मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की चाहत आखिर है क्या?

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मध्य प्रदेश के नगरीय प्रशासन मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के पत्र का मामला गर्म है…
और चिट्ठी के चक्रव्यूह में वे खुद ही फंस गए हैं…

सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मध्य प्रदेश भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को तलब करने का साहस करेंगे?

क्या सुशासन और अनुशासन वाला भाजपा संगठन कैलाश विजयवर्गीय पर पार्टी को कमजोर करने वाली गतिविधियों के आरोप में बड़ी कार्रवाई करेगा, या भाजपा में अनुशासन का डंडा सिर्फ छोटे कार्यकर्ताओं पर ही चलता है? बाकी के लिए तो यह डंडा सहारे की लाठी है।

मध्य प्रदेश के मंत्री कैलाश विजयवर्गीय की चाहत आखिर है क्या?

क्या मंत्री जी अटेंशन सीकर यानी “मुझे देखो” वाली बीमारी के शिकार हो गए हैं?

या मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के भीतर हीनता या “जीवन में कुछ नहीं पा सके” जैसा भाव पैदा हो गया है?

कभी वे कहते हैं कि अफसर चापलूस हैं, कभी कहते हैं कि संघ में अच्छे लोगों की कमी है।

हालांकि मंत्री जी का यह रोग पुराना है। ऐसी ही वाचालता और दुर्वासा जैसे वचनों के चलते वे 2013 में संन्यास की राह पर धकेल दिए गए थे।

लगता है सत्ता की कुर्सी पर सुकून से बैठना कैलाश जी को सुहाता नहीं। एक बार फिर वे 2013 के वनवास को बुलावा दे रहे हैं।

विजयवर्गीय की हरकतों को देखकर लगता है कि संन्यास और उनके बीच अब बहुत दूरी नहीं रह गई है।

मंत्री कैलाश विजयवर्गीय के समर्थक उन्हें कद्दावर नेता, अगले मुख्यमंत्री और बॉस कहकर संबोधित करते हैं। वे खरा-खरा बोलने के लिए जाने जाते हैं, पर खरा बोलने और बुरा बोलने का भेद मापने का पैमाना शायद उनके पास नहीं है।

दैनिक भास्कर अखबार में कैलाश विजयवर्गीय के पत्र के हवाले से प्रथम पृष्ठ पर एक खबर प्रकाशित हुई है, जिसका शीर्षक है— “मुझे पिछले ढाई साल से असहयोग, उपेक्षा और विरोध ही मिल रहा है।”

उनका आशय है कि इंदौर पिछले ढाई साल से उपेक्षा का शिकार हो रहा है। मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में विजयवर्गीय ने लिखा कि पिछले ढाई साल से उन्हें असहयोग, उपेक्षा और विरोध का सामना करना पड़ रहा है। यदि इंदौर के विकास से जुड़े मुद्दों का समाधान नहीं हुआ, तो जनता की आवाज को सार्वजनिक मंच पर उठाना उनकी मजबूरी होगी।

अब इसमें सबसे बड़ी बात यह है कि विजयवर्गीय लिखते हैं— “जनता की आवाज को सार्वजनिक मंच पर उठाना मेरी मजबूरी होगी।”

इन पंक्तियों का क्या आशय है? क्या विजयवर्गीय मुख्यमंत्री मोहन यादव, भाजपा सरकार और संगठन को बगावत की चुनौती दे रहे हैं? उनकी भाषा तो बागियों वाली ही दिख रही है। सवाल यही है कि क्या भाजपा संगठन इसके लिए कैलाश विजयवर्गीय को तलब करेगा?

इंदौर की उपेक्षा का नाम लेकर विजयवर्गीय खुद के चेहरे को चमकाने की कोशिश करते दिख रहे हैं।

आखिर कैलाश विजयवर्गीय को आज इंदौर कैसे याद आ गया? उनके करीबियों ने जब इंदौर के विकास में अड़ंगे लगाए, तब वे कहाँ थे? आइए समझते हैं इंदौर में कैलाश विजयवर्गीय की कहानी।

इसमें कोई शक नहीं कि इंदौर में कैलाश विजयवर्गीय जनप्रिय नेता हैं, पर संगठन में गुटबाजी और दूसरे नेताओं को कमजोर करने का श्रेय भी भाई खेमे को ही जाता है। कभी पूर्व सांसद सुमित्रा महाजन तो कभी इंदौर की महापौर रहीं मालिनी गौड़ के खिलाफ यह खेमा सक्रिय रहा है। इसके चलते इंदौर की कई विकास योजनाएं कमजोर हुई हैं।

पहला सवाल— जब मालिनी गौड़ इंदौर की महापौर थीं, तब लगातार कई महीनों तक कैलाश विजयवर्गीय के समर्थक पार्षद नगर निगम की बैठकों का बहिष्कार करते रहे। किसी भी विकास से जुड़े मुद्दे पर ये पार्षद निगम या मालिनी गौड़ के साथ खड़े नहीं रहे। उस वक्त कैलाश विजयवर्गीय को इंदौर के विकास और उपेक्षा का ख्याल क्यों नहीं आया? क्यों उन्होंने अपने खेमे के पार्षदों को यह समझाइश नहीं दी कि नगर निगम की बैठकों में जाना शहर के विकास के लिए जरूरी है?

दूसरा सवाल— आज इंदौर शहर की उपेक्षा और अपेक्षित विकास की चिंता करने वाले कैलाश विजयवर्गीय ने अपने बेटे आकाश विजयवर्गीय को टिकट दिलवाने के लिए तमाम मेहनती जमीनी कार्यकर्ताओं को कैसे किनारे कर दिया? तब इंदौर को एक अच्छा, अनुभवी और विकास के प्रति समर्पित जनप्रतिनिधि देने का ख्याल क्यों नहीं आया? क्या इंदौर को अच्छे नेताओं की जरूरत नहीं है? क्या आकाश से बेहतर दूसरे दावेदार नहीं थे?

तीसरा और बड़ा सवाल— मोहन मंत्रिमंडल की कैबिनेट बैठकों से गायब रहकर कैलाश विजयवर्गीय कौन-सा विकास का गीत लिख रहे हैं? वे लगातार कैबिनेट बैठकों से गायब रहते हैं। जब बैठक चलती है, उस वक्त वे कभी पतंगबाजी करते दिखते हैं, तो कभी भगोरिया मेले में आदिवासी नृत्य करते नजर आते हैं। आखिर पतंगबाजी और नृत्य जरूरी हैं या विकास से जुड़ी कैबिनेट बैठकें?

यदि आपको वाकई इंदौर की चिंता होती, तो कैबिनेट में अपनी आवाज बुलंद करते। विधानसभा में बोलते। आज आप इंदौर की नहीं, बल्कि अपनी कमजोर होती नींव को मजबूत करने के लिए इंदौर की भावनाओं से खेल रहे हैं।

और हाँ, इंदौर के विकास की बात करने वाले कैलाश विजयवर्गीय ने एक बार नगर निगम के कामों पर सवाल के जवाब में कहा था कि “मैं आजकल नगर निगम की तरफ पैर करके भी नहीं सोता।

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