modi bureacrate

मोदी के ‘बागी’ अफसर को पांच साल जेल

Share Politics Wala News

मोदी के ‘बागी’ अफसर को पांच साल जेल

Share Politics Wala News

मनीलॉन्ड्रिंग/ गुडविल पेमेंट … गुजरात का एक और नौकरशाह निकला बेईमान

——————————————————————————————————–

जांच में सामने आया कि आईएएस अधिकारी प्रदीप निरंकारनाथ शर्मा ने “अवैध रूप से कमाए गए धन” को अपनी पत्नी श्यामल पी. शर्मा के जरिए वैध बनाने की कोशिश की। उनकी पत्नी को वेलस्पन ग्रुप से जुड़ी एक कंपनी ‘वैल्यू पैकेजिंग प्राइवेट लिमिटेड’ में बिना किसी पूंजी निवेश के 30% का भागीदार बना दिया गया।

#politicswaala special

अहमदाबाद। गुजरात के अहमदाबाद की एक विशेष पीएमएलए (धन शोधन निवारण अधिनियम) अदालत ने पूर्व आईएएस अधिकारी प्रदीप निरंकारनाथ शर्मा को मनी लॉन्ड्रिंग (धन शोधन) के गंभीर आरोपों में दोषी ठहराते हुए पांच साल की जेल की सजा सुनाई है।

रिपोर्ट के मुताबिक, यह मामला उस समय का है जब शर्मा 2 मई 2003 से 3 जून 2006 तक कच्छ जिले के भुज में कलेक्टर और जिला भूमि मूल्य निर्धारण समिति (डीएलपीसी) के अध्यक्ष के रूप में तैनात थे। शर्मा का जिक्र इसलिए भी किया जाता है, क्योंकि उन्होंने गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ पब्लिक और कोर्ट में बयान दिये थे।

अदालत ने अपने आदेश में पाया कि डीएलपीसी प्रमुख के पद पर रहते हुए शर्मा ने अन्य लोगों के साथ आपराधिक साजिश रची। उन्होंने अंजार तालुका के वर्षमेड़ी गांव में सरकारी जमीन वेलस्पन इंडिया लिमिटेड और उसकी सहयोगी कंपनियों को बेहद कम दरों पर आवंटित कर दी। शर्मा ने 78 रुपये प्रति वर्ग मीटर की निर्धारित सरकारी दर के बजाय महज 15 से 18 रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर पर कई भूखंड आवंटित किए। इस फैसले से सरकारी खजाने को सीधे तौर पर 1.2 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच में शर्मा के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग के पुख्ता सबूत मिले। जांच में सामने आया कि उन्होंने “अवैध रूप से कमाए गए धन” को अपनी पत्नी श्यामल पी. शर्मा के जरिए वैध बनाने की कोशिश की। उनकी पत्नी को वेलस्पन ग्रुप से जुड़ी एक कंपनी ‘वैल्यू पैकेजिंग प्राइवेट लिमिटेड’ में बिना किसी पूंजी निवेश के 30% का भागीदार बना दिया गया।

अदालत ने नोट किया कि उनकी पत्नी के बैंक ऑफ इंडिया के एनआरओ खाते में आए 22 लाख रुपये और 7.5 लाख रुपये का ‘गुडविल पेमेंट’ वास्तव में वेलस्पन ग्रुप को अनुचित लाभ पहुंचाने के बदले दी गई रिश्वत थी। इसके अलावा, जनवरी 2008 में उनकी पत्नी के नाम पर किया गया 1 लाख रुपये का निवेश 28 लाख रुपये से अधिक के लाभ वितरण का जरिया बन गया।

आरोपों के मुताबिक, इन पैसों का इस्तेमाल गांधीनगर में एक घर के लिए हाउसिंग लोन चुकाने और देहगाम में कृषि भूमि खरीदने में किया गया। इतना ही नहीं, ‘हवाला’ के जरिए करीब 1 करोड़ रुपये अमेरिका भेजे गए और उनकी पत्नी के अमेरिकी बैंक खातों में तीसरे पक्ष से पैसे मंगवाए गए।

सजा सुनाते हुए कोर्ट ने सख्त टिप्पणी की. अदालत ने कहा कि चूंकि आरोपी एक आईएएस अधिकारी था और उसने कलेक्टर व डीएम जैसे जिम्मेदार पदों पर रहते हुए भ्रष्टाचार किया और अपने आधिकारिक पद का दुरुपयोग किया, इसलिए वह किसी भी तरह की दया का हकदार नहीं है। शर्मा ने अनुरोध किया था कि उनकी इस सजा को उनकी पिछली सजाओं के साथ साथ चलाया जाए, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और मनी लॉन्ड्रिंग अधिनियम दोनों अलग-अलग उद्देश्यों वाले कानून हैं. अपराध की गंभीरता को देखते हुए दोनों सजाएं अलग-अलग चलेंगी।

‘स्नूपगेट’ के आरोपों से लेकर 5 साल की जेल तक

गुजरात कैडर के 1984 बैच के रिटायर्ड आईएएस अधिकारी प्रदीप शर्मा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच चला आ रहा लंबा विवाद एक बार फिर सुर्खियों में है. हाल ही में 7 दिसंबर 2025 को शर्मा को मनी लॉन्ड्रिंग के एक मामले में 5 साल की जेल की सजा सुनाई गई है. लेकिन इस कानूनी लड़ाई की जड़ें 2013 के बहुचर्चित “स्नूपगेट” या “स्टॉकगेट” कांड और 2002 के गुजरात दंगों से जुड़ी हैं।

विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स (इंडिया टुडे, एनडीटीवी, द इंडियन एक्सप्रेस) के विश्लेषण के अनुसार, प्रदीप शर्मा कभी गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी के करीबी माने जाते थे. लेकिन बाद में वे बागी हो गए और उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य मशीनरी का दुरुपयोग कर उनकी आवाज़ दबाने की कोशिश की जा रही है।

‘इंडिया टुडे’ की नवंबर 2013 की रिपोर्ट के मुताबिक, शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट में दायर एक हलफनामे में आरोप लगाया था कि नरेंद्र मोदी ने एक युवा महिला आर्किटेक्ट, की अवैध जासूसी (Surveillance) का आदेश दिया था। शर्मा का दावा था कि 2001 के कच्छ भूकंप के बाद एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में उन्होंने ही सोनी को मोदी से मिलवाया था। शर्मा ने आरोप लगाया कि मोदी और सोनी के बीच “नज़दीकियां” बढ़ गई थीं और उन्हें सरकारी ठेकों का लाभ दिया गया।

शर्मा के अनुसार, 2009 तक आते-आते मोदी ने तत्कालीन गृह मंत्री अमित शाह के ज़रिए राज्य पुलिस को सोनी और उनके परिवार की पल-पल की ख़बर रखने और कई शहरों में उनकी गतिविधियों को ट्रैक करने का आदेश दिया। 2013 में लीक हुए ऑडियो टेप्स ने इन आरोपों को तूल दिया, जिससे 2014 के चुनाव प्रचार के दौरान भारी विवाद हुआ। बीजेपी ने बचाव में कहा था कि यह निगरानी सोनी की सुरक्षा के लिए थी क्योंकि शर्मा उनकी स्टॉकिंग या पीछा कर रहे थे।

शर्मा ने अपने हलफनामे में दावा किया कि उन्हें भ्रष्टाचार और मनी लॉन्ड्रिंग के 10 से ज़्यादा मामलों में इसलिए फंसाया गया क्योंकि मोदी को डर था कि शर्मा के पास सीएम से जुड़ी एक “संवेदनशील वीसीडी” (Sensitive VCD) है. इसके अलावा, इस विवाद के तार 2002 के गुजरात दंगों से भी जुड़ते हैं. शर्मा ने एसआईटी के सामने दावा किया था कि मोदी के कार्यालय से उन्हें फोन कर कहा गया था कि वे अपने आईपीएस भाई, कुलदीप शर्मा को दंगों के दौरान अल्पसंख्यकों की मदद के लिए “सक्रिय कदम” उठाने से रोकें हालांकि, एसआईटी ने मोदी को क्लीन चिट दी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में बरकरार रखा।

इसी दौरान, उनके भाई कुलदीप शर्मा के खिलाफ भी 1984 के एक पुराने मामले में गैर-जमानती वारंट जारी किया गया है। आलोचक इन कार्यवाहियों को मोदी के विरोधियों के खिलाफ “बदले की राजनीति” के रूप में देखते हैं, जबकि सरकार का कहना है कि शर्मा एक भ्रष्ट अधिकारी हैं और कानून अपना काम कर रहा है।

मोदी पर उंगली उठाने वाले नौकरशाह

नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहने के दौरान (2001-2014), सरकार की आलोचना करने वाले या 2002 के दंगों की जांच से जुड़े कई वरिष्ठ पुलिस (IPS) और प्रशासनिक (IAS) अधिकारियों को ट्रांसफर, निलंबन, प्रमोशन रुकने और गिरफ्तारी जैसी कार्रवाइयों का सामना करना पड़ा। मानवाधिकार समूहों ने इसे “व्हिसलब्लोअर्स” (गड़बड़ी उजागर करने वालों) के खिलाफ बदले की कार्रवाई बताया, जबकि गुजरात सरकार का तर्क था कि यह अनुशासनहीनता या कदाचार के लिए की गई कार्रवाई थी।

प्रमुख मामले और अफसरों की सूची

संजीव भट्ट (IPS): पूर्व अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक . भट्ट ने 2011 में सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर आरोप लगाया कि मोदी ने 2002 में गोधरा कांड के बाद वरिष्ठ अधिकारियों को हिंदुओं को “गुस्सा निकालने” की छूट देने का निर्देश दिया था। इसके कुछ ही दिनों बाद उन्हें ड्यूटी से नदारद रहने के आरोप में निलंबित कर दिया गया. 2015 में उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।

आर.बी. श्रीकुमार (IPS): पूर्व अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (इंटेलिजेंस). इन्होंने 2002 के दंगों को रोकने में सरकार की विफलता और जांच में राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोप लगाए. 2005 में उनका प्रमोशन रोक दिया गया और उन्हें कम महत्व वाले पदों पर ट्रांसफर कर दिया गया. 2011 में एसआईटी (SIT) ने भी माना कि निष्पक्ष अधिकारियों का तबादला किया गया था।

कुलदीप शर्मा (IPS): पूर्व अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक( सीआईडी). पप्रदीप शर्मा के आईपीएस भाई ने केतन पारेख घोटाले में तत्कालीन गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ रिश्वत के आरोपों की जांच की थी. 2008 में उन्हें सजा के तौर पर ‘गुजरात राज्य भेड़ एवं ऊन विकास विभाग’ में ट्रांसफर कर दिया गया, जो एक पुलिस अधिकारी के लिए असामान्य था. 2025 में, उन्हें 41 साल पुराने एक मामले में दोषी ठहराते हुए गैर-जमानती वारंट जारी किया गया, जिसे आलोचक बदले की कार्रवाई मानते हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2002 के बाद कम से कम पांच ऐसे व्हिसलब्लोअर आईपीएस अधिकारियों को “पनिशमेंट पोस्टिंग” दी गई थी, जिन्होंने सरकार के रुख पर सवाल उठाए थे.

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *