चुनावी राजनीति में पैसा बांटने की जो प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है, उसने लोकतंत्र की मूल भावना को ही कमजोर कर दिया है। अब मतदाता से नीति, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था और विकास जैसे सवाल पीछे छूटते जा रहे हैं, और उसकी जगह यह देखना ज्यादा महत्वपूर्ण बना दिया गया है कि कौन-सी पार्टी सीधे उसके खाते में क्या डाल रही है।
यह स्थिति बेहद खतरनाक है, क्योंकि जब वोट का आधार विचार, कार्यक्रम और जनहित से हटकर सीधा आर्थिक लालच बन जाता है, तब सत्ता पाने का तरीका भी जनसेवा नहीं बल्कि प्रलोभन बन जाता है। ऐसे में सरकारें जनता को आत्मनिर्भर बनाने के बजाय उसे अपने ऊपर निर्भर बनाए रखने की राजनीति करने लगती हैं।
हाल में बिहार में महिलाओं के खातों में 10 हजार रुपये जैसी योजनाओं पर जो बहस हुई, उसने इसी प्रवृत्ति को फिर से सामने ला दिया है। ऐसी योजनाओं को लाभार्थी-केन्द्रित कल्याण बताया जाता है, लेकिन चुनाव से ठीक पहले इनके लागू होने का समय इनकी मंशा पर सवाल उठाता है। इसी तरह किसानों के खातों में समय-समय पर आने वाली किस्तें भी कई बार कल्याण से ज्यादा चुनावी रणनीति का हिस्सा लगने लगती हैं। जब चुनाव नजदीक आते हैं, तब किस्तों की रफ्तार बढ़ जाती है, और जनता के मन में यह संदेश बैठाया जाता है कि सरकार से सीधा पैसा मिलना ही सबसे बड़ा लाभ है।
यही कारण है कि कई मतदाता अब न रोजगार की बात करते हैं, न शिक्षा की, न कानून-व्यवस्था की; वे बस यह पूछते हैं कि अभी क्या मिल रहा है और आगे क्या मिलेगा। यह लोकतंत्र के लिए स्वस्थ संकेत नहीं है, बल्कि एक ऐसी स्थिति है जिसमें नागरिक का अधिकार धीरे-धीरे सरकारी कृपा में बदल जाता है।
इस टेंडेंसी का एक और नुकसान यह है कि गरीब और जो निम्न आय वर्ग का बड़ा हिस्सा विवश मतदाता बनता चला जाता है। जब मुफ्त राशन, नकद सहायता, खातों में ट्रांसफर और दूसरी योजनाएँ लगातार चुनावी माहौल में जोड़ी जाती हैं, तब जनता के सामने स्वतंत्र विकल्प कम और तात्कालिक लाभ का दबाव ज्यादा होता है। राजनीतिक दल भी इस मानसिकता को समझते हैं और फिर वे नीति की जगह लाभ की भाषा बोलते हैं।
इससे यह धारणा मजबूत होती है कि सरकार का काम दीर्घकालिक सुधार करना नहीं, बल्कि समय-समय पर छोटा मोटा आर्थिक सहारा देकर चुनाव जीतना है। भाजपा पर यह आरोप अक्सर लगाया जाता है कि वह ऐसी योजनाओं का चुनावी लाभ उठा लेती है, लेकिन सच यह भी है कि भारत की कई पार्टियाँ इस तरह की राजनीति में शामिल रही हैं। फर्क यह है कि जिस दल के पास शासन की सत्ता होती है, उसके पास वितरण का सीधा साधन होता है, इसलिए उसका असर ज्यादा दिखाई देता है। हाल के ही चुनावों में आप देख सकते हैं जैसे केरलम में UDF ने अपना मेनिफेस्टो जारी कर दिया।
जिसमें कॉलेज जाने वाली छात्राओं को हर महीने 1,000 रुपये की मदद का वादा किया है। वहीं वेलफेयर पेंशन में हर महीने 3,000 रुपये देने की बात कही है। दरअसल, सत्ता में रहने वाली पार्टी जब प्रशासन, मीडिया और संगठन का उपयोग करके यह प्रचार करती है कि पैसा सबको मिलेगा या आगे भी मिलेगा, तब लाभ पाने वाला और लाभ से वंचित रहने वाला, दोनों वर्गों के मतदाता उसके पक्ष में झुक सकते हैं। लाभ पाने वाला तत्काल आभारी भाव से, और लाभ न पाने वाला भविष्य की आशा से। यही इस राजनीति की सबसे बड़ी चाल हैं।
पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों के में भी यही सवाल उठता है कि क्या वहां भी राजनीतिक पाटियां अपने घोषणापत्रों में केवल वैचारिक बातें करती हैं, या सीधे नकद और मुफ्त लाभ को केंद्र में रखती हैं। आज कई राज्यों में चुनावी घोषणापत्र का अर्थ ही यह हो गया है कि किसे कितनी नकद सहायता, कितनी सब्सिडी, कितने मुफ्त अनाज, कितनी महिला सहायता, और कितने सीधे बैंक ट्रांसफर दिए जाएंगे।
असम में महिलाओं के लिए लागू हुई योजनाओं और बंगाल में चल रही कल्याणकारी राजनीति को देखकर यह साफ दिखता है कि चुनावी मुकाबला अब सिर्फ नीतियों का नहीं, बल्कि नकद प्रलोभनों का भी हो गया है। यह कहना सही नहीं होगा कि सिर्फ एक पार्टी यह करती है। लगभग सभी बड़े दल किसी न किसी रूप में यही रास्ता अपनाते हैं।
अंतर सिर्फ इतना है कि किसी के पास सत्ता से जुड़ा प्रशासनिक तंत्र ज्यादा मजबूत है, तो किसी के पास संगठन और क्षेत्रीय पकड़। इसलिए मतदाता को यह समझना होगा कि असली सवाल यह नहीं है कि कौन थोड़े पैसे दे रहा है, बल्कि यह है कि कौन स्थायी रोजगार, बेहतर प्रशासन, कानून का राज और सामाजिक सम्मान दे रहा रहा है।
अगर किसी चुनाव में भाजपा का मुकाबला ऐसी पार्टी से हो, जिसने लाखों लोगों को रोजगार, प्रशासनिक स्थिरता और कानून-व्यवस्था के भरोसे की राजनीति दी हो, तो तुलना सिर्फ नकद लाभ और मुफ्त राशन तक सीमित नहीं रहेगी। तब मतदाता यह पूछेगा कि कुछ हजार रुपये या कुछ किस्तें बेहतर हैं, या ऐसी व्यवस्था बेहतर है जिसमें उसे नौकरी, सुरक्षा, सम्मान और भविष्य की गारंटी मिले।
यही वह बिंदु है जहां भाजपा और उसकी विचारधारा को सबसे बड़ी चुनौती मिल सकती है। क्योंकि अगर आम मतदाता ने समझ लिया कि थोड़े से पैसे के बदले स्थायी अवसर और सामाजिक न्याय को खोना उसके हित में नहीं है, तब नकद-आधारित चुनावी राजनीति कमजोर पड़ सकती है।
यही वजह है कि मीडिया, राजनीतिक रणनीतिकार और अनेक दल अक्सर ऐसा नैरेटिव बनाने की कोशिश करते हैं कि मुख्य टक्कर किसी ऐसी पार्टी से न दिखे जो वास्तविक सामाजिक-आर्थिक बदलाव की बात करती हो। वे विपक्ष को इस तरह पेश करते हैं कि मतदाता को लगे कि विकल्प सिर्फ दो ही हैं: एक तरफ सत्ता की मशीनरी और दूसरी तरफ असमर्थ, बिखरा हुआ विपक्ष।
लेकिन यह भी सच है कि मतदाता अब पहले जैसा भोला नहीं रहा। वह धीरे-धीरे समझने लगा है कि मुफ्त पैसे, मुफ्त अनाज और चुनावी घोषणाएँ हमेशा उसके स्थायी हित में नहीं होतीं। वह यह भी समझने लगा है कि जो दल सत्ता में रहकर या सत्ता में आने के लिए समाज को केवल लाभार्थी बनाता है, वह नागरिकता को कमजोर करता है। लालच मनुष्य का स्वभाव हो सकता है, लेकिन राजनीति का काम उस लालच को और बढ़ाना नहीं, बल्कि उसे जिम्मेदारी और अधिकारबोध में बदलना होना चाहिए।
अगर जनता यह समझ ले कि उसे सिर्फ पैसा नहीं, बल्कि रोजगार, कानून-व्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान चाहिए, तो चुनावी राजनीति की दिशा बदल सकती है। आज जरूरत इस बात की है कि मतदाता हर चुनाव में यह सवाल पूछे कि सरकार ने उसे थोड़े समय का लाभ दिया या उसका भविष्य बेहतर बनाया।
सिर्फ बैंक खाते में पैसे आने से कोई समाज मजबूत नहीं होता। समाज तब मजबूत होता है जब उसके युवाओं को काम मिले, महिलाओं को सम्मान और सुरक्षा मिले, किसानों को उचित दाम मिले, गरीब को अधिकार मिले और प्रशासन में न्याय दिखे। अगर यह नहीं हो रहा, तो नकद सहायता सिर्फ चुनावी चाल बनकर रह जाती है।
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