हर नाजुक मौका इस देश में उजागर कर देता है बड़े-बड़े दांत-नाखून…
-सुनील कुमार
बाकी दुनिया में बीते बरसों में क्या फर्क पड़ा है, उसका तो ठीक-ठीक अंदाज नहीं है, लेकिन हिन्दुस्तान में पिछले 10-15 बरस में जब भी कोई बड़ी बात होती है, बहुत से लोगों के कई किस्म के मेडिकल टेस्ट अपने आप हो जाते हैं, और उसकी रिपोर्ट सोशल मीडिया पर आने लगती है।
यह दिखने लगता है कि किन लोगों की सोच क्या है, वह किस हद तक हिंसक और आतंकी हो सकती है, किस हद तक अश्लील हो सकती है, और इन लोगों का किसी भी तर्क या इंसाफ से नाता कितना टूट चुका है, दूरी कितनी बढ़ चुकी है।
हम इसे मेडिकल रिपोर्ट इसलिए कह रहे हैं कि ये अपनी मानसिक हालत, और मुजरिम सोच के सुबूत खुद ही सोशल मीडिया पर बिखेरते चलते हैं, और किसी भी जिम्मेदार, लोकतांत्रिक सरकार के लिए यह बात आसान हो सकती है कि वह अपने ऐसे नागरिकों का दिमागी, और कानूनी इलाज कर सके। अब ऐसी डॉक्टरी शायद लोकप्रिय नहीं होती, इसलिए सरकार इससे बचती है। और इस वजह से यह मानसिक रोग, और मुजरिम मानसिकता दोनों बढ़ते चलते हैं।
फिलहाल इस पर लिखने की इसलिए सूझी कि जंतर-मंतर पर अभी-अभी निपटे तिलचट्टों, और उनके साथ हमदर्दी रखने वाले लोगों का जो आंदोलन निपटा है, उसने भी लाखों हिन्दुस्तानियों के छुपे हुए बड़े दांतों, और बड़े-कड़े नाखूनों को उजागर कर दिया है।
एक तरफ सरकार अपने पूरे अस्तित्व की एक सबसे बड़ी चुनौती झेलते हुए उससे निपटने के लिए आधी रात में भी दीये का तेल जला रही थी, दूसरी तरफ आंदोलनकारियों से नफरत करने वाले लोग नागरिक की ओढ़ी हुई खाल से बाहर आकर अपनी नफरत और अपनी हिंसा दिखा रहे थे।
जंतर-मंतर पर आज की जुबान में चर्चित बिल्कुल ताजा पीढ़ी, जेन-जी के लोग तो राजनीतिक कटाक्ष से लेकर गंदी गालियों तक के पोस्टर लिए खड़े थे। ये उनमें से कुछ की आम जुबान में थे, और कुछ के मन की भड़ास से निकला हुआ यह कटाक्ष था। वयस्क मनोरंजन और अश्लील भाषा के हिसाब से देखें तो इस आंदोलन में इस पीढ़ी की रचनात्मक कल्पनाशीलता भी खुलकर दिख रही थी, जो कि असंसदीय तो थी, लेकिन वह आहत संवेदनाओं से उपजी हुई भी थी।
जब सत्ता के करीबी इन आंदोलनकारियों को गद्दार, और टुकड़े-टुकड़े गैंग करार दे रहे थे, तो यह पीढ़ी भी अपनी जुबान में उसका जवाब दे रही थी, और दो अलग-अलग किस्म की गंदगियों या गालियों के बीच फर्क करना हमारे बस का है नहीं।
इस आंदोलन के नारों और पोस्टरों से इस पीढ़ी की बेफिक्र और अराजक आजाद जुबान शायद पहली ही बार इस देश के लोगों के सामने इस हद तक आई है, लेकिन इनके जवाब में जो प्रतिक्रियाएं आई हैं, वे इनसे अधिक खतरनाक हैं।
इस आंदोलन में शरीक होने पहुंचे 18-20 बरस के दो लडक़ों को रोककर, एक कार में पीछे की सीट पर ताकतवर-मालिकाना अंदाज में पसरा हुआ, एक धर्म की पूरी खाल ओढ़ा हुआ, उस धर्म का सारा श्रृंगार किया हुआ, एक आदमी इन लडक़ों को रोककर उनसे सबसे गंदी मुमकिन जुबान में जितनी गालियां दे रहा है,
उन्हें बार-बार टटोल रहा है कि वे किसी दूसरे धर्म के तो नहीं हैं, और उन्हें मार-मारकर कैमरे पर यह कहलवा रहा है कि वे जंतर-मंतर के इन देशद्रोहियों के आंदोलन में दुबारा नहीं आएंगे। यह हिंसक हमलावर बेधडक़ अपना चेहरा उजागर करता है, और अपने धर्म की पूरी साज-सज्जा के साथ बेकसूर लडक़ों को माँ-बहन की गालियां भी बकता है।
वह खुद ही इसका वीडियो बनवाता है, और इन लडक़ों को मजबूर करता है कि वे झुककर कार की खिडक़ी से अपना चेहरा दिखाएं, और कहें कि वे यहां दुबारा नहीं आएंगे। एक पूरी तरह गैरधार्मिक, लोकतांत्रिक, और शांतिपूर्ण आंदोलन के खिलाफ दिल्ली में एक धर्म का नाम लेकर बड़े-बड़े आव्हान करने वाला एक पूरी तरह साम्प्रदायिक नेता लाख लोगों का जुलूस लेकर जंतर-मंतर पहुंचने की मुनादी करता है,
और इस आंदोलन को अपने धर्म के खिलाफ करार देता है। इसके पहले कि जुलूस पहुंच पाए, मजबूर सरकार को आंदोलनकारियों की सारी मांगें माननी पड़ीं, और यह धार्मिक खाल वाला नेता दूसरी घोषणा करता है कि उनके पहुंचने की घोषणा से ही तिलचट्टे डरकर भाग गए।
जंतर-मंतर तो एक नमूना है। हर आंदोलन या हर धार्मिक-भावनात्मक मुद्दा इस देश में पैथोलॉजी लैब का काम करता है, और लोगों के दिल-दिमाग में भरी हुई नफरत, हिंसा, और अश्लीलता को उजागर करता है।
सोशल मीडिया पर लोग खुद होकर अपनी ऐसी दिमागी-बीमारी की रिपोर्ट खुद दस्तखत करके पोस्ट करते हैं, वह इस बार भी हुआ, बड़े उत्साह के साथ हुआ, बड़े-बड़े नामी-गिरामी लोगों ने अपने दिमागी मर्ज की रिपोर्ट पोस्ट की, क्योंकि उन्हें अंदाज नहीं था कि सरकार इतनी जल्दी झुक जाएगी, और आंदोलनकारियों की हर बात मान ली जाएगी।
इस आंदोलन के दौर ने यह भी साबित किया कि हिन्दुस्तान को किसी नेता से अधिक जरूरत मनोचिकित्सक की है। यहां के लोग होमोफोबिक, ट्रांसफोबिक, इस्लामोफोबिक, आजादीफोबिक, नौजवानफोबिक, वयस्कफोबिक किस्म के हैं। अब आंदोलन खत्म होने के बाद भी लोगों का यह लिख-लिखकर भेजना जारी है कि इस आंदोलन में ट्रांस और समलैंगिक लोग शामिल थे, पोस्टरों पर गालियां लिख रहे थे, लडक़े साड़ी पहनकर नाच रहे थे, क्या भारत के लोग इससे सहमत हो सकते हैं?
इस किस्म की शायद लाखों पोस्ट सोशल मीडिया पर आ चुकी है, कुछ दर्जन ऐसे बड़े लंबे-लंबे संदेश हमें भी वॉट्सऐप पर मिले हैं, लेकिन धर्म की खाल ओढ़े हुए इंसानों की हिंसक और अश्लील बातें, उनकी हिंसा, उनकी धमकियां इनमें से किसी को परेशान नहीं करतीं। किसी की धार्मिक भावनाएं इस बात से आहत नहीं होतीं कि उन्हीं के ईश्वर की कोई तस्वीर लगाकर, जय-जयकार करने वाले लोग उस तस्वीर के ठीक नीचे दूसरों का नाम लिखकर उन्हें माँ-बहन की गालियां देते हैं, उनकी बहन-बेटियों को बलात्कार की धमकियां देते हैं।
मैं तो सोशल मीडिया पर हर दिन 8-10 घंटे रहता ही हूं, अपने धर्म के झंडे-डंडे सहित सोशल मीडिया पर मौजूद लोगों की हिंसा-अश्लीलता से उस धर्म के लोगों को कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन उन्हें जंतर-मंतर पर नौजवान आंदोलनकारियों के वयस्क भाषा के कटाक्ष से बड़ी दिक्कत है जो कि हिंसक नहीं है, जो कि धमकी नहीं है, जो कि किसी ईश्वर का नाम लेकर नहीं है, जो कि किसी धर्म के खिलाफ नहीं है। पूरी तरह से अधार्मिक रहा यह आंदोलन, धर्म और जाति के किसी भी नारे से मुक्त भी रहा, और इसके बावजूद उसे एक धर्म का विरोधी करार देते हुए लाख लोगों को वहां ले जाकर तिलचट्टों को मार डालने की खुली धमकी से किसी कोई परेशानी नहीं होती!
भारतीय लोकतंत्र में आंदोलनों से, जायज या नाजायज सरकारी या राजनीतिक फैसलों से इतना तो हो रहा है कि लोग अपने गले में अपने ऐसे डीएनए की माला पहनकर भी खड़े हो जाते हैं जो बताता है कि वे पाषाण युग के हैं, और उसके बाद की सभ्यता के किसी भी विकास से वे पूरी तरह अछूते, और पूरी तरह कुंवारे हैं, उनका चरित्र एकदम शुद्ध है, और उनकी सोच अभी चक्के के आविष्कार के युग में भी नहीं पहुंची है।
मैं तो एकदम खालिस नास्तिक हूं, फिर भी इस देश में धर्म के चोले, प्रतीक, और उसकी साज-सज्जा से लैस नफरती जब दूसरे धर्म के लोगों का साथ देने का आरोप लगाते हुए अपने ही धर्म के लोगों को भी माँ-बहन की गालियां बकते हैं, उन्हें पीटते हैं, तो मैं हैरान होता हूं कि कण-कण में व्याप्त उनका ईश्वर यह देखकर क्या सोच रहा होगा? आप भी सोचकर देखिए कि क्या इससे आपकी धार्मिक, या नास्तिक, किसी भी किस्म की भावना आहत होती है, या आपकी मानवीय भावनाएं अब पत्थरों के बीच दबकर जीवाश्म (फॉसिल) हो चुकी हैं?
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