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क्या आपने कभी सोचा है कि जब आप अपने फोन पर एक बटन दबाते हैं और 10 मिनट में जादू की तरह सामान आपके दरवाजे पर आ जाता है, तो उसके पीछे किसकी सांसें फूल रही होती हैं? किसकी जान दांव पर लगी होती है?
नया साल आने वाला है. 31 दिसंबर की रात जश्न की रात होगी. लोग पार्टियों में होंगे, केक कटेंगे, बिरयानी ऑर्डर होगी. लेकिन इस बार शायद वो डिलीवरी बॉय आपकी घंटी न बजाए. भारत के करीब सवा करोड़ गिग वर्कर्स में से एक बड़ा हिस्सा हड़ताल पर जाने की तैयारी कर रहा है. 25 दिसंबर को जो हुआ, वो महज़ एक ट्रेलर था. असली फिल्म 31 दिसंबर को रिलीज़ होने वाली है.
शेख सलाउद्दीन जो तेलंगाना गिग एंड प्लेटफॉर्म वर्कर्स यूनियन के प्रेसिडेंट हैं और खुद भी एक ड्राइवर हैं. उनकी बातें सुनकर आपको अपने फोन में मौजूद उन रंग-बिरंगे ऐप्स—ज़ोमैटो, स्विगी, ब्लिंकिट, अमेज़न—को देखने का नज़रिया बदल जाएगा।
पार्टनर नहीं, डिजिटल गुलाम : कंपनियां इन्हें ‘पार्टनर’ कहती हैं. सुनने में अच्छा लगता है. पर सलाउद्दीन बताते हैं कि यह कैसी पार्टनरशिप है. “बाज़ार बढ़ रहा है, महंगाई बढ़ रही है, लेकिन हमारा पे-आउट गिरता जा रहा है. पहले एक ऑर्डर के 80 रुपये मिलते थे, फिर 60 हुए, 40 हुए और अब 15-20 रुपये पर आ गए हैं. कई बार तो 5-7 रुपये ही मिलते हैं. क्या पार्टनरशिप में एक पार्टनर अमीर होता जाता है और दूसरा सड़क पर आ जाता है?”
10 मिनट की जानलेवा दौड़ : सबसे डरावना पहलू है ‘10 मिनट डिलीवरी’ का जुनून. सलाउद्दीन पूछते हैं, “क्या 10 मिनट में ग्रोसरी या खाना न आने से किसी की जान चली जाएगी? लेकिन उस 10 मिनट के चक्कर में डिलीवरी वर्कर की जान ज़रूर जा रही है.”
हवा में ज़हर घुला है, कोहरा है, सड़कें जाम हैं. लेकिन एल्गोरिदम को इससे मतलब नहीं. अगर आप लेट हुए, तो पेनाल्टी लगेगी. अगर कस्टमर ने रेटिंग कम दी, तो आपकी आईडी ब्लॉक हो जाएगी. आईडी ब्लॉक होने का मतलब है—बेरोज़गारी. और इसके खिलाफ अपील करने की कोई जगह नहीं है. यह एक ऐसा ‘डिजिटल कोर्ट’ है जहां सिर्फ सज़ा मिलती है, सुनवाई नहीं होती.
अमिताभ बच्चन और ‘कुली’ का विरोधाभास: सलाउद्दीन ने बातचीत में एक बहुत दिलचस्प और चुभने वाली बात कही. सदी के महानायक अमिताभ बच्चन, जिन्होंने ‘कुली’ फिल्म में मज़दूरों का रोल कर शोहरत पाई, आज वो इन कंपनियों के लिए विज्ञापन कर रहे हैं. वो नौजवानों को कह रहे हैं कि “आ जाओ, जुड़ जाओ, इलेक्ट्रिक व्हीकल ले जाओ.” सलाउद्दीन कहते हैं, “अगर बच्चन साहब मेरी गाड़ी में बैठेंगे तो मैं उनसे पूछूंगा—सर, आपने मज़दूर बनकर ही नाम कमाया था, आज आप उन्हीं मज़दूरों को बरगलाने वाले ऐड क्यों कर रहे हैं?
क्या आप हमारे हक के लिए हमारे कंधे पर हाथ रखेंगे?” एक्सीडेंट होने पर क्या होता है? सलाउद्दीन बताते हैं कि कंपनियों ने ‘बल्क इंश्योरेंस’ ले रखा है. लेकिन इसमें पेंच है. अगर आप ‘ऑन-ड्यूटी’ हैं, तभी क्लेम मिलेगा. अगर आप लॉग-आउट करके चाय पी रहे हैं या घर लौट रहे हैं और हादसा हो गया, तो आप भगवान भरोसे हैं. और हां, इंश्योरेंस का क्लेम मिलेगा या नहीं, यह भी आपकी ‘रेटिंग’ (गोल्ड, सिल्वर, ब्रॉन्ज़) तय करती है. यानी आपकी सुरक्षा भी आपके स्टार्स पर निर्भर है.
यह भारत का पहला एल्गोरिदम-ड्रिवन ‘डिजिटल सत्याग्रह’ है. सलाउद्दीन कहते हैं, “हम कोई तोड़-फोड़ नहीं करेंगे, कोई नारा नहीं लगाएंगे. हम बस अपना फोन बंद करेंगे और पार्क में बैठेंगे, घर पर बैठेंगे. हम भी न्यू ईयर मनाएंगे.” अगर 31 दिसंबर को लाखों वर्कर्स ने लॉग-इन नहीं किया, तो उन कंपनियों के शेयर बाज़ार हिल जाएंगे जो इन वर्कर्स के खून-पसीने पर टिकी हैं. एक अर्थशास्त्री ने सलाउद्दीन को फोन करके कहा भी कि आपकी हड़ताल से शेयर मार्केट पर असर पड़ रहा है. सलाउद्दीन का जवाब था— “मार्केट उनका है, पर मेहनत हमारी है.”तो इस 31 तारीख को अगर आपका ऑर्डर लेट हो, या कैंसिल हो जाए, तो उस डिलीवरी पार्टनर को कोसने से पहले एक बार सोचिएगा. वो शायद अपनी गरिमा और अपने हक की लड़ाई लड़ रहा है—खामोशी से, अपना फोन स्विच ऑफ करके.
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