सुप्रीम कोर्ट में हाई-वोल्टेज ड्रामा
जज को कहा ‘माई ज्यूडिशियल सर्वेंट’, फाइलें हवा में उछालीं; जानें कोर्ट की अवमानना पर क्या कहता है कानून
देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में शुक्रवार को एक ऐसी अभूतपूर्व घटना घटी, जिसने न्याय के मंदिर की सुरक्षा और गरिमा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सुप्रीम कोर्ट में अपनी याचिका की पैरवी खुद कर रहे एक याचिकाकर्ता ने मर्यादा की सारी हदें लांगते हुए सुनवाई कर रहे जजों की पीठ से कह डाला “माई ज्यूडिशियल सर्वेंट, मैं तुम्हें आदेश देता हूँ…”। इतना ही नहीं, आरोपी ने देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के लिए अपशब्दों का प्रयोग करते हुए कानूनी दस्तावेज और फाइलें जजों की पीठ की तरफ हवा में उछाल दीं।
यह घटना जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ के सामने घटी। कोर्ट ने हालांकि याचिकाकर्ता की मानसिक स्थिति या आवेश को देखते हुए तत्काल कोई दंडात्मक आदेश नहीं दिया, लेकिन शाम तक खुफिया ब्यूरो (IB) और दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल उससे तिलक मार्ग थाने में कड़ी पूछताछ करती रही।
क्या है पूरा मामला? कैसे शुरू हुआ तमाशा
सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को इलाहाबाद हाई कोर्ट के April 6, 2026 के एक फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई चल रही थी। इस मामले में याचिकाकर्ता बल प्रताप स्वयं कोर्ट के सामने बहस करने के लिए पेश हुआ था। उसने काला कोट पहन रखा था, लेकिन वकीलों वाला बैंड नहीं लगाया था।
जैसे ही मामले की सुनवाई शुरू हुई, बल प्रताप ने आक्रामक रुख अपनाते हुए कहा, “माई ज्यूडिशियल सर्वेंट, मैं तुम्हें आदेश देता हूँ कि तुम लखनऊ के एसीपी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश दो।” इस पर अचंभित होते हुए पीठ की अगुआई कर रहे जस्टिस केवी विश्वनाथन ने कहा, “तुम मुझे आदेश दे रहे हो? तुम हमें आदेश दे रहे हो!”
इसके बाद याचिकाकर्ता ने कहा कि हमारी तरफ से बस इतना ही था, बाकी सब रिकॉर्ड पर है। और इसी के साथ उसने सीजेआई के खिलाफ अमर्यादित टिप्पणी करते हुए फाइलें पीठ की तरफ फेंक दीं। कोर्ट रूम में तैनात सुरक्षाकर्मियों ने तुरंत मुस्तैदी दिखाते हुए आरोपी को काबू में किया और घसीटते हुए कोर्ट रूम से बाहर निकाला। बाद में कोर्ट ने याचिका को पूरी तरह से खारिज कर दिया।
ऐसी हरकत करने पर क्या मिलती है सजा?
अदालत के भीतर जजों को अपशब्द कहना, फाइलें फेंकना या न्याय की प्रक्रिया में बाधा डालना बेहद गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है। ऐसे मामलों में आरोपी के खिलाफ मुख्य रूप से कानूनी धाराओं और प्रावधानों के तहत कार्रवाई होती है:
1. न्यायालय की अवमानना अधिनियम,1971 (Contempt of Courts Act, 1971)
यह कानून अदालतों को अपनी गरिमा की रक्षा करने की असीमित शक्ति देता है। याचिकाकर्ता बल प्रताप की यह हरकत ‘आपराधिक अवमानना’ (Criminal Contempt) के दायरे में आती है। इसके तहत:
यदि कोर्ट चाहे तो आरोपी को 6 महीने तक की साधारण जेल या दो हजार रुपये तक का जुर्माना, या दोनों की सजा तत्काल सुना सकता है।
सुप्रीम कोर्ट को संविधान के अनुच्छेद 129 के तहत ‘कोर्ट ऑफ रिकॉर्ड’ की शक्ति प्राप्त है, जिससे वह अवमानना करने वाले को सीधे जेल भेज सकता है।
2. भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराएं
चूंकि यह घटना पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर है, इसलिए पूछताछ के बाद आरोपी पर निम्नलिखित आपराधिक धाराएं भी लगाई जा सकती हैं:
लोक सेवक को कर्तव्य निभाने से रोकना: अदालत की कार्यवाही में बाधा डालने और जजों को धमकाने के आरोप में कड़ी सजा का प्रावधान है।
शांति भंग करने के इरादे से अपमान: किसी को जानबूझकर उकसाने या अपशब्द कहने पर भी आपराधिक मुकदमा दर्ज हो सकता है।
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