गुजरात और असम के छात्र आंदोलन से कितना अलग है सीजेपी का प्रदर्शन ?
सुदीप ठाकुर
कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का आज रविवार को फिर जंतर-मंतर पर बड़़ा प्रदर्शन हो रहा है। इसमें किसान संगठन के लोग भी जुट रहे हैं।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की युवाओं और बेरोजगारी पर की गई टिप्पणी से मजाक के तौर पर इसके नेता अभिजीत दिपके की एक्स पोस्ट से वर्चुअल दुनिया से जमीन पर पैर रखते ही इस पार्टी को लोग इसके प्रदर्शन में उपस्थिति से आंकने की कोशिश कर रहे हैं।
अब तक शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग ही इसके केंद्र में है। अपने स्वरूप में अब तक गैरराजनीतिक लग रहे इस जमावड़े को लेकर कुतूहल बरकरार है। बावजूद इसके कि पिछले कुछ दिनों में इसकी चमक कुछ कम हुई है।
दरअसल सवाल छह जून को हुए इसके पहले प्रदर्शन के समय से किया जा रहा है कि मोदी सरकार और दिल्ली की भाजपा सरकार का रवैया इसके प्रति उदार क्यों है?
वह भी ऐसे दौर में, जब किसी सोशल मीडिया पोस्ट पर स्वतंत्र पत्रकारों या सामाजिक कार्यकर्ताओं या किसी को भी मुकदमों में उलझा दिया जा रहा है। पुलिस के चक्कर लगाने को मजबूर किया जा रहा है। कॉकरोच पार्टी (सीजेपी) कैसे जंतर-मंतर में प्रदर्शन कर ले रही है? इसी जंतर-मंतर और दिल्ली की सरहदों पर किसान आंदोलन के साथ इसी सरकार का कैसा रवैया था? इसी दिल्ली के उत्तर-पूर्वी इलाके में फरवरी, 2020 में सीएए के खिलाफ हुए आंदोलन और दंगों के सिलसिले में गिरफ्तार किए गए छात्र नेता और स्कॉलर उमर खालिद को बिना सुनवाई के अब तक जमानत क्यों नहीं मिल पा रही है?
दूसरी ओर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) को लेकर सरकार का रवैया आम तौर पर नरम ही है। अभी एक वर्ग इसे असहमति और विरोध की आवाज मानने को भी तैयार नहीं है? आने वाले समय में दिखेगा कि यह वास्तव में कोई छात्र आंदोलन है या नहीं। अतीत से जुड़े कुछ सवाल हमारे सामने हैं और इसमें इसे तलाशने की कोशिश जरूर करनी चाहिए।
आज की सत्ता और भाजपा तथा आरएसएस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के गृह प्रदेश गुजरात में 1974 में भड़के छात्र आंदोलन की दुहाई देते नहीं थकते हैं। उसकी पृष्ठभूमि में अहमदाबाद के इंजीनियरिंग कॉलेज के हॉस्टल के मेस के बिल में हुई बढ़ोतरी से भड़का गुस्सा था। 20 दिसंबर, 1973 को अहमदाबाद के एल डी इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्रों से मेस बिल में बढ़ोतरी के विरोध में कॉलेज की कैंटीन में आग लगा दी थी और रेक्टर के घर पर हमला कर दिया था। देखते ही देखते छात्र बेकाबू हो गए। 3 जनवरी, 1974 को भारी तोड़फोड़ हुई।
हालत यह हो गई कि परिसर में पुलिस को बुलाना पड़ा था। बाद में इसमें कांग्रेस से अलग होकर संगठन कांग्रेस बनाने वाले मोरारजी देसाई, सर्वोदयी और आरएसएस के लोग जुड़ते चले गए। गुस्सा गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल के खिलाफ था, मगर निशाने पर केंद्र की इंदिरा गांधी सरकार थी। इसे गुजरात नवनिर्माण आंदोलन नाम दिया गया।
गुजरात के बाद बिहार में भी छात्रों का आंदोलन भड़क गया। इसे सर्वोदय से मोहभंग के बाद तकरीबन किनारे हो चुके जयप्रकाश नारायण का नेतृत्व मिला। जेपी के छात्र आंदोलन से निकले अनेक नेताओं ने सियासत का दामन थामा और कालांतर में वैचारिक रूप से बंट भी गए। 1977 में सत्ता के शिखर तक पहुंचे इसके अधिकांश नेता वैचारिक, नैतिक और व्यावहारिक सभी धरातल पर बेहद कमजोर साबित हुए।
अलबत्ता 1970 के दशक के उस दौर में छात्र आंदोलन ने बेजान पड़े विपक्ष में जान डाल दी थी।
