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तेहरान। ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत हो चुकी है। ईरान के सरकारी टीवी चैनल ने इसकी पुष्टि की है। उनके बेटी और दामाद भी इस हमले में मारे गए। ईरान में 40 दिन का शोक।
ख़ामेनेई एक बार नहीं बल्कि अलग-अलग मौक़ों पर कई बार ये ज़ाहिर कर चुके थे कि इसराइल को लेकर उनके इरादे क्या हैं। ख़ामेनेई खुलकर इसराइल के अस्तित्व को मिटाने की बात करते रहे। वो लंबे समय से इसराइल को पश्चिम एशियाई क्षेत्र का एक ऐसा ‘कैंसरग्रस्त ट्यूमर’ बताते रहे, जिसे उखाड़ फेंकना ज़रूरी है और उनके मुताबिक़ ये होकर रहेगा।
बीते साल जून में शायद ये पहली बार था जब इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने ख़ामेनेई को निशाने पर लिए जाने से जुड़ी कोई बात सीधे और सार्वजनिक तौर पर कही हो। एबीसी चैनल को दिए एक इंटरव्यू में इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू से जब पूछा गया कि क्या अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने, ईरान के सुप्रीम लीडर की हत्या से जुड़ी इसराइली योजना को ये कहते हुए ख़ारिज कर दिया कि इससे क्षेत्र में संघर्ष बढ़ सकता है?
नेतन्याहू ने जवाब में कहा था कि ख़ामेनेई की मौत “संघर्ष को बढ़ाने के बजाय, उसे ख़त्म करने का काम करेगी। नेतन्याहू के इस बयान से यह संकेत मिला कि इसराइल, आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई को निशाना बनाने की योजना पर काम कर रहा है, लेकिन अमेरिका के राष्ट्रपति की ओर से उसे अब तक हरी झंडी नहीं मिली है।
रिपोर्ट के मुताबिक़, ट्रंप ने इसराइली प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू से कहा कि ख़ामेनेई की हत्या करना उचित नहीं होगा, क्योंकि इससे इसराइल और ईरान के बीच जारी संघर्ष और ज़्यादा भड़क सकता है। हालांकि, उसके बाद अमेरिका के राष्ट्रपति ने अपने एक बयान में कहा था, “हम अभी के लिए ख़ामेनेई को मारने नहीं जा रहे हैं।
बीते साल ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर एक पोस्ट में लिखा था, “हमें अच्छी तरह पता है कि तथाकथित सुप्रीम लीडर ख़ामेनेई कहां छिपे हुए हैं। वह एक आसान टारगेट हैं, लेकिन वहां सुरक्षित हैं। हम उन्हें मारने नहीं जा रहे, कम से कम अभी के लिए नहीं. लेकिन हम यह भी नहीं चाहते कि आम नागरिकों या अमेरिकी सैनिकों पर मिसाइल दागी जाएं।
ऐसे में इसराइल के सैन्य और ख़ुफ़िया अभियानों के पैटर्न और ट्रंप के बयान को मिलाकर देखें, तो इस बात पर यक़ीन करना मुश्किल हो जाता था कि आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई पर संकट के बादल नहीं मंडरा रहे थे।
बीते साल जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के सेंटर फ़ॉर वेस्ट एशियन स्टडीज़ में प्रोफ़ेसर एके महापात्रा ने बताया था कि भले ही इसराइल अपने हमलों को यह कहकर जायज़ ठहरा रहा है कि उसने ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकने के लिए ये क़दम उठाए हैं, लेकिन उसका असल मक़सद आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई को सत्ता से बेदखल करना ही है।
आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई इतने महत्वपूर्ण क्यों रहे और कैसे वह बीते साढ़े तीन दशकों से ईरान के सबसे ताक़तवर व्यक्ति बने रहे. जानिए इस कहानी में.
