परिवारवाद सिर्फ राजनीति में ही नहीं और फिल्मों में नहीं है धर्म धंधे में भी….

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परिवारवाद सिर्फ राजनीति में ही नहीं, फिल्मों में नहीं है…धर्म धंधे में भी…
आज भी राजा का बेटा राजा ही बन रहा है… कथावाचक के बेटा कथावाचक ही बन रहा है…
प्रसिद्ध कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर ने हाल ही में अपने बेटे देवांश ठाकुर को कथा वाचन के लिए लॉन्च किया है।

देवांश ठाकुर ने अपना पहला कार्यक्रम सोमनाथ धाम में भागवत चिंतन के रूप में किया है।
देवकी नन्दन ठाकुर एक कथा करने के लिए 12 से 15 लाख रुपए लेते हैं। जाहिर है अब उनका बेटा भी इसी तरह कथा करेगा और मोटी कमाई करेगा
बाकी आप लोग NEET पेपर लीक पर धरने देते रहो। धर्म के नाम पर लड़ते रहो…

गुजरात के पावन सोमनाथ की धरती से सोशल मीडिया पर आया एक वीडियो इन दिनों समूचे सोशल मीडिया और वैचारिकी में कौतूहल और झोर-झंझावतों के मुहाने पर है। देश के विख्यात कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर ने अपने 19 वर्षीय इकलौते पुत्र देवांश ठाकुर को एक भव्य धार्मिक महोत्सव के माध्यम से औपचारिक रूप से आध्यात्मिक मंच पर उतारा। देवांश ने यहाँ पहली बार सार्वजनिक रूप से भागवत महापुराण का पाठ किया और सुमधुर भजनों की प्रस्तुति दी। पिता ऊँचे आसन पर बैठकर वात्सल्य और गर्व से पुत्र को निहारते रहे, लेकिन जैसे ही यह वीडियो इंटरनेट की दुनिया में पहुँचा, समाज दो धड़ों में विभाजित हो गया।

यह दृश्य एक पिता द्वारा अपने पुत्र को अपनी विरासत सौंपने का मामला नहीं रही, बल्कि इसने आधुनिक भारत की एक बहुत बड़ी रग को छू लिया है ‘विरासत बनाम योग्यता’ का द्वंद्व यह सबों की जुबान पर ‘आम-फ़हम’ बन गया।

इस पूरे घटनाचक्र ने सोशल मीडिया को एक ऐसी तकरार में तब्दील कर दिया जहाँ परंपरा और आधुनिक तर्कों के तीर बिछौने से बिछ गए

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सबसे पहले बात करते हैं सनातन संस्कृति और संस्कारों की अविरल धारा पर…..
समर्थकों और श्रद्धालुओं का एक बड़ा वर्ग इसे सनातन परंपरा का गौरव मान रहा है। उनका तर्क है कि यदि एक डॉक्टर का बेटा डॉक्टर और व्यवसायी का बेटा व्यवसाय संभाल सकता है, तो एक व्यासपीठ के उत्तराधिकारी का आध्यात्मिक मार्ग चुनना पूरी तरह न्यायसंगत है।

उनका मानना है की मात्र 19 वर्ष की आयु में वैदिक ग्रंथों, संस्कृत के क्लिष्ट श्लोकों और भागवत के गूढ़ रहस्यों पर ऐसी पकड़ बनाना मामूली बात नहीं है। हर किसी के लिए यह सरल नहीं है.

देवांश की ओजस्वी वाणी, शुद्ध उच्चारण और मंच पर उनके आत्मविश्वास ने लाखों लोगों को प्रभावित किया है। समर्थकों के अनुसार, यह परिवारवाद नहीं, बल्कि संस्कारों का पीढ़ीगत हस्तांतरण है.

इसके बिल्कुल विपरीत, एक प्रबुद्ध और युवा वर्ग इस कदम को बेहद आलोचनात्मक दृष्टि से देख रहा है। सोशल मीडिया पर आम युवाओं और विभिन्न विचारकों ने इसे सीधे तौर पर ‘अध्यात्म में परिवारवाद’ की संज्ञा दी है।

सोशल मीडिया पर लोगों का कहना है कि आज देश का आम युवा NEET, JEE, सिविल सर्विसेज और पुलिस भर्ती जैसी कठिन परीक्षाओं के चक्रव्यूह में फंसा हुआ है। दिन-रात की हाड़-तोड़ मेहनत के बाद भी भविष्य अनिश्चित है। ऐसे में किसी को सिर्फ इसलिए एक स्थापित और करोड़ों का साम्राज्य थाल में परोसकर मिल जाए क्योंकि वह एक प्रसिद्ध कथावाचक का पुत्र है, यह अखरता है

इंटरनेट पर युवाओं ने व्यंग्य करते हुए लिखा कि आम जनता के बच्चे तो केवल पंडालों में दरियाँ बिछाने, जयकारे लगाने और बेरोजगारी का दंश झेलने के लिए रह गए हैं, जबकि रसूखदारों के बच्चों का भविष्य पहले से ही ‘सेट’ है।

मूल रूप से मथुरा के मांट क्षेत्र के ओहावा गांव के निवासी देवकीनंदन ठाकुर स्वयं मात्र छह वर्ष की आयु में सब कुछ छोड़कर वृंदावन आ गए थे। उन्होंने अपने कड़े संघर्ष, अध्ययन और अनूठी शैली से देश-विदेश में अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई। आज उनके उसी साम्राज्य की बागडोर उनके इकलौते बेटे देवांश के हाथों में जाती दिख रही है। प्रथम दृष्ट्या यह स्पष्ट है कि देवांश को इस मार्ग के लिए बरसों से बेहद बारीकी और सघनता के साथ प्रशिक्षित किया जा रहा था।

यह विवाद इस बात का प्रमाण है कि 21वीं सदी का सजग भारत अब किसी भी क्षेत्र में ‘विशेषाधिकार’ या ‘वंशवाद’ को सहजता से स्वीकार करने के मूड में नहीं है, चाहे वह क्षेत्र राजनीति का हो, सिनेमा का हो या फिर स्वयं धर्म का। व्यासपीठ को भारतीय संस्कृति में सर्वोच्च और अत्यंत पवित्र स्थान माना गया है, जहाँ बैठने वाले की पात्रता उसका ज्ञान और वैराग्य तय करता है, न कि उसका कुल

अब यह तो आने वाला समय और देवांश ठाकुर की खुद की तपस्या ही तय करेगी कि वे जनता के हृदय में केवल अपने पिता की परछाई बनकर रह जाते हैं, या अपनी मौलिक विद्वता, सेवा और आचरण से खुद को इस सर्वोच्च गद्दी का सच्चा अधिकारी साबित कर पाते हैं।

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