पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा से पहले बिरयानी, मांसाहार और हिंदू दुकानों से खरीदारी को लेकर विवाद चर्चा में है। जानिए बंगाल की खान-पान संस्कृति और इस राजनीति के संभावित प्रभाव।
पश्चिम बंगाल में खाने को लेकर क्यों बढ़ रही है राजनीति?
पिछले एक दशक में पश्चिम बंगाल में खान-पान की राजनीति सार्वजनिक बहस और टकराव का एक प्रमुख विषय बनकर उभरी है। क्या खाना है और क्या नहीं, खाना कौन बनाएगा, कौन बेचेगा और किसकी दुकान से खरीदा जाएगा—ये सभी सवाल राजनीतिक विवादों का हिस्सा बन गए हैं।
वर्ष 2025 में कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में आयोजित एक सार्वजनिक गीता पाठ कार्यक्रम के दौरान चिकन पफ बेचने वाले एक मुस्लिम रेहड़ी-पटरी विक्रेता के साथ मारपीट की गई थी। वहीं, पिछले विधानसभा चुनाव से पहले सोशल मीडिया के एक इन्फ्लुएंसर ने आरोप लगाया था कि पार्क स्ट्रीट के एक लोकप्रिय रेस्तरां में उसे मटन स्टेक की जगह बीफ परोसा गया। इस पोस्ट के बाद बड़ा विवाद खड़ा हो गया।
सत्ता में आने के बाद भाजपा सरकार को भी इस सवाल पर आलोचना का सामना करना पड़ा कि क्या स्कूली बच्चों को मध्याह्न भोजन में अंडे दिए जाएंगे। इसी बीच, हिंदू धर्मगुरु बागेश्वर बाबा ने दुर्गा पूजा के दौरान मांसाहार खाने वाले बंगालियों को ‘पाखंडी’ कहा था।
अब दुर्गा पूजा से कुछ दिन पहले सिलीगुड़ी में हिंदू जागरण मंच ने पोस्टर लगाए, जिन पर लिखा था—“आपको बिरयानी खाने से कोई नहीं रोक रहा, लेकिन इसे किसी हिंदू की दुकान से खाइए।” कोन्नगर जैसे दूसरे इलाकों में भी खान-पान, खरीदारी और मांसाहारी भोजन बेचने वाली दुकानों के प्रचार को लेकर इसी तरह के अभियान सामने आए हैं।
भारत में खान-पान की राजनीति कोई नई बात नहीं
भारतीय राजनीति में भोजन लंबे समय से राजनीतिक लामबंदी, सरकारी नीतियों और बाजार से जुड़े फैसलों का माध्यम रहा है।
हाल के वर्षों में धार्मिक और वेलनेस से जुड़े उपदेशकों द्वारा शाकाहार को बढ़ावा देना, शाकाहारी और मांसाहारी लोगों के बीच जातिगत तथा सांप्रदायिक विभाजन पैदा करने के प्रयास, संसद में महंगाई के सवाल पर वित्त मंत्री का प्याज न खाने का बयान, उत्तर भारत के कुछ राज्यों में हिंदू त्योहारों के दौरान मांस की दुकानों को बंद करने की मांग और एक फूड डिलीवरी कंपनी द्वारा ‘प्योर-वेज फ्लीट’ शुरू करना—ये सभी उदाहरण इसी बहस का हिस्सा हैं।
रेहड़ी-पटरी विक्रेताओं की पहचान सार्वजनिक करने के लिए उनके नाम प्रदर्शित करने के सरकारी आदेश और मुस्लिम खाद्य विक्रेताओं के बहिष्कार की अपीलें भी इस राजनीति से जुड़ी रही हैं।
ऐसे में यह आश्चर्यजनक नहीं है कि बंगाल के सार्वजनिक जीवन में खान-पान की राजनीति तेज होने का समय भाजपा और हिंदुत्ववादी संगठनों के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव के साथ मेल खाता है।
बंगाल में शाकाहार को धार्मिक शुद्धता से जोड़ना आसान नहीं
हालांकि, बंगाल की सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिति दूसरे राज्यों से अलग है। यहां शाकाहार को धार्मिकता और शुद्धता से जोड़ने वाली पारंपरिक हिंदू बहुसंख्यकवादी सोच को व्यापक सामाजिक स्वीकृति दिलाना आसान नहीं है।
