जबलपुर
मध्य प्रदेश स्थित व्हीकल फैक्ट्री जबलपुर (वीएफजे) के इंजीनियर दशकों पुराने उन तकनीकी दस्तावेजों और डिजाइनों को डिकोड कर रहे हैं, जो रूसी भाषा में लिखे गए हैं। ये दस्तावेज कभी केवल मूल कार्यक्रम से जुड़े लोगों के इस्तेमाल के लिए तैयार किए गए थे।
तमिलनाडु के अवाडी स्थित हेवी व्हीकल्स फैक्ट्री (एचवीएफ) के सहयोग से वीएफजे ने टैंकों को खोलने और दोबारा असेंबल करने वाले विशेष उपकरणों के लगभग 70% सोवियत-कालीन रेखाचित्रों को सफलतापूर्वक डिकोड कर लिया है।
जिन उपकरणों के मूल चित्र उपलब्ध नहीं हैं, उनके लिए फैक्ट्री स्वदेशी स्तर पर नए डिजाइन विकसित कर रही है। इस परियोजना का लक्ष्य अप्रैल 2028 से हर साल भारतीय सेना के 80 टैंकों का पूरी तरह कायाकल्प करना है।
क्या है भारतीय बख्तरबंद बेड़े का इतिहास?
भारतीय सेना के मुख्य युद्धक बेड़े में सोवियत मूल के T-72 अजेय और रूसी डिजाइन वाले T-90 भीष्म टैंक शामिल हैं। भारत ने पहले 310 T-90 टैंक खरीदने का समझौता किया था, जिसमें टेक्निकल ट्रांसफर की शर्त शामिल थी।
इसके बाद वर्ष 2001 में अवाडी कारखाने में 1000 T-90 टैंकों के लाइसेंस प्राप्त उत्पादन के लिए एक बड़ा अनुबंध हुआ। उस दौरान उत्पादन तकनीक स्थापित करने के लिए रूसी विशेषज्ञों ने भारत का दौरा किया था और भारतीय इंजीनियरों को विशेष प्रशिक्षण के लिए रूस भेजा गया था।
अवाडी के बाद जबलपुर बनेगा देश का दूसरा बड़ा कायाकल्प केंद्र
दो T-72 टैंकों से जुड़े एक पायलट प्रोजेक्ट को सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद व्हीकल फैक्ट्री जबलपुर को यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई। अब जबलपुर को अवाडी के साथ देश के दूसरे मुख्य टैंक ओवरहाल केंद्र के तौर पर तैयार किया जा रहा है।
अवाडी और जबलपुर दोनों इकाइयां रक्षा सार्वजनिक उपक्रम (पीएसयू) आर्मर्ड व्हीकल्स निगम लिमिटेड (एवीएनएल) के अंतर्गत आती हैं।
VFJ के उप महाप्रबंधक हर्ष भटनागर ने बताया कि चूंकि कई मूल डिजाइन दशकों पुराने और रूसी भाषा में हैं, इसलिए विशेष फिक्स्चर, मशीनरी और प्लांट लेआउट का गहन अध्ययन किया गया है। दोनों इकाइयों के विशेषज्ञ मिलकर काम कर रहे हैं और परियोजना समय पर आगे बढ़ रही है।
क्या होता है टैंक का कायाकल्प?
टैंक का ओवरहाल उसकी सामान्य सर्विसिंग से बिल्कुल अलग और बेहद जटिल प्रक्रिया है। इसमें पूरे टैंक को पूरी तरह खोला जाता है, उसके एक-एक पुर्जे और तकनीकी प्रणाली की गहन जांच की जाती है, घिसे या खराब घटकों की मरम्मत की जाती है या उन्हें बदला जाता है, फिर पूरे टैंक को दोबारा जोड़कर कड़े परीक्षणों से गुजारा जाता है। एक टैंक के संपूर्ण ओवरहाल में लगभग चार महीने का समय लगता है।
वर्तमान में इस परियोजना पर करीब 80 विशेषज्ञ काम कर रहे हैं, जो मुख्य रूप से टैंक के हल यानी निचले ढांचे और बुर्ज यानी टॉवर पर केंद्रित हैं। अगले चरण में आंतरिक प्रणालियों पर काम शुरू होगा।
पूरी क्षमता से काम करने के लिए VFJ को लगभग 650 प्रशिक्षित कर्मियों की आवश्यकता होगी, जिसके लिए दो साल से प्रशिक्षण जारी है। इस पूरी परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 462 करोड़ रुपये है।
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