कांग्रेस का भला इसी में है कि भूरिया चुनाव हार जाएं !


 भूरिया की जीत  कमलनाथ के लिए चुनौती साबित होगी, बेहतर है  कांतिलाल  चुनाव हार जाएं,वैसे  मंत्रियों ने झाबुआ में जलेबी और मुंह बनाने के सिवा कुछ ख़ास कोशिश की भी नहीं

मध्यप्रदेश में कांग्रेस एक और परेशानी का सामना कर सकती है। झाबुआ उपचुनाव की जीत पार्टी के लिए जश्न से ज्यादा परेशानी बन सकती है। यहां से कांग्रेस के 40 साल से राजनीति में सक्रिय कांतिलाल भूरिया मैदान में हैं। भूरिया का ये पहला विधानसभा चुनाव है। इसके पहले वे लगतार सांसद रहे। पिछली विधानसभा में उनके बेटे विक्रांत को इसी सीट से बीजेपी के जीएस डामोर ने पराजित किया। इसके बाद लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने डामोर पर ही दांव लगाया। डामोर ने कांतिलाल भूरिया को भी पराजित किया। इस तरह से छह महीने के अंतराल में भूरिया फैमिली के दोनों सदस्यों को डामोर ने पराजित किया। डामोर के विधानसभा सीट छोड़ने के बाद यहां उपचुनाव हुआ .कांग्रेस से कांतिलाल भूरिया तो बीजेपी से भानू भूरिया सामने थे।

प्रदेश कांग्रेस में इनदिनों भी अच्छा नहीं चल रहा है। सरकार का पिछले 9 महीने का कार्यकाल भी बहुत उम्मीद नहीं जगाता। गुटबाजी, बयानबाजी और नमूनागिरी इस पार्टी के नेता ही नहीं मंत्री भी कर रहे हैं। अघोषित रूप से दिग्विजय सिंह को शैडो मुख्यमंत्री कहा जाता है। सिंधिया खेमा खुलेआम सरकार की नीतियों का विरोध कर रहा है। दिगिवजय ने गौशाला पर कमलनाथ को नसीहत दी। सज्जनसिंह वर्मा अपने नेता कमलनाथ के बचाव में सारी हदें पार करके ज्योतिरादित्य और दिग्विजय के खिलाफ अशालीन शब्दों और चुनौती देने से नहीं चूक रहे। जीतू पटवारी खुद को जवान और एक्टिव बताने के फेर में कुछ भी करने पर आमादा है। उमंग सिंघार तो है ही। कुल मिलाकर कमलनाथ को छोड़ कर कोई गंभीर दिखाई भी नहीं देता। ऐसे में भूरिया की जीत एक नया खेमा, नई लड़ाई शुरू करेगी।

कांतिलाल भूरिया दिग्विजय सिंह के सिपाहसालार हैं। वे उनके बिना एक कदम भी नहीं चलते। उनकी चालीस साल की राजनीति में चालीस कदम भी उनकी अपनी मर्जी के शायद ही रहे हों। वे झाबुआ में अपनी व्यक्तिगत ताकत रखते है, पर प्रदेश की राजनीति में उनका होना न होना दिग्विजय के हाथ है। कांतिलाल इलाके में सक्रिय हैं, लोगों के बीच उनकी छवि मजबूत है। सवाल यही है कि उनकी जीत दिग्विजय सिंह को मजबूत करेगी। कांतिलाल वरिष्ठ भी हैं। ऐसे में
मंत्रिमंडल में भी वे बड़ा पद मांगेंगे। आप उन्हें सिर्फ विधायक बनाकर बैठा नहीं सकते, उनके जरिये दिग्विजय अपनी बहुत से दबी तमन्ना पूरी करने की कोशिश करेंगे। आदिवासी नेता के तौर पर वे कांतिलाल को उपमुख्यमंत्री बनाने का दबाव बनाएंगे। ऐसे में सिंधिया खेमा दलित उप मुख्यमंत्री के तौर पर तुलसी सिलावट का नाम भी आगे करेगा। कुल मिलाकर कांतिलाल भूरिया की जीत कांग्रेस खासकर कमलनाथ के लिए एक नई चुनौती साबित होगी। कांग्रेस के लिए बेहतर यही है कि कांतिलाल भूरिया चुनाव हार जाएं। वैसे कांग्रेस के मंत्रियों ने झाबुआ में जलेबी और मुंह बनाने के सिवा कुछ ख़ास कोशिश की भी नहीं।


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