस्से बताये जाने लगे। पर सबसे बड़ा सवाल ये है कि ये वेंटिलेटर्स या धमन की टेस्टिंग कहां हुई ? इसको देश की किस मेडिकल बोर्ड या संस्था ने स्वीकृति दी ? खबरों के मुताबिक इसकी सिर्फ एक व्यक्ति पर टेस्टिंग की गई। क्या ये पर्याप्त है? क्या बिना किसी बोर्ड की परमिशन या टेस्टिंग के कोई भी मशीन मरीज के इलाज में उपयोग की जा सकती है ? शायद नहीं।

एक वर्ग का कहना है कि ये बेहद छोटी मशीन है उसमे कैसी परमिशन। मान लिया सरकार ने इस पर पैसा खर्च नहीं किया ये दान में मिली मशीने हैं। पर क्या सिर्फ पैसा खर्च न होने से बाकी सभी सवाल भी दान खाते में डाल दिए जायें? लेनदेन के ऑडिट के ऊपर सोशल ऑडिट भी जरुरी है।

पैसा खर्च न होने की दलील के अलावा एक और राष्ट्रवादी तरीका है ऐसे मामलों से निपटने का। वो भी इस समय देश में खूब चलन में है।वो तरीका है ऐसा प्रचारित करना कि फंडिंग के जरिये कुछ देशद्रोही स्वदेशी के खिलाफ ऐसी खबरें चला रहे हैं। इस मामले में भी ये कोशिश जारी है।

कहा जा रहा है कि इस खबर या इस मशीन पर सवाल के पीछे विदेशी लॉबी सक्रिय है। विदेशियों ने साजिशन इस मशीन पर सवाल मीडिया के द्वारा प्लांट किये। इसके पीछे भारत को वेन्टीलेटर्स के क्षेत्र आत्मनिर्भर होने से रोकना भी है। संभव है ये हुआ होगा ? मान लेते हैं ये आत्मनिर्भर भारत को कुचलने की साजिश है। फिर भी बेसिक टेस्टिंग नॉर्म्स तो फॉलो होने ही चाहिए। आखिर जनता की ज़िंदगी और मौत का सवाल है। उम्मीद है देश का धमन चलता रहेगा।


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