उपचुनाव के चुनाव परिणाम की X-रे रिपोर्ट
दतिया में इन कारणों से हार गई भाजपा
भोपाल। दतिया उपचुनाव ने मध्यप्रदेश की राजनीति को तगड़ा झटका दिया है। सत्ता को हिलाया तो कांग्रेस को मिली उम्मीद। ये नतीजा सिर्फ एक सीट का फैसला नहीं, बल्कि दोनों दलों की रणनीति और भविष्य की राजनीति का संकेत भी बन गया।
मुख्यमंत्री, मंत्री, विधायक और संगठन की पूरी ताकत झोंकने के बावजूद बीजेपी प्रत्याशी आशुतोष तिवारी कांग्रेस के घनश्याम सिंह से 6,016 वोटों से हार गए। 2023 में भी कांग्रेस ने इसी सीट पर डॉ. नरोत्तम मिश्रा को 7,742 वोटों से हराया था।
आखिर सत्ता में रहते बीजेपी यहाँ क्यों हार गई।
कारण 1 – टिकट बदलने का फैसला पार्टी पर भारी पड़ा
सीट खाली होने के बाद डॉ. नरोत्तम मिश्रा ने उपचुनाव की तैयारी शुरू कर दी थी और समर्थकों को उनके उम्मीदवार बनने की उम्मीद थी। हालांकि अंतिम समय में बीजेपी ने टिकट बदलकर आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बना दिया।
टिकट बदलने के विरोध में नरोत्तम समर्थकों ने करीब 18 घंटे तक ग्वालियर-झांसी हाईवे जाम रखा।डॉ. मिश्रा के समझाने पर आंदोलन खत्म हुआ, लेकिन जानकारों के अनुसार कार्यकर्ताओं की नाराजगी मतदान तक बनी रही।
प्रदेश नेतृत्व के मुताबिक उसने केंद्रीय नेतृत्व को डॉ. नरोत्तम मिश्रा का नाम भेजा था, जिससे टिकट बदलने का फैसला केंद्र स्तर का माना गया। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यदि बदलाव तय था तो मिश्रा को विश्वास में लेकर अहम जिम्मेदारी दी जा सकती थी। ऐसा नहीं होने से संगठन और कार्यकर्ताओं का मनोबल प्रभावित हुआ।
कारण 2. जातीय समीकरण नहीं साध सकी पार्टी
चुनाव में जातीय समीकरणों पर भाजपा ने विशेष जोर दिया। दतिया में करीब 40 हजार कुशवाह और 20 हजार यादव मतदाता हैं। यादव समाज तक पहुंचने के लिए मुख्यमंत्री ने प्रचार किया, जबकि कुशवाह वोटरों की जिम्मेदारी सांसद भारत सिंह कुशवाह को सौंपी गई।
चुनाव के दौरान कुशवाह सम्मेलन हुए और मुख्यमंत्री लव-कुश मंदिर भी पहुंचे। पार्टी को दोनों समुदायों के समर्थन की उम्मीद थी, लेकिन टिकट बदलाव के बाद इन वर्गों का एक हिस्सा बीजेपी के साथ पूरी तरह नहीं जुड़ा।
कारण 3. नरोत्तम समर्थकों की निष्क्रियता
पिछले करीब 18 वर्षों से दतिया में डॉ. नरोत्तम मिश्रा संगठन और सत्ता का प्रमुख चेहरा रहे। संगठन के कई पदों पर भी उनके समर्थकों का प्रभाव रहा। टिकट कटने के बाद बड़ी संख्या में समर्थक चुनावी अभियान में सक्रिय नहीं दिखे। जानकारों के अनुसार वे पार्टी में रहते हुए भी दूरी बनाए रहे।
कम समय के कारण बीजेपी गांव-गांव फैले इस नेटवर्क को दोबारा सक्रिय नहीं कर सकी।स्थिति संभालने के लिए दूसरे जिलों और आसपास की विधानसभा सीटों से कार्यकर्ताओं को बुलाया गया, लेकिन स्थानीय भौगोलिक और सामाजिक समझ की कमी दिखी। इसका उदाहरण यह रहा कि कुछ कार्यकर्ता दतिया की जगह भांडेर विधानसभा क्षेत्र के गांवों में प्रचार करने पहुंच गए।
कारण 4. विधायक और मंत्रियों की तैनाती भी बेअसर रही
भाजपा ने चुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्न मानते हुए पूरी ताकत लगाई। 291 बूथों को 20 शक्ति केंद्रों में बांटकर प्रत्येक की जिम्मेदारी एक विधायक को दी गई। इसके अलावा आठ मंत्रियों ने भी लगातार दौरे किए। चुनाव परिणाम बताते हैं कि यह रणनीति मतदाताओं को प्रभावित नहीं कर सकी। न विधायक बूथ स्तर पर अपेक्षित माहौल बना पाए, न मंत्रियों की मौजूदगी चुनावी समीकरण बदल सकी।
कारण 5. 2023 की नाराजगी बरकरार
विश्लेषकों का मानना है कि 2023 विधानसभा चुनाव के बाद मतदाताओं में बनी नाराजगी उपचुनाव तक पूरी तरह खत्म नहीं हुई। बीजेपी ने चुनाव में दतिया के विकास को प्रमुख मुद्दा बनाया, लेकिन सड़क, पानी, रोजगार और व्यापार जैसे स्थानीय मुद्दों पर मतदाता सरकार के दावों से पूरी तरह संतुष्ट नहीं दिखे।
पार्टी ने चुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया, फिर भी स्थानीय असंतोष दूर नहीं कर सकी। 2023 के मुकाबले इस उपचुनाव में मतदान करीब 9 प्रतिशत कम रहा, जिसका असर चुनाव परिणाम में भी दिखाई दिया।
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