-politicswala report
-कौन कर रहा अमानत में खयानत
-कैसे मंदिर प्रबंधक समिति को नहीं लगी इसकी भनक
-कहीं से भी नहीं संतोषजनक जवाब
-कलेक्टर नीरज सिंह ने यूडीए को पत्र भेजकर जमीन अधिग्रहण मुक्त करने के निर्देश दिए
ujjain 45 beegha land उज्जैन। उज्जैन महाकाल मंदिर की 45 बीघा जमीन उज्जैन विकास प्राधिकरण की एक स्कीम में चली गयी। आश्चर्य की बात यह है कि पूरी प्रक्रिया एक तरफ चलती रही और दूसरी तरफ मंदिर प्रबंधक समिति को इस बात की भनक तक नहीं लगी। या यूं कहें कि सबकुछ मालूम होने पर भी जिम्मेदार खामोश रहे। जबकि नियमों के मुताबिक मंदिर की जमीन को आयुक्त की पूर्व मंजूरी के बिना बेचा, गिरवी रखा या हस्तांतरित नहीं किया जा सकता। नियम, धाराएं और कार्रवाई का तरीका सबकुछ है लेकिन जिस तरह से इस प्रक्रिया को अंजाम दिया गया है वह व्यवस्था पर कई सवाल खड़े करती है। आखिर महाकाल की अमानत में खयानत की हिम्मत कौन कर सकता है।
पूरा मामला इस प्रकार है कि महाकाल मंदिर की निमनवासा में दान की गई 45 बीघा जमीन उज्जैन विकास प्राधिकरण (यूडीए) की टीडीएस-4 स्कीम में चली गई। यह अधिग्रहण महाकालेश्वर मंदिर अधिनियम की धारा-12 की उपधारा-2 का उल्लंघन है, जिसके तहत मंदिर की अचल संपत्ति को आयुक्त की पूर्व मंजूरी के बिना बेचा, गिरवी रखा या हस्तांतरित नहीं किया जा सकता।
उस समय मंदिर प्रबंध समिति के सारे पदाधिकारियों का कहना है कि उन्हें जमीन के यूडीए की स्कीम में आने की कोई जानकारी नहीं थी। समिति में उस समय अध्यक्ष आशीष सिंह (तत्कालीन कलेक्टर), गणेश धाकड़ (तत्कालीन प्रशासक) और सदस्य राजेंद्र शर्मा, राम पुजारी व प्रदीप गुरु थे।
9 सितंबर 2022 को यूडीए ने नगर एवं ग्राम निवेश अधिनियम की धारा-50 (2) के तहत टीडीएस-4 की सूचना प्रकाशित की थी। इसमें महाकाल मंदिर की 45 बीघा जमीन भी शामिल थी। उस वक्त यूडीए के कार्यकारी सीईओ आशीष पाठक और उज्जैन संभाग के आयुक्त संदीप यादव (यूडीए अध्यक्ष) थे। अब इनका कहना है कि यूडीए की तरफ से सब नियम से हुआ होगा, लेकिन मंदिर प्रबंधन की क्या भूमिका रही, यह याद नहीं।
-सवाल यह उठा रहे हैं कि टीडीएस-4 फाइनल होने में करीब 1 साल 4 माह लगे । इस दौरान किसी को कैसे पता नहीं चला कि मंदिर की जमीन अधिगृहीत हो गई?
-आखिर जिम्मेदार अफसर क्या कर रहे थे?
-अब जिम्मेदार जमीन वापस ले लेंगे तो क्या दोषियों पर कार्रवाई करेंगे?
6 दिसंबर 2023 को महाकाल मंदिर के नाम से यूडीए का अनुमोदन पत्र भेजा गया था। इस पर यूडीए सीईओ और मंदिर प्रशासक दोनों के रूप में संदीप कुमार सोनी के साइन हैं। सोनी का कहना है कि वह दोनों पदों पर थे, इसलिए यह स्वाभाविक है। लेकिन इस बात का जवाब नहीं है कि उन्होंने मंदिर प्रबंध समिति को इस अनुमोदन की जानकारी क्यों नहीं दी?
मामला सामने आने पर कलेक्टर नीरज सिंह ने यूडीए को पत्र भेजकर जमीन अधिग्रहण मुक्त करने के निर्देश दिए। कलेक्टर ने कहा- हमने यूडीए के बोर्ड को पत्र भेजा है कि मंदिर की जमीन का अधिग्रहण नहीं किया जाए। इस सारे मामले में कई रोचक तथ्य भी सामने आ रहे हैं कि 14 दिसंबर 2024 को मंदिर प्रबंधन ने जमीन की तार फेंसिंग के लिए भी कलेक्टर को नोटशीट भेजी थी। सवाल यह है कि अगर यूडीए ने इस जमीन का अधिग्रहण कर लिया, तो मंदिर प्रबंधन फेंसिंग क्यों करवा रहा है?
इस 45 बीघा जमीन के तजा मामले के साथ ये चर्चा भी आम है कि उन जमीनों का क्या होता है जो महाकाल के भक्त पूरी श्रद्धा और निष्ठा से महाकाल के चरणों में अर्पित करते हैं। प्रदेशभर में महाकाल को 84.132 बीघा जमीन दान स्वरूप मिली है। इसे बेचकर उज्जैन में ही जमीन खरीदने का प्लान बनाया गया था। तो क्या हुआ इस दान की जमीन का।
पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने इस मामले में अपनी X पोस्ट पर लिखा है –
भगवान महाकाल पूरे देश की आस्था का केंद्र हैं। देश-विदेश से श्रद्धालु आकर भगवान महाकाल को चढ़ावा चढ़ाते हैं और अपनी ओर से कुछ न कुछ दान पुण्य करते हैं। लेकिन भाजपा की सरकार ने भगवान महाकाल की 45 बीघा ज़मीन पर ही क़ब्ज़ा कर लिया। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ उज्जैन विकास प्राधिकरण ने नियमों को ताक पर रखकर महाकाल मंदिर की 45 बीघा ज़मीन को अपने क़ब्ज़े में ले लिया।
यह कृत्य करोड़ों हिंदुओं की आस्था से खिलवाड़ है और उनकी धार्मिक भावनाओं का अपमान है। आख़िर कोई सरकार इतनी धर्म विरोधी कैसे हो सकती है कि भगवान की ज़मीन ही हड़प ले। मैं राज्य शासन से माँग करता हूँ कि तत्काल महाकाल की पवित्र भूमि मंदिर को वापस की जाए और इस तरह का फर्जीवाड़ा करने वाले अधिकारियों पर क़ानून के मुताबिक़ सख़्त से सख़्त कार्रवाई की जाए।
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