भारत का ‘AI Impact Summit 2026’: लोकतंत्रीकरण का दावा या तकनीकी शक्ति का प्रदर्शन?

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भारत का ‘AI Impact Summit 2026’: लोकतंत्रीकरण का दावा या तकनीकी शक्ति का प्रदर्शन?

नई दिल्ली में 16 फरवरी से शुरू हो रहा ‘AI Impact Summit 2026’ भारत सरकार के लिए एक वैश्विक मंच पर अपनी तकनीकी नेतृत्व क्षमता दिखाने का अवसर है।

यह सम्मेलन Bharat Mandapam में आयोजित हो रहा है और इसे वैश्विक दक्षिण में आयोजित पहली बड़ी एआई शिखर बैठक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। इससे पहले ऐसे सम्मेलन Bletchley Park 2023, Seoul और Paris में हो चुके हैं।

सरकार इसे “एआई के लोकतंत्रीकरण” की दिशा में ऐतिहासिक कदम बता रही है, लेकिन कार्यक्रम की संरचना और भागीदारी पर उठ रहे सवाल इस दावे को चुनौती देते दिखाई देते हैं।

सत्ता और कॉरपोरेट का एजेंडा

सम्मेलन में कुल 793 सार्वजनिक कार्यक्रम प्रस्तावित हैं। विश्लेषण से संकेत मिलता है कि इनमें लगभग 40% सत्र केंद्र और राज्य सरकारों से जुड़े विभागों द्वारा आयोजित किए जा रहे हैं, जबकि लगभग 35% कार्यक्रम बड़ी टेक कंपनियों और उद्योग संगठनों के नियंत्रण में हैं।

‘CEO Roundtable’ और ‘Leaders’ Plenary’ जैसे प्रमुख मंचों पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के शीर्ष अधिकारियों की प्रमुख भूमिका है। इसके उलट, श्रमिक संगठनों, मानवाधिकार समूहों या हाशिए पर मौजूद समुदायों के लिए समान स्तर का कोई उच्च-स्तरीय मंच नजर नहीं आता।

इस संरचना से यह धारणा मजबूत होती है कि नीति-निर्माण की दिशा सरकार और कॉरपोरेट हितों के बीच तय हो रही है। सम्मेलन की शब्दावली में “Innovation”, “Growth”, “Efficiency” और “Scale” जैसे शब्द प्रमुख हैं, जबकि “Human Rights”, “Accountability” और “Discrimination” जैसे मुद्दे अपेक्षाकृत हाशिए पर दिखाई देते हैं।

सांस्कृतिक प्रतीकवाद और राजनीतिक संदेश

सम्मेलन की थीम को “सूत्र” और “चक्र” जैसे संस्कृत शब्दों में बांटना केवल भाषाई प्रयोग नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संदेश भी माना जा रहा है।

आलोचकों का कहना है कि यह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की उस राजनीति का विस्तार है, जिसमें तकनीकी नीतियों को भी परंपरागत प्रतीकों के साथ जोड़ा जा रहा है।

सम्मेलन को प्रधानमंत्री की ‘दृष्टि’ का विस्तार बताने पर भी जोर दिया जा रहा है, जिससे यह आयोजन केवल तकनीकी विमर्श न रहकर राजनीतिक छवि-निर्माण का माध्यम बनता दिखाई देता है।

नई दिल्ली की सड़कों पर सम्मेलन से पहले किए गए सौंदर्यीकरण और अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई भी चर्चा में है। इससे यह धारणा बनी है कि आयोजन का जोर वास्तविक नीति-संशोधन से अधिक दृश्य प्रभाव और अंतरराष्ट्रीय छवि निर्माण पर है।

घोषणापत्र बनाम जमीनी हकीकत

सम्मेलन के अंत में “Delhi AI Resolution” या “Delhi Statement” जारी किए जाने की संभावना है। हालांकि, पिछले अनुभवों के आधार पर ऐसे घोषणापत्रों की प्रभावशीलता पर सवाल उठ रहे हैं।

उदाहरण के तौर पर, G20 Summit के दौरान डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (DPI) को लेकर पारदर्शिता और मानवाधिकारों पर जोर दिया गया था, लेकिन बाद में लागू किए गए डेटा संरक्षण कानून को कई पारदर्शिता कार्यकर्ताओं ने कमजोर बताया।

आलोचकों का कहना है कि यदि एआई नीति में भी इसी तरह के अपवाद और छूट शामिल किए गए, तो यह नागरिक अधिकारों के लिए चुनौती बन सकता है।

इसके अलावा, सार्वजनिक क्षेत्र में एआई के उपयोग जैसे पुलिसिंग और कल्याण योजनाओं से जुड़े जोखिमों पर स्पष्ट चर्चा का अभाव भी चिंता का विषय है। गलत गिरफ्तारी, भेदभावपूर्ण एल्गोरिदम या राशन वितरण में तकनीकी त्रुटियों जैसे मुद्दे अभी भी ठोस नियामक ढांचे की प्रतीक्षा में हैं।

स्पेक्टेकल या सार्थक संवाद?

सम्मेलन के दौरान दिल्ली के होटलों में कमरों की कीमतें हजारों डॉलर तक पहुंचने की खबरें इस आयोजन के भव्य स्वरूप को रेखांकित करती हैं। बड़े पैमाने पर मीडिया कवरेज, सोशल मीडिया अभियानों और वैश्विक सीईओ की मौजूदगी इसे एक तकनीकी महोत्सव का रूप दे सकती है।

सवाल यह है कि क्या यह आयोजन वास्तव में एआई के लोकतंत्रीकरण की दिशा में ठोस कदम उठाएगा या फिर यह शक्ति और पूंजी के गठजोड़ का प्रदर्शन भर रह जाएगा?

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फिर भी, इसमें भाग लेने वाले कई शोधकर्ता, नागरिक समाज के प्रतिनिधि और नीति विशेषज्ञ उम्मीद कर रहे हैं कि वे मानवाधिकार-आधारित ढांचे की वकालत कर पाएंगे।

लेकिन सम्मेलन की वर्तमान संरचना यह संकेत देती है कि अंतिम एजेंडा तय करने की शक्ति अब भी सरकार और बड़े उद्योग समूहों के हाथ में केंद्रित है।

ऐसे में ‘AI Impact Summit 2026’ भारत के लिए एक अहम कूटनीतिक अवसर तो है, पर इसकी वास्तविक उपलब्धि इस बात से तय होगी कि क्या यह तकनीकी प्रगति के साथ-साथ नागरिक अधिकारों और सामाजिक न्याय को भी समान प्राथमिकता देता है

 

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