सिंधिया वैचारिक रूप से ‘निर्वस्त्र’ हो गए

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नागपुर के संघ कार्यालय में जाकर ज्योतिरादित्य सिंधिया ने साबित कर दिया कि वे वैचारिक रूप से शून्य हैं, और सत्ता के लिए किसी भी ड्योढ़ी से उन्हें परहेज नहीं, इसका असर उपचुनाव में उनके समर्थकों की हार के रूप में भी सामने आ सकता है

पंकज मुकाती (राजनीतिक विश्लेषक )

ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बुधवार को अपने जीवन की सबसे बड़ी भूल की। वे अब कभी खुद को वैचारिक मुद्दों वाला नेता नहीं कह सकेंगे। राजनीतिक दलों को छोड़कर दूसरे दल में जाना अलग बात है। सियासत में अब सब जायज है। पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक (आरएसएस ) के मुख्यालय में जाना अलग है।

ऐसा करके ज्योतिरादित्य ने अपनी खुद की गरिमा को अपनी ही नजरों में गिरा लिया। क्योंकि संघ मुख्यालय जाने का मतलब है, अपनी पूरी ज़िंदगी भर की विचारधारा को केवल चुनावी राजनीति और सत्ता हथियाने के लिए कुर्बान कर देना। एक तरह से सिंधिया का ये कदम उनको वैचारिक रूप से शून्य साबित करता है। वे राजनीति के इस बाज़ार में अब निर्वस्त्र दिखाई दे रहे हैं।

कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल होना आवरण बदलना है। पर अपने विचारों को फायदों के लिए किसी ‘संघ’ के चरणों में रख देना दीनता का प्रतीक है। ज्योतिरादित्य ने कुछ ऐसा ही किया। सिंधिया ने अपने पिता स्वर्गीय माधवराव सिंधिया के उसूलों का भी ख्याल नहीं किया।

अपना पहला चुनाव जनसंघ के  बैनर तले लड़ने वाले माधवराव सिंधिया ने जब उसे छोड़ा तो फिर कभी पलटकर नहीं देखा। तमाम मतभेदों के बावजूद वे कांग्रेस में बने रहे। कांग्रेस भी उन्हें विचारधारा वाला प्रतिबद्ध नेता मानते हैं।

1996 में माधवराव सिंधिया ने कांग्रेस छोड़ी पर उस दौर में उन्होंने अपने सोच को ज़िंदा रखा। भाजपा का दामन थामने के बजाय सिंधिया ने मध्यप्रदेश विकास पार्टी बनाकर चुनाव लड़ा और जीते भी। उनका रुतबा और हैसियत ऐसी थी कि भाजपा ने उनके खिलाफ 1996 में कोई उम्मीदवार ही मैदान में नहीं उतारा।

1999 में वे कांग्रेस से सांसद बने। यही कारण है कि माधवराव सिंधिया आज भी राजनीति में एक सम्मानीय नाम है। ज्योतिरादित्य ने ये अवसर खो दिया। अब उनपर अवसरवादी होने की मोहर लग गई।

आखिर ज्योतिरादित्य इतने कमजोर क्यों हो गए ? वो महाराज जिसके नाम पर भाजपा ने पूरा अभियान चलाया हो। माफ़ करो महाराज। वो शिवराज और संघ जिसने हमेशा 1857 की गद्दारी को सिंधिया विरासत को जमकर कोसा, उनके खेल में सिंधिया एक मोहरा बनकर खड़े हो गए। क्या सिर्फ एक चुनाव हारने से कोई आदमी इस कदर हताश हो जाता है।

इसके मायने हैं कि ज्योतिरादित्य एक खोखले और कमजोर नेता हैं। जो एक आंधी में अपने उसूल, परिवार की साख और खुद की गरिमा को बचाने में नाकामयाब रहे। अगर वे मजबूत होते तो कांग्रेस के भीतर ही रहकर संघर्ष करते और खुद को साबित करते। 1857 के ‘गद्दारी’ के दाग को उनकी दादी और उनके पिता ने अपने कर्मों से बड़ी मेहनत करके धोया था। आज संघ की शरण में जाकर ज्योतिरादित्य ने फिर एक नया दाग अपने दामन पर लगा लिया।

इस लेख का मकसद संघ के अच्छे या बुरे होने से कतई नहीं है। संघ अपनी विचारधारा से जुड़ा संगठन है। पर ज्योतिरादित्य जिस संघ के खिलाफ पूरी ज़िंदगी बोलते रहे, वे अब कैसे अपने करीबियों से नजरे मिला पाएंगे। संघ के प्रतिबद्ध #कितने लोग सिंधिया और उनके समर्थकों को वोट देंगे इसका फैसला तो वक्त करेगा। पर जो संघ अपनी विचारधारा के आगे देश और किसी व्यक्ति विशेष दोनों को कुछ न समझता हो, वो क्या सिंधिया के चार कदम चलने से उनके प्रति उदार हो जाएगा ?

शायद, कभी नहीं। सिंधिया ने अपनी गरिमा के साथ अपने समर्थक 22 विधायकों के लिए भी मुश्किल खड़ी कर दी है। संघ से नजदीकी के चलते सिंधिया ने बहुत बड़े वर्ग को नाराज़ भी कर लिया है। उप चुनाव में इसका असर देखने को मिल सकता है। एक पल के लिए सोचिये यदि ज्योतिरादित्य सिंधिया संघ मुख्यालय नागपुर न भी जाते तो उनकी हैसियत में कौन सी कमी हो जाती ?

इलायची… अब शायद ही लोगों को याद हो। रफी अहमद किदवई नामक एक नेता थे। कानून की डिग्री थी उनके पास, पर कभी वकालत नहीं की। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के रहनेवाले. वहां मिट्टी का पुश्तैनी घर था ,खपरैल। आजीवन केंद्रीय मंत्री रहे, पर मरने के बाद उनकी पत्नी और बच्चे गांव, बाराबंकी लौट आये. उसी टूटे-फूटे खपड़ैल घर में। आजीवन केंद्रीय मंत्री और कांग्रेस के कद्दावर नेता रहने के बावजूद उनके पास कोई संपत्ति नहीं थी, दिल्ली में घर नहीं था। स्वतंत्रता सेनानी किदवई साहब अकेले, गांधीवादी राजनीति के पुष्प नहीं थे। राजनीति में सिद्धांतों-विचारों पर चलनेवाले ऐसे लोगों की तब लंबी कतार थी।

फिर…आज की राजनीति में सामंत और संपन्न व्यक्ति अपनी विचारधारा से समझौता करके खुद को दीन बनाने पर क्यों आमादा रहते हैं।

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