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‘द टेलीग्राफ’ में प्रकाशित टी.एम. कृष्णा के इस लेख में भारतीय समाज में मनुस्मृति की ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक प्रासंगिकता का विश्लेषण किया गया है.
लेख के अनुसार, मनुस्मृति हिंदू धर्मशास्त्रों का एक अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है, जो मुख्य रूप से सामाजिक-संरचनात्मक, कानूनी और नैतिक मानदंडों की व्याख्या करता है. धर्मशास्त्रों की पूरी श्रृंखला में मनुस्मृति को इसलिए सबसे प्रमुख स्थान मिला, क्योंकि मध्यकालीन भारत से लेकर बाद के ऐतिहासिक लेखनों में इसका सबसे अधिक संदर्भ दिया गया और इस पर सर्वाधिक टीकाएं (व्याख्याएं) लिखी गईं. इसका प्रभाव केवल भारत तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि बौद्ध दक्षिण-पूर्व एशिया तक फैला. 18वीं सदी में सर विलियम जोंस द्वारा इसका अंग्रेजी में अनुवाद किए जाने से बहुत पहले ही यह धर्म और सामाजिक आचरण पर एक सर्वोपरि ग्रंथ माना जाता था.
20वीं सदी में मनुस्मृति को एक नया राजनीतिक संदर्भ तब मिला जब डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने इसके भेदभावपूर्ण, जातिवादी और स्त्री-विरोधी सामाजिक विधानों के विरोध में इसे सार्वजनिक रूप से जलाया और इस ग्रंथ पर कड़ा प्रहार किया. वर्तमान दौर में भी साल में कम से कम एक बार मनुस्मृति राजनीतिक बहसों में फिर से उभर आती है, जिससे तीखा विवाद खड़ा होता है.
कृष्णा के मुताबिक, जब भी मनुस्मृति की भेदभावपूर्ण और परेशान करने वाली सामग्री पर सवाल उठाए जाते हैं, तो इसके समर्थक या बचाव पक्ष अक्सर यह तर्क देते हैं कि ‘इसे वास्तव में कितने लोगों ने पढ़ा है?’ या ‘आम हिंदू मनुस्मृति को नहीं जानते और न ही इसके नियमों का पालन करते हैं.’ इस तर्क के माध्यम से यह साबित करने की कोशिश की जाती है कि चूंकि यह ग्रंथ जनसामान्य द्वारा व्यापक रूप से पढ़ा नहीं जाता, इसलिए यह हिंदू सामाजिक प्रथाओं के लिए अप्रासंगिक है.
लेखक इस तर्क को पूरी तरह भ्रामक मानते हैं. उनका कहना है कि यदि किसी ग्रंथ के पढ़े जाने को ही सामाजिक आचरण का एकमात्र आधार माना जाए, तो वेदों का भी कोई व्यावहारिक सामाजिक-धार्मिक महत्व नहीं रह जाएगा. ऐतिहासिक रूप से जाति व्यवस्था के कारण वैदिक संस्कृत सीखने और समझने की अनुमति बेहद सीमित वर्ग को थी. आम जनता को कभी यह पता ही नहीं था कि वेदों में क्या लिखा है, और 21वीं सदी में भी वेदों की व्याख्या पर मुख्य रूप से ब्राह्मणवादी जातियों का वर्चस्व है. फिर भी, आम हिंदू वेदों का सम्मान करते हैं क्योंकि उन्हें पीढ़ियों से ऐसा करने के लिए सिखाया गया है.
इसी तरह, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऋग्वेद के श्लोक “एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति” का हवाला देकर इसे भारतीय सभ्यता का प्रतीक बताते हैं, तो यह विचार जनसामान्य तक बिना ग्रंथ पढ़े ही पहुंचता है. इससे यह सिद्ध होता है कि कोई लिखित ग्रंथ बिना पढ़े भी लोक-प्रथाओं और सामाजिक सोच में गहराई से रच-बस सकता है. मनुस्मृति का सामाजिक प्रभाव उसके शब्दों के सीधे ज्ञान पर निर्भर नहीं करता, बल्कि सदियों से चली आ रही सामाजिक व्यवस्था पर निर्भर करता है.
