आखिर लक्ष्मण कब तक संन्यासी बने रहेंगे, और क्यो ?


जयवर्धन, इमरती देवी, सिंघार, हनी, पटवारी जैसे मंत्री बन सकते हैं तो कांग्रेस के प्रदेश के सबसे अनुभवी नेताओं में से एक लक्ष्मणसिंह को क्यों नहीं मिल रही मंत्रिमंडल में जगह, क्या वे दिग्विजय सिंह के भाई होने और अपनी सौम्यता की सजा भुगत रहे हैं ?

इंदौर.मध्यप्रदेश की राजनीति में एक नेता अभी भी मोल-भाव से दूर है। ये सिर्फ अपने क्षेत्र की जनता और पार्टी के प्रति वफ़ादारी दिखाता रहा। परिवार में बड़े भाई के आदेश की भी इस नेता ने कभी अवज्ञा नहीं की। बहुत हद तक रामायण के लक्ष्मण की तरह ही है इनकी कहानी। रामायण के लक्ष्मण की तरह ही’ भैया’ के आदेश, इलाके की जनता की सेवा के सिवा इस नेता ने कोई तमन्ना नहीं की। रामायण में भी वनवास के बाद राम का राज्याभिषेक हुआ, उनके बेटों को भी पर्याप्त हिस्सा मिला। ऐसा ही कुछ कांग्रेस नेता लक्ष्मण सिंह के साथ है। 5 बार के सांसद और तीसरी बार विधायक बने लक्ष्मण को प्रदेश कांग्रेस के संगठन और सत्ता दोनों में उनका हक़ कभी नहीं मिला। जब भी उन्होंने आवाज़ उठाई उन्हें बागी करार दे दिया गया। दो दिन पूर्व अपने इलाके की जनता के साथ चांचौड़ा को जिला बनाने की मांग पर उन्होंने अपने भाई दिग्विजय के बंगले पर धरना दिया। फिर ख़बरें चल पड़ी कि लक्ष्मण परिवार और कांग्रेस पर दबाव बना रहे। वे कल पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से मिले। मीडिया और कोंग्रेसियों ने कहा-लक्ष्मण रेखा लांघ रहे हैं। आखिर क्यों लक्ष्मण पर ही सवाल उठ रहे हैं। कभी किसी ने कांग्रेस पार्टी के मुखिया से नहीं पूछा- अनुभव हीन मंत्रियों से भरे इस कमलनाथ मंत्रिमंडल में आखिर लक्ष्मण सिंह को क्यों मौका नहीं मिला ?

कमलनाथ मंत्रिमंडल को देखिये, इसमें खेमेबाजी, परिवार की कृपा, आकाओ के कोटे और बगावत की धमकी देने वालों को शपथ दिलवाई गई है। क्या यही तरीका सही है मंत्री बनने का, यही योग्यता है? यदि ऐसा है तो लक्ष्मण सिंह निश्चित ही इस पर खरे नहीं उतरेंगे? वे बहुत पीछे हैं, और रहेंगे। क्योंकि परिवार के कृपा उनके खाते में नहीं आएगी। उस कोटे से उनके भतीजे जयवर्धन सिंह मंत्री पद और बड़ा विभाग हासिल कर चुके हैं। एक परिवार से एक ही मंत्री का फार्मूला उन्हें रोक देगा (हालांकि भारत सरकार की नई जनगणना नीति में अलग-अलग घरों में रहने वाले दो परिवार माने जाएंगे ) . दूसरी योग्यता है किसी खेमे से मंत्री पद हासिल करना। लक्ष्मण सिंह के लिए ये भी संभव नहीं क्योंकि हमेशा परिवार को आगे रखने वाले लक्ष्मण अपने भाई दिग्विजय से बगावत कर किसी और खेमे में जाने का सोच भी नहीं सकते (यहां बात कांग्रेस के क्षत्रपों के खेमे की है ), और दिग्विजय सिंह शायद उन्हें अपने खेमे में जगह देना नहीं चाहते? कमलनाथ मंत्रिमडल में चालीस फीसदी से ज्यादा मंत्री दिग्विजय के इशारे पर बने हैं। पर लक्ष्मण उस सूची में कभी रहे ही नहीं ( और लक्ष्मण ने कभी भाई के खिलाफ कुछ सोचा ही नहीं) .तीसरा फार्मूला है बगावत की धमकी। उमंग सिंघार की धमकी और भाषा हम देख ही चुके हैं, फिर भी वे बने हुए हैं। अपशब्द, मर्यादाहीन बातें और बगावत की धमकी देना भी चाचौड़ा के इस विधायक की फितरत में नहीं है। वे मुंहफट जरुर हैं , पर बदजुबान नहीं।

आखिर कमलनाथ मंत्रिमंडल में इमरती देवी (जिन्हे भाषण देने में भी कलेक्टर का सहारा लेना पड़ता है), जयवर्धन सिंह (जिनके पास अनुभव अपने चाचा से आधा भी नहीं है) जीतू पटवारी (जो मंत्री की गरिमा से दूर, कभी ट्रैफिक सिग्नल पर तो कभी जलेबी और चाय की दुकान पर मसखरी करते दीखते हैं, चुनाव उन्होंने ही दो ही जीते हैं) हनी सिंह बघेल ( क्या करते हैं पता नहीं ) उमंग सिंघार (जमीनी नेता, पर धमकी देने के सिवा कुछ ख़ास काम नहीं दिखा) .प्रियव्रत सिंह सरीखे एक दर्जन नाम हैं जिनसे हर मामले में लक्ष्मण सिंह आगे हैं।

अब कांतिलाल भूरिया जीत कर आये हैं, उन्हें भी उप मुख्यमंत्री या गृह मंत्री जैसा विभाग मिलेगा। भूरिया पांच बार के सांसद हैं, यानी लक्ष्मण सिंह के बराबर। पर भूरिया विधायक पहली बार चुने गए हैं, जबकि लक्ष्मण सिंह का ये विधायक के नाते भी तीसरा कार्यकाल है। कमलनाथ को चाहिए कि कांग्रेस के एक अनुभवी नेता को उसके कद के हिसाब से पद दें, और इससे कमलनाथ राजनीति के कई मोर्चे भी साध सकेंगे।


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