बीजेपी एमपी ने संसद में कहा कि ओबीसी रिजर्वेशन का दुरुपयोग हो रहा है और कई राज्य मुसलमानों को इसके जरिये आरक्षण दे रहे हैं. मुसलमानों को ओबीसी की लिस्ट से बाहर करना चाहिए. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के फैसले इस पर कहा की – ये आप तय नहीं करेंगे
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राज्यसभा में बीजेपी सांसद के.लक्ष्मण ने अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण का मुद्दा उठाया. उन्होंने मुसलमानो पर आरोप लगाया कि धर्म के नाम पर ओबीसी आरक्षण का दुरुपयोग किया जा रहा है और कुछ राज्य मुसलमानों को यह आरक्षण दे रहे हैं. उन्होंने सरकार से मांग की कि ऐसे धर्म आधारित आरक्षण की समीक्षा की जाए और मुसलमानों को अन्य पिछड़ा वर्ग कोटे से बाहर किया जाए.
ताकि अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगो के अधिकारों का हनन न हो। उनके इस दावे पर विपक्षी दल भड़क गए और संसद से बाहर चले गए. लेकिन क्या संविधान में मुसलमानों को आरक्षण देने का कोई प्रावधान है? क्या धर्म के आधार पर आरक्षण दिया जा सकता है? सुप्रीम कोर्ट के फैसले इस बारे में क्या कहते हैं?
पहले समझते हैं कि संवैधानिक स्थिति क्या है? क्या धर्म के आधार पर आरक्षण संभव है?
तो बीजेपी सांसद के. लक्ष्मण की मांग कितनी सही? सुप्रीम कोर्ट बार-बार कह चुका है कि तुष्टिकरण के लिए या केवल धर्म के नाम पर दिया गया आरक्षण संविधान की मूल भावना के खिलाफ है. इसकी समीक्षा की मांग करना एक वैध संसदीय कदम है.लेकिन अगर उनकी मांग का यह अर्थ है कि सभी मुसलमानों को ओबीसी कोटे से पूरी तरह बाहर कर दिया जाए, तो यह सुप्रीम कोर्ट के ‘इंदिरा साहनी’ फैसले के सीधे खिलाफ होगा.
क्योंकि सुप्रीम कोर्ट मान चुका है कि गैर-हिंदू धर्मों में भी सदियों से पिछड़ापन मौजूद है. उन्होंने ने पुराने ज़माने में हो रहे अत्याचारों को झेला है। तो ये आरक्षण उनका भी अधिकार है।
संबैधानिक दृश्टिकोण से अगर देखे तो संविधान के अनुच्छेद 15(1) और 16(2) ये साफ-साफ कहता हैं कि राज्य किसी भी नागरिक के साथ केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा.
इसका सीधा सा अर्थ है कि भारत में सिर्फ धर्म के आधार पर आरक्षण असंवैधानिक है अनुच्छेद 15(4) और 16(4) राज्य को अधिकार देते हैं कि वह सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के नागरिकों की तरक्की के लिए विशेष प्रावधान कर सकता है.
इसी के तहत वह आरक्षण भी दे सकता है. यानि यह साफ है कि संविधान स्पष्ट कहता है कि आरक्षण का आधार धर्म नहीं हो सकता, बल्कि आरक्षण का आधार सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन होना चाहिए।
इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ का वो फैसला, जो तय करता है बहुत कुछ
जब भी OBC आरक्षण की बात होती है, तो सुप्रीम कोर्ट के इंदिरा साहनी केस (मंडल कमीशन वाला फैसला) को सबसे बड़ा आधार माना जाता है। इस फैसले में कोर्ट ने साफ कहा था कि “पिछड़ा वर्ग” (Backward Class) सिर्फ हिंदू जातियों तक सीमित नहीं है। यानी OBC की बात सिर्फ हिंदुओं के लिए नहीं होती।
कोर्ट ने ये भी माना कि मुसलमान, ईसाई और सिख समुदायों में भी ऐसे कई ग्रुप हैं जो समाज और पढ़ाई के मामले में काफी पीछे हैं। इसलिए अगर मुसलमानों के अंदर कोई ऐसा वर्ग है जो सच में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा है, तो उसे OBC में शामिल किया जा सकता है।
तो कुल मिलाकर फैसला ये बताता है कि सभी मुसलमानों को एक साथ ओबीसी मानकर आरक्षण देना असंवैधानिक है. लेकिन, मुसलमानों के भीतर मौजूद पिछड़े वर्गों जैसे- जुलाहे, बुनकर, बढ़ई, कसाई आदि को ओबीसी का दर्जा देना पूरी तरह से संवैधानिक है.
आंध्र प्रदेश में मुसलमानों को कैसे मिला आरक्षण
जब भी मुसलमानों को OBC आरक्षण देने की बात होती है, तो आंध्र प्रदेश का उदाहरण जरूर दिया जाता है। सबसे पहले 2004 में आंध्र प्रदेश सरकार ने सभी मुसलमानों को सीधे 5% आरक्षण देने का फैसला लिया। लेकिन हाईकोर्ट ने इसे तुरंत रद्द कर दिया, क्योंकि यह सिर्फ धर्म के आधार पर दिया गया आरक्षण था, जो संविधान के खिलाफ है। इसके बाद सरकार ने तरीका बदला।
उसने एक पिछड़ा वर्ग आयोग बनाया, जिसने मुसलमानों के अंदर ऐसे खास समूहों को पहचान किया जो सच में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पीछे थे। फिर 2007 में सरकार ने नया कानून बनाकर सिर्फ उन्हीं पिछड़े मुस्लिम समूहों को 4% आरक्षण दिया। इसे “E कैटेगरी” नाम दिया गया। बाद में यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभी के लिए यह 4% आरक्षण जारी रह सकता है, क्योंकि यह धर्म के आधार पर नहीं बल्कि पिछड़ेपन के आधार पर दिया गया है।
कुल मिलाकर यह साफ है कि भारत में आरक्षण का आधार धर्म के आधार पर नहीं, बल्कि सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसलों में बार-बार यह स्पष्ट किया है कि किसी भी पूरे धर्म को एक साथ आरक्षण देना असंवैधानिक है। हालांकि, अगर किसी धर्म के भीतर ऐसे वर्ग मौजूद हैं जो वास्तव में पिछड़े हैं, तो उन्हें OBC के तहत आरक्षण दिया जा सकता है।
यही वजह है कि कुछ राज्यों में मुसलमानों के खास पिछड़े समूहों को आरक्षण मिलता है, न कि पूरे समुदाय को। इसलिए, सभी मुसलमानों को OBC से बाहर करने की मांग पूरी तरह सही नहीं मानी जा सकती, क्योंकि यह सुप्रीम कोर्ट के स्थापित सिद्धांतों के खिलाफ होगी। अंत में, यह मुद्दा राजनीति से ज्यादा संविधान और न्यायिक व्याख्या से जुड़ा है जहां संतुलन बनाना जरूरी है, ताकि किसी के अधिकारों का हनन न हो और वास्तविक जरूरतमंदों को उनका हक मिल सके।
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पॉलिटिक्सवाला के लिए सोनम सिंह की रिपोर्ट
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