बंगाल के खान-पान की आदतें जगजाहिर हैं। डेटा फॉर इंडिया में नीलीना सुरेश के 2025 के एक लेख के अनुसार, पश्चिम बंगाल की 99 प्रतिशत आबादी अंडे, मछली, चिकन और मांस जैसे गैर-शाकाहारी खाद्य पदार्थों का सेवन करती है।
यहां तक कि हिंदू धार्मिक परंपराओं में भी देवी-देवताओं को मछली और मांस का भोग लगाने की प्रथाएं मौजूद हैं। ऐसे में हिंदुओं को एकजुट करने और सामाजिक विभाजन पैदा करने के लिए शाकाहार को बढ़ावा देना राजनीतिक रूप से कठिन हो सकता है।
भाजपा के लिए असहज स्थिति पैदा कर चुकी है खाने की राजनीति
लेख के अनुसार, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उससे जुड़े संगठनों ने सामाजिक मान्यताओं और खान-पान की आदतों को बदलने की दिशा में अभियान चलाए हैं। सोशल मीडिया पर मत्स्य अवतार और मछली खाने की आदतों को जोड़ने वाले मीम्स से लेकर जमीन पर शाकाहार को बढ़ावा देने वाले अभियानों तक, इसके उदाहरण देखे जा सकते हैं।
लेकिन भोजन से जुड़ी इस तरह की सामाजिक इंजीनियरिंग ने कई बार भाजपा के लिए राजनीतिक असहजता भी पैदा की है।
विधानसभा चुनावों के दौरान भाजपा के कई उम्मीदवार हाथों में मछली लेकर प्रचार करते दिखाई दिए थे। उनका उद्देश्य मतदाताओं को यह भरोसा दिलाना था कि सत्ता में आने पर उनकी मांसाहारी खान-पान की आदतों में हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा।
भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष ने सार्वजनिक रूप से कहा था, “बंगाली पाठा खाबे”, यानी बंगाली मटन खाते रहेंगे।
बागेश्वर बाबा के बयान के बाद मुख्यमंत्री ने कालीघाट मंदिर जाकर देवी को अर्पित किए जाने वाले पारंपरिक मछली के प्रसाद का सेवन भी किया था।
हिंदू दुकानों से बिरयानी खरीदने का अभियान क्या संकेत देता है?
हिंदू जागरण मंच का हालिया अभियान बंगाल की उस राजनीति का नया रूप है, जिसे मानवविज्ञानी अर्जुन अप्पादुरई ने ‘गैस्ट्रो-पॉलिटिक्स’ कहा है। इसका आशय भोजन से जुड़े सामाजिक लेन-देन के दौरान सांस्कृतिक या आर्थिक संसाधनों को लेकर पैदा होने वाले संघर्ष और प्रतिस्पर्धा से है।
इस बार हिंदुत्ववादी संगठनों का अभियान सीधे तौर पर मांसाहारी भोजन पर प्रतिबंध लगाने की मांग नहीं कर रहा है। ऐसा कदम त्योहारों के दौरान भाजपा और सरकार के लिए नई राजनीतिक मुश्किलें पैदा कर सकता है।
इसके बजाय, यह मुस्लिम दुकानदारों के सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार के जरिए हिंदुओं को एकजुट करने का प्रयास है। लेख के अनुसार, इस तरह की रणनीति उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों से प्रभावित दिखाई देती है।
अप्पादुरई के अनुसार, भोजन से जुड़ी राजनीति लोगों के बीच समानता, निकटता और एकजुटता पैदा कर सकती है। दूसरी ओर, यही राजनीति सामाजिक पदानुक्रम, दूरी और विभाजन को भी मजबूत कर सकती है।
बंगाल के वार्षिक दुर्गा पूजा उत्सव की भावना पहले पहलू से अधिक मेल खाती है, जबकि केवल हिंदू दुकानों से बिरयानी खरीदने का पोस्टर अभियान दूसरे पहलू को बढ़ावा देने का प्रयास करता है।
आने वाले दिनों में यह अभियान किस दिशा में आगे बढ़ता है और इसका सामाजिक तथा राजनीतिक प्रभाव क्या होता है, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।
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