लेखक ध्यान दिलाते हैं कि जो लोग मनुस्मृति को अप्रासंगिक बताते हैं, वे भी अपनी सुविधा के अनुसार इसका इस्तेमाल करते हैं. उदाहरण के लिए, जब तमिलनाडु के तत्कालीन उप-मुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन ने ‘सनातन धर्म’ पर टिप्पणी की, तो सनातन धर्म की उदारवादी परिभाषा देने के लिए मनुस्मृति के ही एक श्लोक (“सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्…”) का सहारा लिया गया. इसे ‘सामान्य धर्म’ कहा गया, जो सभी जातियों, लिंगों और आयु वर्गों के लिए समान माना जाता है.
हालाँकि, यह एक विरोधाभास है क्योंकि वही मनुस्मृति दूसरे हिस्सों में वर्णाश्रम और लिंग के आधार पर घोर भेदभाव का उपदेश देती है. ‘धर्म’ का अर्थ संदर्भ के अनुसार बदल जाता है—यह एक उदार मानवीय मूल्य से लेकर थोपी गई संकीर्ण सामाजिक बाध्यता बन सकता है. इसलिए, अपनी सहूलियत के हिसाब से किसी एक अच्छे श्लोक को चुनकर (चेरी-पिकिंग करके) मनुस्मृति के मूल भेदभावपूर्ण चरित्र को छिपाया नहीं जा सकता.
वह लिखते है कि मनुस्मृति केवल एक प्राचीन किताब नहीं है, बल्कि इसकी सोच आज भी भारतीय समाज की रोजमर्रा की हकीकत में जीवित है. दलितों पर होने वाले अत्याचार, अलग कुओं की व्यवस्था, श्मशान घाटों से बेदखली, ऑनर किलिंग, घरेलू हिंसा और सिनेमा में महिलाओं का वस्तुकरण जैसे पहलू इसी मानसिकता का विस्तार हैं. समय के साथ यह भेदभाव समाप्त नहीं हुआ, बल्कि इसने नए और सूक्ष्म रूप धारण कर लिए हैं—जैसे शारीरिक हिंसा का मानसिक व भावनात्मक उत्पीड़न में बदलना.
आरक्षण का तीखा विरोध इसी मनुवादी सोच का प्रत्यक्ष उदाहरण है. इसके अलावा, संस्थागत स्तर पर भी यह प्रभाव दिखता है; जैसे जयपुर में राजस्थान उच्च न्यायालय के बाहर मनु की मूर्ति का बने रहना, उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों द्वारा निर्णयों में मनुस्मृति का हवाला दिया जाना, या दलित नेता मल्लिकार्जुन खड़गे के भाषण के बाद किसी स्थान पर ‘शुद्धिकरण’ समारोह का आयोजन किया जाना. ये घटनाएँ दर्शाती हैं कि मनुवादी विचार आज भी तंत्र का हिस्सा हैं.
प्रगतिशील सवर्णों का छद्म जाति-निरपेक्ष रवैया
लेखक प्रगतिशील सवर्णों (उच्च जातियों) की मानसिकता पर भी करारा प्रहार करते हैं. तथाकथित प्रबुद्ध और प्रगतिशील सवर्ण अक्सर अपनी जातिगत और पितृसत्तात्मक विशेषाधिकारों में अपनी भूमिका को नकारते हैं. वे अक्सर यह दावा करते हैं कि वे ‘जाति-मुक्त’ माहौल में पले-बढ़े हैं, अपने दलित या पिछड़ी जाति के दोस्तों का जिक्र करते हैं, या अपने घरेलू सहायकों के साथ अपने अच्छे व्यवहार की कहानियां सुनाते हैं.