आजाद भारत में पहला बड़ा छात्र आंदोलन 1965 में हिंदी के विरोध में शुरू हुआ था। मगर उसका दायरा दक्षिण भारत तक ही सीमित था और यह पूरी तरह छात्र आंदोलन था भी नहीं। इसमें द्रविड़ पार्टियां शामिल थीं, बावजूद इसके कि इसे चिंगारी त्रिभाषा फॉर्मूले से मिली थी, जिससे सर्वाधिक प्रभावित छात्र ही हो रहे थे।
आजाद भारत का तीसरा बड़ा छात्र आंदोलन 1979 में कथित अवैध बांग्लादेशियों के खिलाफ ऑल असम स्टुडेंट्स यूनियन (आसू) के सड़क पर उतरने से शुरू हुआ था। इसे प्रफुल्ल कुमार महंता और भृगू कुमार फूंकन जैसे नेताओं का नेतृत्व मिला। असम आंदोलन के दौरान हिंसक घटनाओं में हजारों लोग मारे गए थे।
आखिरकार 1985 में राजीव गांधी की सरकार के साथ हुए समझौते के बाद यह आंदोलन खत्म हो गया।
प्रफुल्ल कुमार महंता और फूकन ने असम गण परिषद बनाई। मुख्यमंत्री और गृहमंत्री तक बने। आज महंता सियासत के हाशिये पर हैं। असम में आज एक ऐसी सरकार है, जो अब अपने ही प्रदेश के लोगों को संदेह की नजर से देख रही है। असम ही नहीं पूरे देश में भाजपा का प्रमुख नारा ही कथित घुसपैठिये से जुड़ा हुआ है।
असम आंदोलन की समाप्ति के महज छह वर्षों बाद जब वी पी सिंह की सरकार ने अन्य पिछड़ा वर्ग को आरक्षण दिए जाने से संबंधित बी पी मंडल आयोग की सिफाऱिशों को लागू करने का फैसला किया था, तब राजधानी दिल्ली सहित देश के बड़े हिस्से में हिंसक छात्र आंदोलन भड़क उठा था। इसके नेता राजीव गोस्वामी को लोग भूले नहीं होंगे जिसने राजधानी दिल्ली में आत्मदाह का प्रयास किया था और बुरी तरह झुलस गया था।
यह आंदोलन भड़का तो नौकरी के अवसरों की कमी से था, लेकिन इसकी परिणति सामाजिक न्याय की ऐसी राजनीति के रूप में हुई जिसे बदलना अब नामुमिकन है। इसे हिंदुत्व बनाम जातिगत जनगणना के रूप में मंडल बनाम कमंडल के दूसरे संस्करण में देखा जा सकता है।
कहने को तो 2010 के अन्ना आंदोलन को भी छात्र आंदोलन से जोड़ा जाता है, लेकिन यह उस रूप में था ही नहीं। इसकी पड़ताल आज तक जारी है। अन्ना हजारे ने किस तरह अपनी विश्वसनीयता खो दी, इसे यहां दोहराने की जरूरत नहीं है।
अब आते हैं, कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) पर। अब तक प्रत्यक्ष रूप से यह किसी राजनीति पार्टी से जुड़ा आंदोलन नहीं लग रहा है। भले ही उसके प्रदर्शनों में सीपीआईएमल के नेता दीपांकर भट्टाचार्य शामिल हो चुके हैं, जंतर-मंतर पर लेफ्ट के छात्र संगठन सक्रिय हैं।
कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और अभिजीत दिपके को लोग अभी कई तरह से देख रहे हैंः
1. बहुत से लोग इसे कुतूहल से देख रहे हैं कि आखिर कैसे केवल एक्स पोस्ट के जरिये इतने सारे लोग जुट गए!
2. कहीं यह बुलबुला तो नहीं है, जल्द ही फट जाएगा ?
3. कॉकरोच जनता पार्टी और अभिजीत दिपके की राजनीतिक विचारधारा क्या है?
4. देश के दूसरे मुद्दों पर उनकी राय क्या है, मसलन, हिंदू मुस्लिम नरेटिव, एसआईआर, दल बदल, संवैधानिक संस्थाओं का क्षऱण, जांच एजेंसियों के दुरुपयोग, लोकतांत्रिक संस्थाओं के दमन इत्यादि?
5. परिसीमन और जाति जनगणना पर उनकी क्या राय है?
6. क्या उनका प्रदर्शन धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद रुक जाएगा और कॉकरोच जनता पार्टी भंग कर दी जाएगी या फिर बकायदा इसे आगे के लिए तैयार किया जाएगा?
इन सवालों के जवाबों से कॉकरोच जनता पार्टी की दशा और दिशा का पता चलेगा। तब तक इंतजार कीजिए। मगर अभी मत भूलिए कि इस जमावड़े में जुटने वाले युवा देश के ही छात्र-छात्राएं हैं। उन्हें संदेह से नहीं, बल्कि सहानुभूति से देखिए। यदि कोई परदे के पीछे से उनका इस्तेमाल कर भी रहा हो, तो यह देखिए कि ये हालात आखिर कैसे बन गए।
