धुरंधर के आगे … कराची में ल्यारी, भोपाल में न्यू ल्यारी

Share Politics Wala News

धुरंधर के आगे … कराची में ल्यारी, भोपाल में न्यू ल्यारी

Share Politics Wala News

#विजयमनोहरतिवारी

“ईरानी नाम के डेरे में ये ईरानी हैं मगर ईरान मूल के अग्निपूजक नहीं। अग्निपूजा से पिंड छूटे सदियाँ हो गईं और अब आग को पूजते नहीं, आग से खेलते हैं। खुद भले ही न झुलसें आसपास वालों को झुलसाने में सिद्धहस्त हैं।’

“धुरंधर’ में फिल्माचार्य आदित्य धर द्वारा कराची के ल्यारी की महिमा धूम-धड़ाके से गाई गई है। वतन में जब चमन ही चमन है तो ल्यारी अलग कैसे हो सकती है। मगर भोपाल के क्राइम रिपोर्टरों की खबरों ने कराची के ल्यारी की याद अचानक दिला दी। भोपाल में ईरानी डेरे से बहकर आ रही खबरों से लग रहा है कि यह भी एक “न्यू ल्यारी’ ही है। इसे “मिनी ल्यारी’ का ताज तो एक मिनट की देर किए बिना दे दिया जाना चाहिए। ल्यारी का भोपाल संस्करण-“ईरानी डेरा।’
ईरानी डेरा सुनकर या पढ़कर रक्तचाप सामान्य बना रहता है। हो सकता है अफगानी डेरे भी कहीं हों। मगर पाकिस्तानी डेरा जैसा कुछ होता तो अब तक मिट्टी में मिल चुका होता। पाकिस्तानी डेरा सुनकर रक्तचाप सामान्य नहीं रह सकता था और तब पुलिस को भी महीनों की तैयारी के बाद दाखिल होने जैसी विलंबित कार्रवाई न करनी होती। सब कुछ तत्काल प्रभाव से होता। भारत में पाकिस्तानी डेरा? तौबा-तौबा। ईरानी डेरा चलेगा। दूरदराज नहीं, राजधानी में ही चलेगा। चलेगा नहीं, दौड़ेगा।
कम लोगों को पता होगा कि उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखंड, हरियाणा, गुजरात या महाराष्ट्र तक की पुलिस जब किसी ईरानी का पता ढूँढते हुए भोपाल आती है तो यहाँ पुलिस को उदासीन अनुभव करती है। हफ्तों यहाँ डेरा डाले रखने के बावजूद ईरानी डेरे की तरफ लोकल पुलिस की कोई मदद मिलती नहीं दिखती। अक्सर वह खाली हाथ लौटने को मजबूर होती है।
ईरानी डेरा पुलिस की दुखती रग जैसा है। डेरे के डरावने गुणधर्म लोकल पुलिस से बेहतर कौन जानता है। वह जानती है कि दस-बीस पुलिस वालों का वहाँ जाना खतरे से खाली नहीं है। दिन के वक्त तो खुदा बचाए। डेरे में गए नहीं कि क्षतिग्रस्त होकर ही उल्टे पाँव भागना होगा। इसलिए पूरी प्लानिंग और तैयारी के साथ ही डेरे का रुख किया जाता है, जैसे एलओसी पर जा रहे हों।
अब देखिए, दर्जनभर थाने के 400 पुलिसवाले सुबह 4 बजे का ब्रह्ममुहूर्त निकालकर डेरे में मंगल प्रवेश किए और मीडिया के माइक से लेकर बिना नंबर की महंगी बाइक तक क्या-क्या नहीं निकला? राज्य के लिए अब चंबल या नक्सल चुनौती नहीं हैं। चुनौती राजधानी की नाक के नीचे है-न्यू ल्यारी। फिलहाल पुलिस ने बता दिया है कि वह भी किसी से कम नहीं है। उसे अपनी ताकत का पता है।
हर बुरी बात में भी कोई अच्छाई छिपी होती है इसलिए हमें केवल सकारात्मक होना चाहिए। ईरानी डेरे में पुलिस से टकराने कोई फिदायीन नहीं आते, खवातीन आती हैं। खवातीनों की यह भूमिका काबिले-गौर है। बिना महिला बाल विकास विभाग की किसी कार्यशाला या कार्यक्रम के महिला सशक्तिकरण की यह बेजोड़ मिसाल है।
यह एक अलग प्रकार का “स्व-सहायता समूह’ है, जिस ओर शायद ही किसी मंत्री या पीएस या कमिश्नर का ध्यान गया हो। जब शासन की किसी योजना के सहयोग के बिना महिलाएँ इतनी जागरूक, सक्रिय और समाज में अग्रणी भूमिका में आ धमक सकती हैं तो यह शासन की योजनाओं पर भी सवाल है।