वे इस बात को समझने में असमर्थ रहते हैं कि इन सभी सामाजिक संबंधों और तालमेल का ढांचा स्वयं जाति व्यवस्था द्वारा ही तय किया गया है. वे उन व्यक्तियों को अदृश्य बना देते हैं जिनकी वे बात करते हैं, और छोटी-छोटी ‘दया’ दिखाकर खुद को सशक्त महसूस करते हैं. लेखक का स्पष्ट मानना है कि जाति के प्रति आंखें मूंद लेना जातिवाद का विरोध करना नहीं है.
मनुस्मृति या हिंदू सामाजिक संरचना की आलोचना करने पर अक्सर ‘व्हाटअबाउटरी’ (कुतर्क) का सहारा लिया जाता है, जैसे कि ‘इस्लाम में क्या हो रहा है?’ लेखक स्वीकार करते हैं कि पूर्वाग्रह और दूसरों को पराया मानने की प्रवृत्ति इस्लाम सहित सभी धर्मों में मौजूद है और हर धर्म के भीतर के लोगों को अपनी कमियों पर काम करना चाहिए.
इस्लाम में भी कई विद्वान और कार्यकर्ता आंतरिक सुधारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं. लेकिन सुधारकों का साथ देने के बजाय, भारत में उनके बयानों का उपयोग मुसलमानों को और अधिक नीचा दिखाने के लिए किया जाता है. उदाहरण के तौर पर, तीन तलाक के खिलाफ ऐतिहासिक फैसला पांच साहसी मुस्लिम महिलाओं के संघर्ष का परिणाम था, लेकिन इसका पूरा राजनीतिक श्रेय मोदी और सत्ताधारी दल भाजपा ने खुद ले लिया.
लेखक ‘अहम ब्रह्मास्मि’ (मैं ही ब्रह्म हूं) जैसी अद्वैतवादी व्याख्याओं की सीमाओं को उजागर करते हैं. यह दावा किया जाता है कि ऐसी दार्शनिक अभिव्यक्तियाँ भेदभाव को मिटा देती हैं, लेकिन यह सच नहीं है. स्वामी विवेकानंद जैसे विचारकों द्वारा लोकप्रिय बनाई गई अद्वैत दार्शनिक धारा ही एकमात्र हिंदू दर्शन नहीं है; इसके समानांतर विशिष्टाद्वैत जैसी धाराएं और समाज के अन्य निचले तबकों से उपजे दर्शन भी मौजूद हैं, जो आपस में वैचारिक संघर्ष में रहे हैं.
इन तमाम उच्च दार्शनिक दावों के बावजूद, आम हिंदू समाज का अपने देवी-देवताओं के साथ रिश्ता मुख्य रूप से व्यावहारिक और लेन-देन वाला है. अनुष्ठान केवल भय दूर करने, बाधाएं हटाने और देवताओं को प्रसन्न करने के लिए किए जाते हैं. कोई भी आध्यात्मिक या मानवतावादी व्याख्या इंसानी व्यवहार की सामाजिक कुरूपता और जातिगत ऊंच-नीच को खत्म नहीं कर पाई है.
लेख के अंत में विडंबना यह दर्शाई गई है कि यदि कोई एक ग्रंथ पूरे हिंदू समाज की विविधता को एक सामाजिक नियंत्रण के भीतर बांधकर रखता है, तो वह मनुस्मृति ही है. यह एक ऐसा सामाजिक व्याख्याकार है जो बदलती परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालकर जातिगत व्यवस्था को बनाए रखता है. यही मुख्य कारण था कि डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने इसे जलाकर अपना विरोध दर्ज कराया था.
(टी.एम. कृष्णा एक प्रमुख भारतीय संगीतकार और प्रसिद्ध सार्वजनिक बुद्धिजीवी हैं. अंग्रेजी में उनके मूल लेख का यह हिंदी में अनूदित सारांश है.)
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