चुनाव ही अंत नहीं .. महिला सुरक्षा के बजाय सिर्फ उपवास और तख्तियां लेकर नारेबाजी करना सरकार को शोभा नहीं देता


 

मुकेश गुप्ता (वरिष्ठ पत्रकार )

इंदौर। प्रदेश में भाजपा इमरती देवी को लेकर एक रणनीति के तहत आक्रामक है। फ़ौरी तौर पर कमलनाथ इस मुद्दे घिरते नज़र आ रहे है। हक़ीक़त में यह कमलनाथ की फिसली ज़ुबान का मामला तो है ही लेकिन इससे ज्यादा ये भाजपा की के हाथ से फिसलती कमान का भी है।

इस उपचुनाव में अचानक से भाजपा ने महिला सम्मान का मुद्दा पकड़ लिया, जबकि शिवराज सरकार में महिला उत्पीड़न के मामले में प्रदेश लगातार सबसे उपर रहा। तब कभी किसी को ऐसे अफ़सोस याद नहीं आये ? जनता भी सब समझती है।

बिकाऊ, गद्दार और नाकाम के नारों से परेशान भाजपा ने इमरती देवी को एक चुनावी मुद्दे को तौर पर पकड़ लिया। यदि भाजपा है जिसने इमरती देवी का कांग्रेस शासन काल में मंत्री रहते खूब मजाक उड़ाया। खैर, वो सब लिखकर किसी महिला का अपमान हम नहीं करेंगे।

15वर्षो तक मप्र की सत्ता पर क़ाबिज़ रही भाजपा अपनी वर्तमान सरकार की उपलब्धियों पर बात तक करने की स्थिति में नहीं है । जवाब तक नहीं सूझ रहे। यही वजह है कि भाजपा इमरतीदेवी के बहाने जनता का ध्यान मुख्य मुद्दों से हटाने में लगी है।

बिकाऊ और ग़द्दार की गूंज जनता के ज़ेहन में उतर गई है। जिसका जवाब देने के लिये भाजपा की पूरी फ़ौज कमजोर पड़ती दिख रही है। कांग्रेस यदि अपने नारों पर और अधिक ताक़त लगाती है तो आने वाले दिनों में भाजपा को प्रदेश में फिर नये मुद्दे तलाशने होंगे।

प्रदेश में लगातार डेढ़ दशक तक सत्ता में रहने के बाद कमलनाथ सरकार गिराकर सत्ता हथियाने में सफल हुई शिवराज सरकार को उपचुनाव में इस प्रकार की बातों पर चुनावी सियासत करना पड़ रही है, यह बात चुनावी क्षेत्र के युवा मतदाताओं के गले नहीं उतर रही है।

मतदाता सब जानते हैं कि इमरती देवी के बारे में जो कुछ कहा गया उससे ज्यादा अमर्यादित आचरण तो भाजपा के प्रत्याशी बिसाहूलाल सिंह का है। सिंह ने अपने प्रतिद्वंदी प्रत्याशी की पत्नी के लिए जिन शब्दों का इस्तेमाल किया वो लिखना तक अमर्यादित है। सभी महिलाओं का सम्मान होना चाहिए पर उन्हें किसी भी कीमत पर चुनावी मुद्दा बनाना ठीक नहीं।

इमरती देवी को क्या कहा गया और उन्होंने कमलनाथ को क्या क्या न कहा , इससे सिंधिया को तो फ़र्क़ पड़ सकता है लेकिन इससे शेष 27 विधानसभा क्षेत्र के मतदाताओं को कुछ भी फ़र्क़ पड़ता लग नहीं रहा है।

इमरती देवी से प्रदेश की जनता खुद को कनेक्ट नही कर पा रही है। शिवराज सिंह चौहान उम्मीद पाले बैठे हैं कि इमरती का मामला उन्हें फिर सत्ता में लौटा देगा । लेकिन वर्तमान हालात में यह वैसी ही राजनैतिक भूल होगी जैसी गत विधानसभा चुनाव में शिवराज सिंह ने जनता का मूड भाँपने में की थी।

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ग़ैर ज़रूरी मुद्दों को चुनावी तूल देने की चालप्रदेश की जनता को प्रभावित करने की बजाय उलटा असर डाल सकती है। इसका आँकलन किये बिना मुद्दे को हवा देना भाजपा के पूरे अभियान की हवा निकालने जैसा हो सकता है।

इस ख़तरे का आँकलन कमलनाथ के आत्मविश्वास और उनको चुनावी रैलियों में मिल रहे रिस्पॉंस को देखकर लगाया जा सकता है जहॉ इमरती देवी के कमेंट्स से ज़्यादा जनता “बिकाऊ और ग़द्दार” पर मुखर बनी हुई है।

तमाम विधानसभाओं में जहां उपचुनाव हो रहे हैं वहां भाजपा प्रत्याशी इन नारों का जवाब देने में खुद को असहाय पा रहे हैं। भाजपा की सभाओं में अधिकतर कुर्सियां ख़ाली नज़र आ रही है जबकि कांग्रेस में एक ही नेता के दम पर चुनावी माहौल बेहतर बना हुआ कहा।

अभी 20दिन का चुनाव बाक़ी है, एैसे में देखना दिलचस्प होगा कि भाजपा कब तक इमरतीदेवी मामले को लेकर समय ज़ाया करती रहेगी और कांग्रेस “बिकाऊ-ग़द्दार” नारे को कैसे अंत तक जीवित रख पाती है।

अधिक दिलचस्प यह भी होगा कि इलेक्शन मेनेजमेंट सफल होता है या ज़मीनी हक़ीक़त मे नज़र आ रहा जनता का मुद्दा “तख्तापलट है ग़लत” अपना रंग दिखाकर जनता के आक्रोश को अभिव्यक्त करेगा।

भाजपा का इमरतीदेवी मुद्दे पर चुनाव लड़ना, मामले को भुनाने में माहिर होने की उसकी योग्यता भले ही साबित कर दे लेकिन यह “मुद्दाविहिन-उपलब्धिहीन चुनाव” भाजपा के खोखलेपन को उजागर करने वाला आत्मघाती कदम भी साबित हो सकता है।

विकास और उन्नति की बड़ी बड़ी बातें करने वाले शिवराजको इमरती देवी के मामले में उपवास और धरने का हक़ तो है ही लेकिन प्रदेश में लगातार बढ़ते रहे महिला अत्याचार और फिर से सुरसा के समान मुँह फैला रहे अपराध पर भी जनता को जवाब देने की नैतिक ज़िम्मेदारी उन पर है।

महिला सम्मान से राजनैतिक लाभ लेना तो आसान है लेकिन प्रदेश की तमाम महिलाओं की सुरक्षा से मुँह मोड़कर खोखले और कोरे नारे लगाते रहना न केवल नैतिक ज़िम्मेदारी से मुँह मोड़ना है बल्कि सामाजिक अपराध भी है।


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