राजधानी की महिला पत्रकारों को टीवी के लिए ईरानी डेरे की जांबाज खवातीनों के “टॉक शो’ स्टुडियो में नहीं, लोकेशन पर ही करने चाहिए। प्रिंट की रिपोर्टर उनके लंबे इंटरव्यू कर सकती हैं। इस सशक्तिकरण के पीछे कौन है? किससे ट्रेनिंग लेती हैं? परदे और हिजाब के दायरे से बाहर आकर पुलिस के मुकाबले कैसे एकजुट होती हैं? वर्दी से निडर रहने की सीख कौन देता है? साहस कहें या दुस्साहस मगर ये धुआंधार संस्कार कहाँ से आते हैं? पुरुष प्रधान समाज में खवातीनों की ऐसी भूमिका पर लिखने और दिखाने के लिए कंटेंट की कमी नहीं हैं। ऐसा पुरुष प्रधान समाज जहाँ खवातीनों को आगे कर मर्द पतली गली पकड़ने का हुनर रखते हैं।
तो डेरे के मर्दों के क्या कहने? हमारे लिए तो केवल कहने के लिए कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है मगर इसे आचरण में ईरानी डेरे वाले लेकर आए हैं। कौन सा सूबा है, जहाँ जाकर भोपाल की इस न्यू ल्यारी यानी ईरानी डेरे के बहादुरों ने कारीगरी न दिखाई हो। कितनों पर कितने के ईनाम हैं? कितनों पर कितने राज्यों के कितने थानों में कैसे-कैसे केस हैं? किन राज्यों की कितनी पुलिस कब से पुलिस के रेलवे स्टेशन के होटलों में वक्त काटती रही है ताकि लोकल पुलिस कोई मुहूर्त निकाले और ईरानी डेरे की तरफ कूच का ऐलान हो।
दो दिन पहले एक कूच का ऐलान हुआ। 32 पकड़े गए जिनमें खवातीनें भी बढ़-चढ़कर निकलीं। सर्दी की रात न होती और वे सोए हुए न होते तो पुलिस भोपाल की हो या कानपुर की, खवातीनें ही उनकी अक्ल ठिकाने लगाने के लिए झुंड में लाठी-डंडे लेकर फिदायीन बनकर निकलतीं तब तक झूमाझटकी के एक घमासान दृश्य के बीच सारे “नाम के मर्द’ पीठ दिखाकर भोपाल की गलियों में रफूचक्कर हो चुके होते।
निराला नगर से किसी भावुक कवि की पुकार आती-“हे देवी, ढाल भी तुम, तलवार भी तुम, नाव भी तुम, पतवार भी तुम!’
भोपाल में कई फिल्मों और ओटीटी की वेबसीरीज फिल्माई जा रही हैं। जाने-माने पत्रकार नवीन चौधरी की दो किताबों “जनता स्टोर’ और “ढाई चाल’ पर इन दिनों एक सीरीज रितेश शाह के निर्देशन में बन रही है। नवीन की एक किताब “आज तक’ के साहित्य अनुष्ठान में दस चर्चित किताबों में लिस्ट हुई है।
अगली बार मिलेंगे तो उन्हें ईरानी डेरे की खूबियाँ गिनाऊंगा। शायद वे ही कोई किताब लिख दें और अगली सीरीज उस पर बने। एमपीटी ने प्रदेश में शूटिंग को बढ़ावा देने के लिए दिल खोल मदद के ऐलान किए हुए ही हैं। वैसे भोपाल के लेखन वीरों के लिए भी यह विषय पाजामे के नाड़े की तरह खुला हुआ है। साहित्य और ऊर्दू अकादमियों के डॉ. विकास दवे और डॉ. नुसरत मेंहदी भी चाहें तो कंटेंट पर गौर फरमा सकते हैं।
डेरे के घरों में क्या चलता होगा? खवातीनें कैसी गुफ्तगू करती होंगी? बड़े होते बच्चे क्या कहते और क्या करते होंगे? एक बानगी पेशे-खिदमत:
-“क्या बात है रिजवाना, अफजल भाई आजकल नजर नहीं आ रहे?’
-“हाँ फातिमा, पिछली बार उन्हें ट्रेन में एक लैपटॉप हाथ लगा था तब से वे मेवात के दौरे पर हैं…साइबर के बारे में कुछ मालूमात करने गए हैं…अब ये भागादौड़ी मुश्किल लगती है…सोचते हैं घर बैठकर कुछ किया जाए…मुनव्वर भी बड़ा हो रहा है…उसकी दिलचस्पी कम्प्यूटर में है…तू बता फहीम मियाँ भागलपुर से छूटकर आ गए?’
-“हाँ भागलपुर से निकले तो कानपुर पुलिस ने रास्ते में ही धर लिया…चार महीने हो गए…अच्छा हुआ फिरोज मामू ने मालेगाँव में हाईवे पर नया काम पकड़ लिया है…रात के दो चार घंटों में ही काफी कमाई हो जाती है…थोड़ी भागदौड़ है मगर लोकल सपोर्ट अच्छा है…मेरे दोनों छोटे भाई भी मामू के साथ खुद को तराश रहे हैं।’
तभी लाउड स्पीकर से आवाज आती है और दोनों खवातीनें दुआओं में अपने शौहर, अब्बू, मामू, खालू, चाचू, भाई और दूल्हाभाई को याद करने लगती हैं, जो लखनऊ से पटना, जोधपुर से रायपुर, अहमदाबाद से हैदराबाद और मालेगाँव से मालगंज तक हमेशा की तरह मुहिम पर निकले हुए हैं…

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *