घूसखोर पंडत’ विवाद: फिल्म के नाम ने खड़ा किया सियासी तूफान, यूपी में दर्ज हुई FIR

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घूसखोर पंडत’ विवाद: फिल्म के नाम ने खड़ा किया सियासी तूफान, यूपी में दर्ज हुई FIR

उत्तर प्रदेश में ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज से पहले ही अभिनेता मनोज बाजपेयी की आगामी फिल्म ‘घूसखोर पंडत’ विवादों में घिर गई है। फिल्म के शीर्षक को लेकर ब्राह्मण समाज की भावनाएं आहत होने का आरोप लगाते हुए राज्य सरकार ने कड़ा कदम उठाया है।

लखनऊ के हजरतगंज थाने में फिल्म के निर्देशक और उनकी टीम के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। पुलिस ने यह कार्रवाई सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने, जातिगत भावनाओं को ठेस पहुंचाने और कानून व्यवस्था प्रभावित होने की आशंका के आधार पर की है।

पुलिस अधिकारियों के अनुसार, फिल्म के नाम और इसके प्रचार में इस्तेमाल किए गए शब्दों को लेकर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आईं। प्राथमिक जांच में पाया गया कि ‘पंडित’ शब्द को कथित रूप से रिश्वत और भ्रष्टाचार से जोड़कर दिखाया गया है, जिसे एक विशेष समुदाय को निशाना बनाने के रूप में देखा जा रहा है।

इसी वजह से फिल्म के खिलाफ विरोध तेज हुआ और विभिन्न संगठनों ने प्रदर्शन की चेतावनी दी, जिससे सार्वजनिक शांति भंग होने का खतरा बढ़ गया।

यह विवाद ऐसे वक्त सामने आया है, जब भारतीय जनता पार्टी पर उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण समुदाय की उपेक्षा के आरोप लगते रहे हैं। हाल के महीनों में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के नियमों और प्रयागराज में शंकराचार्य से जुड़े घटनाक्रम ने इस असंतोष को और हवा दी।

पार्टी के भीतर भी इस मुद्दे पर नाराजगी देखने को मिली थी, जब कुछ पदाधिकारियों ने विरोध जताते हुए इस्तीफे तक दे दिए थे। ऐसे माहौल में फिल्म का शीर्षक एक नए सियासी विवाद की वजह बन गया।

इस मामले में मायावती ने भी खुलकर प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने एफआईआर को सही ठहराते हुए कहा कि फिल्मों और वेब सीरीज में किसी जाति या समुदाय को गलत संदर्भ में दिखाना बेहद आपत्तिजनक है।

मायावती ने मांग की कि ऐसी सामग्री पर तत्काल रोक लगाई जाए, जो समाज में नफरत या विभाजन को बढ़ावा दे सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि ‘पंडित’ शब्द को भ्रष्टाचार से जोड़कर पूरे ब्राह्मण समाज को बदनाम करने की कोशिश की जा रही है।

विवाद बढ़ने के बाद फिल्म से जुड़े लोगों की ओर से सफाई भी सामने आई। मनोज बाजपेयी ने सोशल मीडिया पर कहा कि फिल्म का उद्देश्य किसी समुदाय को ठेस पहुंचाना नहीं है और जन भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए।

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वहीं फिल्म के निर्देशक नीरज पांडे ने स्पष्ट किया कि यह एक काल्पनिक पुलिस ड्रामा है और फिल्म का शीर्षक किसी वास्तविक समुदाय पर टिप्पणी नहीं करता। उन्होंने स्वीकार किया कि शीर्षक से कुछ लोगों को ठेस पहुंची है, इसलिए फिलहाल सभी प्रमोशनल सामग्री हटाने का फैसला लिया गया है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह विवाद केवल एक फिल्म तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश की जातिगत राजनीति से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार जहां कानून व्यवस्था और सामाजिक संतुलन बनाए रखने की बात कर रही है, वहीं विपक्ष इसे ब्राह्मण वोट बैंक से जोड़कर देख रहा है।

ऐसे में ‘घूसखोर पंडत’ विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि रचनात्मक अभिव्यक्ति की सीमा कहां खत्म होती है और सामाजिक संवेदनशीलता कहां से शुरू होती है


 

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