मीडिया को आखें दिखाने वाले… पत्रकार के सवाल पर घंटा कहने वाले… बेखौफ मंत्री कैलाश विजयवर्गीय को मीडिया के सामने सांप सूंघ गया।
सवाल सीधा सा था… क्या आपने सीएम को पत्र लिखा… जवाब था मुझे नहीं पता
दरअसल मोहन सरकार में कैलाश विजयवर्गीय बहुत सीनियर मंत्री हैं, वे उम्र में बड़े हैं लेकिन बड़प्पन नहीं दिखाते…
जबसे मोहन यादव सीएम बने हैं तब से इंदौर-उज्जैन क्षेत्र में विकास ने रफ्तार पकड़ी है, इसकी एक वजह सिंहस्थ भी है।
लेकिन इसके बावजूद कैलाश विजयवर्गीय सीएम को पत्र लिख रहे हैं और इंदौर की उपेक्षा का आरोप लगा रहे हैं।
वैसे कैलाश जी खुद की उपेक्षा को इंदौर की उपेक्षा का नाम मत दीजिए।
वैसे पत्र वाले मामले में कई झोल हैं…
अव्वल तो कैलाश विजयवर्गीय को पत्र लिखने की जरूरत ही क्या है? अगर पत्र लिखा भी तो लीक क्यों किया?
बात सिर्फ इंदौर की है, या फिर कैलाश के मन में कुछ और खिचड़ी पक रही है।
अगर कोई बात है भी तो कैलाश विजयवर्गीय को बीजेपी आलाकमान और संघ के सामने रखनी चाहिए, न कि मीडिया में लीक कर सरकार और संगठन पर सवाल खड़े करना चाहिए…
अब सवाल ये भी है कि प्रदेश बीजेपी संगठन कैलाश विजयवर्गीय और कितनी बार माफ करेगा।
वैसे बीजेपी के दिग्गज भी कह रहे हैं कि कैलाश जी की इन्हीं हरकतों की वजह से वे मुख्यमंत्री नहीं बन पाए
पॉलिटिक्स में कुछ खुद से नहीं होता, बातों और इशारों के मायने होते हैं।प्रदेश के एक अखबार के फ्रंट पेज पर खबर आई कि कैलाश विजयवर्गीय खुद की उपेक्षा से दुखी हैं।
विजयवर्गीय ने पत्र में मास्टर प्लान में देरी, इंदौर मेट्रोपॉलिटन रीजन के नाम को लेकर आपत्ति, एयरपोर्ट विस्तार के लिए जमीन, राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (RGPV) के विभाजन, पीथमपुर में सुविधाओं की कमी और सिंहस्थ के कामों में इंदौर की अनदेखी जैसे मुद्दे उठाए हैं। जबकी सभी को पता है कि इंदौर में कितना तेजी से विकास हो रहा है।
20 जून की इस चिट्ठी के साथ उन्होंने पहले लिखे गए पत्र भी लगाए हैं। कैलाश विजयवर्गीय ने सीधे मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को लिखी चिट्ठी में आरोप लगाया है कि पिछले ढाई साल से उन्हें असहयोग, उपेक्षा और विरोध का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने बागी तेवर दिखाते हुए लिखा है कि यदि इंदौर के विकास से जुड़े मुद्दों का समाधान नहीं हुआ तो जनता की आवाज को सार्वजनिक मंच पर उठाना उनकी मजबूरी होगी।
हालांकि आलाकमान से डंडा दिखाए जाने के बाद कैलाश के मुंह में दही जम गया…
लगता है दिल्ली की डांट पड़ी तो सुर बदल गए
मीडिया से नजरे भी नहीं मिला पा रहे हैं। पत्र के सवाल पर सहमे सहमे निकल लिए.. चिट्ठी पर न हां बोला और न ना बोला
वैसे कैलाश भले ही अब चुप्पी साध लें लेकिन सवाल यही है कि जो बात उन्हें मध्य प्रदेश भाजपा संगठन और संघ के पदाधिकारियों के सामने कही जानी चाहिए थी। वह बात जानबूझकर पत्र में लिखकर डॉक्यूमेंट की गई और फिर पत्र को लीक कर दिया गया।
कैलाश जी खुद ढाई साल से इसी सरकार का हिस्सा हैं। अगर प्रदेश के विकास के साथ इतना बड़ा अन्याय हो रहा था, तो अब तक चुप क्यों रहे?
कहीं इंदौर की उपेक्षा की आड़ में खुद का उल्लू तो सीधा नहीं करना चाहते..