मौलवी से इस्लाम के सुप्रीम कमांडर तक
आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई का जन्म 1939 में ईरान के उत्तर-पूर्वी शहर मशहद में हुआ, जिसे देश का सबसे पवित्र शहर माना जाता है। अपने पिता की तरह उन्होंने भी मौलवी बनने की राह चुनी और शिया मुसलमानों के दो प्रमुख शैक्षणिक केंद्रों में से एक, क़ुम में जाकर धार्मिक शिक्षा प्राप्त की. महज़ 11 साल की उम्र में वह मौलवी बन गए थे।
हालांकि, ख़ामेनेई उस दौर के ईरान में बड़े हो रहे थे जब शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी का शासन था. उस समय ईरान एक राजतंत्र था, जहां पहलवी वंश के शाह सत्ता में थे। शाह एक पंथनिरपेक्ष राजा माने जाते थे, जो धर्म को एक प्राचीन और अप्रासंगिक अवधारणा मानते थे. वे धार्मिक लोगों को शक की निगाह से देखते थे।
ईरानी-अमेरिकी लेखक मेहदी ख़ालाजी का जिन्होंने ख़ामेनेई की जीवनी पर काम किया। मेहदी ख़ालाजी ने ख़ामेनेई के शुरुआती वर्षों से जुड़ा एक क़िस्सा साझा किया। उन्होंने बताया कि जब ख़ामेनेई मौलवियों की पोशाक पहनकर अपने हमउम्र बच्चों के साथ सड़कों पर खेलते, तो लोग उनका मज़ाक उड़ाया करते थे।
वे यह भी बताते हैं कि अपने शुरुआती वर्षों में ख़ामेनेई को सिगरेट और पाइप पीना पसंद था- जो एक धार्मिक व्यक्ति के लिए अपेक्षाकृत असामान्य आदत मानी जाती थी। जैसे-जैसे ख़ामेनेई बड़े हुए, शाह शासन के प्रति उनकी नाराज़गी और विरोध बढ़ता गया। उन्होंने जल्द ही शाह के मुख्य विरोधी अयातुल्लाह रुहोल्लाह ख़ुमैनी के समर्थन में काम करना शुरू कर दिया।
इंडियन काउंसिल ऑफ़ वर्ल्ड अफ़ेयर्स में फ़ेलो और मध्यपूर्व मामलों के जानकार डॉ. फ़ज़्ज़ुर रहमान सिद्दीक़ी बताते हैं कि ख़ुमैनी के प्रभाव में आने से पहले ख़ामेनेई को कविताएं लिखने का बहुत शौक़ था. वे “अमीन” नाम से कविताएं लिखा करते थे. लेकिन ख़ुमैनी से प्रभावित होने के बाद उन्होंने यह रचनात्मक गतिविधि पूरी तरह छोड़ दी।
अयातुल्लाह रुहोल्लाह ख़ुमैनी उस समय शाह के सबसे मुखर आलोचकों में से एक थे. अमेरिका से नज़दीकी संबंधों का विरोध करने के चलते शाह ने उन्हें देश से निष्कासित कर दिया था। ख़ुमैनी चाहते थे कि ईरान में इस्लामी शासन स्थापित हो. ख़ामेनेई ने ख़ुमैनी के संदेश को देश के भीतर फैलाना शुरू किया. इसी प्रयास में उन्हें छह बार गिरफ़्तार भी किया गया।
फिर साल 1979 में इस्लामिक क्रांति में शाह की सत्ता गिर गई और अयातुल्लाह रुहोल्लाह ख़ुमैनी ने पेरिस से लौटकर ईरान में इस्लामिक गणराज्य की स्थापना की। वरिष्ठ पत्रकार सईद नक़वी बताते हैं कि उस समय ईरान की सड़कों पर केवल दो लोगों की तस्वीरें दिखती थीं- एक अयातुल्लाह ख़ुमैनी की और दूसरी हुसैन अली मोंतज़री की।
इस्लामिक ईरान में अब शासन की बागडोर मौलवियों के हाथ में थी, और इन्हीं मौलवियों में एक नाम अली ख़ामेनेई का भी था. वह बहुत कम समय में ख़ुमैनी के सबसे क़रीबी सहयोगियों में शामिल हो गए। इसी साल तेहरान में अमेरिकी दूतावास पर क़ब्ज़े की घटना में भी ख़ामेनेई ने अहम भूमिका निभाई. इस घटनाक्रम के बाद अमेरिका से संवाद स्थापित करने की ज़िम्मेदारी भी उन्हें सौंपी गई। बाद में अली ख़ामेनेई को देश का उप-रक्षा मंत्री नियुक्त किया गया. इस दौरान उन्होंने इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) को संगठित करने में अहम भूमिका निभाई।
इस बल को स्थापित करने का उद्देश्य था- ऐसी सेना खड़ी करना जो देश के लिए धार्मिक, राजनीतिक और आर्थिक मोर्चों पर लड़ सके और इस्लामिक राष्ट्र को न सिर्फ़ बाहरी ख़तरों, बल्कि आंतरिक संकटों से भी सुरक्षित रख सके.
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