नई दिल्ली। मणिपुर में तीन माह बाद भी हिंसा पूरी तरह नहीं थमी है। राज्य के पहाड़ी इलाकों में अब भी हिंसक घटनाओं पर अंकुश नहीं लगाया जा सका है। इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने रिटायर्ड जजों की जो कमेटी बनाई थी, उसने मणिपुर पर अपनी रिपोर्ट शीर्ष कोर्ट को सौंप दी है। उसने अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया है कि कैसे हिंसाग्रस्त मणिपुर में हालात सामान्य होंगे। मणिपुर में हिंसा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने जिस कमेटी का गठन किया है, उसने मंगलवार को अपनी रिपोर्ट पेश कर दी है। पैनल ने जली हुई बस्तियों, शवों और अन्य समस्याओं पर गंभीरता से मंथन किया है और अपनी ओर से सुझाव भी दिए हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने रिटायर्ड जस्टिस गीता मित्तल की अगुवाई में एक कमेटी का गठन किया था, जिसने हिंसाग्रस्त क्षेत्रों का दौरा करके रिपोर्ट तैयार की है।
कमेटी ने सुझाव दिया है कि जीपीएस मैपिंग और फोटो की जांच के माध्यम से जो गांव नष्ट हुए हैं, उनकी संपत्ति की जानकारी निकाली जा सकती है। ताकि कितना नुकसान हुआ है और उसकी भरपाई के लिए आंकलन किया जा सके। राजधानी इम्फाल में बड़ी संख्या में अनजान शव रखे हैं, ऐसे में जो लोग अभी शिविरों में रुके हुए हैं उनके लिए शवों की पहचान करना मुश्किल है। पैनल ने कहा है कि स्थानीय प्रशासन को ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए, जिसके जरिए परिजन इन शवों की पहचान कर सकें।
यहां पढ़ने वाले छात्रों को भी हिंसा की वजह से काफी नुकसान उठाना पड़ा है। ऐसे में पैनल ने सुझाव दिया है कि यहां के छात्रों को अन्य राज्यों के संस्थानों में शिफ्ट कर देना चाहिए, ताकि उनकी पढ़ाई और समय का नुकसान ना हो। इस मामले में केंद्र सरकार, यूजीसी को दखल देना चाहिए और इसपर गौर करना चाहिए। पैनल ने मणिपुर हिंसा में प्रभावित लोगों के लिए सुझाव दिया है कि लोगों का पुनर्वास उसी जगह पर किया जाए, जहां से वे विस्थापित किए गए थे। जो लोग लापता हैं, उनकी जानकारी निकालने के लिए त्वरित कार्रवाई होनी चाहिए। स्कूलों को जल्द से जल्द शुरू करने की कोशिश करनी चाहिए। आदिवासी कैदियों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। छात्रों के डॉक्यूमेंट्स को जो नुकसान हुआ है, उन्हें कैसे सुधारा जाए इस ओर कदम उठाने चाहिए। राहत शिविरों में शिशु आहार की आपूर्ति करनी चाहिए। बता दें कि मणिपुर में 3 मई के बाद से हिंसा का दौर शुरू हो गया था, जो अब तक जारी है। अब तक 150 से अधिक लोग हिंसा में अपनी जान गंवा चुके हैं। मैतइ और कुकी समुदाय के बीच आरक्षण को लेकर शुकु हुए विवाद ने जातीय हिंसा का रूप लिया और यह आग पूरे राज्य में फैल गई। करीब 3 महीने से जारी इस हिंसा से हजारों परिवार प्रभावित हुए हैं। उन्हें हिंसा की इस आग में अपनों को खोना पड़ा है और अपना घर छोड़ना पड़ा है।
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