ममता के मायाजाल से, शिक्षा में बड़ा नुकसान..

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शिक्षा नीति पर टकराव और आर्थिक दबाव, किस दिशा में जा रहा है पश्चिम बंगाल?

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पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों शिक्षा और आर्थिक नीति को लेकर नई बहस छिड़ गई है। राज्य सरकार द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू न करने के फैसले को लेकर केंद्र और राज्य के बीच मतभेद सामने आए हैं। बताया जा रहा है कि यदि यह नीति लागू होती तो समग्र शिक्षा अभियान के तहत केंद्र सरकार से राज्य को लगभग 10 हजार करोड़ रुपये की अतिरिक्त सहायता मिल सकती थी। लेकिन नीति लागू न होने के कारण यह राशि राज्य को नहीं मिल पाई, जिससे शिक्षा क्षेत्र को लेकर चर्चा और तेज हो गई है।

ऐतिहासिक रूप से पश्चिम बंगाल को देश के प्रमुख शैक्षणिक और बौद्धिक केंद्रों में गिना जाता रहा है। 19वीं सदी के बंगाली पुनर्जागरण ने यहां साहित्य, शिक्षा और सामाजिक चेतना को नई दिशा दी थी। कोलकाता, जिसे पहले कलकत्ता कहा जाता था, आधुनिक शिक्षा के विकास का बड़ा केंद्र रहा है। यहां 1857 में स्थापित कलकत्ता विश्वविद्यालय, विश्वभारती विश्वविद्यालय और आईआईटी खड़गपुर जैसे संस्थानों ने देश की शिक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। लंबे समय तक बंगाल को ज्ञान और बौद्धिक परंपरा का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है।

हालांकि हाल के वर्षों में राज्य की शिक्षा व्यवस्था को लेकर कई सवाल उठने लगे हैं। विभिन्न रिपोर्टों में बताया गया है कि राज्य के कई स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी है। कुछ अनुमानों के अनुसार देश में ऐसे स्कूलों की बड़ी संख्या पश्चिम बंगाल में है, जहां पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं। इससे शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए तो इसका असर आने वाली पीढ़ियों पर पड़ सकता है।

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने भी इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि नई शिक्षा नीति में मातृभाषा में शिक्षा को बढ़ावा देने की बात कही गई है। उनके अनुसार इससे स्थानीय भाषाओं में पढ़ाई को मजबूती मिल सकती है और छात्रों को अपनी भाषा में बेहतर तरीके से शिक्षा मिल सकेगी। उन्होंने यह भी कहा कि यदि भविष्य में राज्य में राजनीतिक बदलाव होता है तो शिक्षा क्षेत्र को प्राथमिकता दी जाएगी।

डिजिटल शिक्षा के क्षेत्र में भी राज्य को लेकर कई तरह की चर्चाएं सामने आई हैं। राष्ट्रीय स्तर पर स्कूलों में इंटरनेट और डिजिटल संसाधनों की पहुंच लगातार बढ़ रही है, जबकि पश्चिम बंगाल के कई सरकारी स्कूलों में यह सुविधा अभी सीमित बताई जाती है। इसी तरह मध्याह्न भोजन योजना के आंकड़ों को लेकर भी चर्चा हुई है। केंद्र सरकार के स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग ने इस योजना के तहत लाभ लेने वाले छात्रों की संख्या में गिरावट को लेकर राज्य से रिपोर्ट मांगी थी।

वित्तीय स्थिति की बात करें तो पश्चिम बंगाल पर कर्ज का बोझ भी लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025 में राज्य को कर और गैर-कर राजस्व के रूप में लगभग 1.09 लाख करोड़ रुपये प्राप्त हुए, लेकिन इसमें से करीब 45 हजार करोड़ रुपये केवल ब्याज भुगतान में खर्च हो गए। इसका अर्थ यह हुआ कि राज्य के कुल राजस्व का लगभग 42 प्रतिशत हिस्सा कर्ज के ब्याज चुकाने में चला गया।

दूसरी ओर राज्य सरकार सामाजिक योजनाओं को आगे बढ़ाने पर भी जोर दे रही है। आगामी विधानसभा चुनावों को देखते हुए बेरोजगार युवाओं के लिए मासिक भत्ते की योजना को पहले लागू करने का फैसला किया गया है। इसके अलावा महिलाओं के लिए चल रही लक्ष्मी भंडार योजना के तहत मिलने वाली आर्थिक सहायता में भी वृद्धि की गई है, जिसे बजट के बाद लागू किया गया

इसी बीच सरकारी स्कूलों में कार्यरत पैरा शिक्षकों का मुद्दा भी चर्चा में बना हुआ है। वेतन वृद्धि और नियमितीकरण की मांग को लेकर कई जगह प्रदर्शन हुए हैं। इन शिक्षकों को वर्तमान में लगभग 10 से 13 हजार रुपये मासिक मानदेय मिलता है और वे संविदा आधार पर काम करते हैं।

विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम बंगाल इस समय शिक्षा, अर्थव्यवस्था और राजनीति से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवालों के दौर से गुजर रहा है। एक ओर केंद्र और राज्य के बीच नीति को लेकर मतभेद हैं, वहीं दूसरी ओर राज्य सरकार सामाजिक योजनाओं और राजनीतिक प्राथमिकताओं को आगे बढ़ा रही है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इन चुनौतियों के बीच राज्य की शिक्षा व्यवस्था और आर्थिक विकास किस दिशा में आगे बढ़ते हैं।

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