पंजाब में अकेले चुनाव लड़ेगी BSP, मायावती का बड़ा ऐलान; गठबंधन से बनाई दूरी
बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने पंजाब विधानसभा चुनाव को लेकर पार्टी की रणनीति स्पष्ट कर दी है। बसपा पंजाब में किसी अन्य राजनीतिक दल के साथ गठबंधन करने के बजाय अपने दम पर चुनावी मैदान में उतरेगी।
मायावती ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की तरह पंजाब में भी अकेले चुनाव लड़ने की नीति अपनाने की बात कही है। पार्टी का मानना है कि गठबंधन की राजनीति से बसपा के वोट प्रतिशत और सीटों पर प्रतिकूल असर पड़ता है, जिसका प्रभाव कार्यकर्ताओं के मनोबल पर भी पड़ता है।
मंगलवार को मायावती ने पंजाब में पार्टी संगठन और आगामी चुनाव की तैयारियों की समीक्षा की। बैठक में प्रदेश में बसपा का जनाधार बढ़ाने से लेकर बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने पर चर्चा हुई।
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— Mayawati (@Mayawati) August 25, 2026
मायावती ने पदाधिकारियों से चुनावी तैयारियों का फीडबैक लिया और जिन क्षेत्रों में संगठन कमजोर है, वहां सुधार के निर्देश दिए। उन्होंने कार्यकर्ताओं से विरोधी दलों की राजनीतिक रणनीतियों का मुकाबला करते हुए बेहतर चुनावी परिणाम के लिए अभी से तैयारी में जुटने को कहा।
बसपा प्रमुख ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में होने वाले आगामी विधानसभा चुनावों का भी जिक्र किया। उन्होंने पार्टी पदाधिकारियों से उम्मीदवारों के चयन में विशेष सावधानी बरतने और ईमानदार तथा जनता के बीच सक्रिय चेहरों को प्राथमिकता देने को कहा।
मायावती ने पंजाब की सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी के साथ कांग्रेस और भाजपा की नीतियों की आलोचना करते हुए दावा किया कि बसपा अपनी ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ और आंबेडकरवादी नीतियों को लेकर जनता के बीच जाएगी।
बैठक में पंजाब में पार्टी के आगामी कार्यक्रमों की तैयारियों पर भी चर्चा की गई। मायावती ने 9 अक्टूबर को बसपा संस्थापक कांशीराम की पुण्यतिथि पर आयोजित होने वाले कार्यक्रम को व्यापक स्तर पर आयोजित करने के निर्देश दिए।
इसके अलावा अगले वर्ष 15 जनवरी को होने वाले कार्यक्रम के लिए पंजाब इकाई को संगठनात्मक और आर्थिक स्तर पर पहले से बेहतर तैयारी करने को कहा गया।
बसपा का अकेले चुनाव लड़ने का फैसला पंजाब की सियासत में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पार्टी ने पिछला पंजाब विधानसभा चुनाव शिरोमणि अकाली दल के साथ गठबंधन में लड़ा था।
अब गठबंधन से दूरी बनाकर मायावती ने स्पष्ट संकेत दिया है कि बसपा अपने परंपरागत सामाजिक आधार को स्वतंत्र रूप से मजबूत करने की रणनीति पर आगे बढ़ेगी। आगामी चुनाव में यह रणनीति पार्टी के वोट प्रतिशत और सीटों में कितना बदलाव ला पाती है, इस पर राजनीतिक दलों की नजर रहेगी।
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