बंदरबांट हुआ एक्सपोज!

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कौन माई का लाल है जो जनपद से लेकर भोपाल तक पैसे नहीं खाता?”

यह किसी बॉलीवुड फिल्म का सनसनीखेज डायलॉग नहीं है, बल्कि मध्य प्रदेश के सतना जिले में सिस्टम के मुंह पर जड़ा गया एक जोरदार तमाचा है। भ्रष्टाचार के आरोपों में निलंबित हुए ग्रामीण यांत्रिकी सेवा के सब-इंजीनियर सतीश समेले ने कैमरे के सामने जो कबूलनामा किया है,  उसने पंचायत विभाग से लेकर वल्लभ भवन की बंद एसी दफ्तरों तक हड़कंप मचा दिया है। समेले का यह तेवर अब एमपी की राजनीति और ब्यूरोक्रेसी में भी चर्चा बन गया है।

निलंबित इंजीनियर ने केवल जुबानी तीर नहीं चलाए, बल्कि सरकारी फाइलों के पीछे चलने वाले उस कथित ‘कमीशन राज’ का पूरा कच्चा चिट्ठा खोलकर रख दिया,

जिसे सब जानते तो हैं लेकिन बोलने से कतराते हैं। समेले का सीधा और गंभीर दावा है कि ग्रामीण इलाकों में होने वाले विकास कार्यों की नींव ही कमीशन पर टिकी है।

उनके मुताबिक, योजना शुरू होने से पहले ही बंदरबांट का पूरा प्रतिशत तय हो जाता है

इस कथित ‘रेट लिस्ट’ में सरपंच, सचिव, ग्राम रोजगार सहायक, सब-इंजीनियर, सहायक यंत्री से लेकर जनपद सीईओ तक, हर किसी का हिस्सा पहले से ‘फिक्स’ होता है। इतना ही नहीं, इंजीनियर ने बेहद आक्रामक लहजे में आरोप लगाया कि नीचे से उगाही का एक बड़ा हिस्सा “सूटकेस” में बंद होकर सीधे भोपाल बैठे रसूखदार अफसरों तक पहुंचता है।

ऐसे समझिए- 

पद कथित भूमिका कथित हिस्सा / आरोप
सरपंच योजना की स्थानीय स्वीकृति और संचालन कुल बजट में से कथित तय प्रतिशत
सचिव दस्तावेज़, फाइल और भुगतान प्रक्रिया कथित तय कमीशन
ग्राम रोजगार सहायक (GRS) मस्टर रोल, ऑनलाइन एंट्री और फाइल प्रक्रिया कथित तय हिस्सा
सब-इंजीनियर तकनीकी निरीक्षण, मूल्यांकन और रिपोर्ट कथित तकनीकी कमीशन
सहायक यंत्री तकनीकी सत्यापन और अंतिम क्लियरेंस कथित तय कमीशन
जनपद CEO प्रशासनिक स्वीकृति और भुगतान रिलीज कथित अंतिम स्तर का हिस्सा

अब बात यह है की अगर एक सरकारी सिस्टम के भीतर रहे अधिकारी के इन दावों में रत्ती भर भी सच्चाई है, तो यह मध्य प्रदेश की प्रशासनिक शुचिता पर बहुत बड़ा कलंक है।

और जब जनता की गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा इसी तरह ‘प्रतिशत’ और ‘कमीशन’ की भेंट चढ़ जाता है, तो फिर जमीन पर विकास के नाम पर क्या बचता होगा?

क्या यही वजह है कि करोड़ों की सड़कें पहली ही बारिश में बह जाती हैं और सरकारी भवन बनने से पहले ही जर्जर हो जाते हैं?

ये जो कुछ आरोप लगाए गए हैं। तकनीकी रूप से ये सभी आरोप सतीश समेले के व्यक्तिगत दावे और उनकी अपनी भड़ास हैं, जिनकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि होना अभी बाकी है।

संबंधित विभाग या मोहन यादव सरकार की ओर से इस मामले पर अभी तक कोई आधिकारिक बयान या सफाई सामने नहीं आई है। अब यह सरकार की कार्यशैली पर निर्भर करता है की इस ‘सिस्टम विलो ब्लोअर’ के आरोपों की निष्पक्ष या उच्च स्तरीय जांच होती है, या फिर हर बार की तरह इस बार इन आरोपों से किनारा कर लिया जाएगा याकि मामले को फ़ाइलों में दबाकर ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा।

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