आखिर राष्ट्रपति रामनाथ कोविद को मंदिर भूमि पूजन में क्यों नहीं बुलाया गया ?


 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और राज्यपाल आनंदीबेन पटेल भूमि पूजन में शामिल हो सकती है, तो फिर राष्ट्रपति क्यों नहीं ? प्रधानमंत्री को इसका जवाब देना चाहिए ?

राममंदिर भूमि पूजन के चार दिन बाद ही रामसेवक आदिवासियों को भाजपा भूल गई , भाजपा के एजेन्डे में आदिवासी ‘भोगो और भागों’ की नीति ही है।

 

दर्शक

अयोध्या में राममंदिर का भव्य शिलान्यास हुआ। प्रभु श्रीराम के खूब जयकारे लगे। जनता ने घरो में दीपक जलाये। किसी को कोई ऐतराज भी नहीं। पर एक बात समझिये भाजपा प्रभु श्रीराम और मंदिर को खूब पूजती है पर राम भक्तों के प्रति उसकी कोई श्रद्धा नहीं। श्रीराम ने अपनी पूरी लड़ाई वनवास के दौरान आदिवासी और दलितों को साथ लेकर लड़ी। शबरी के झूठे बेर भी प्रभु ने स्वाद से खाये। पर भाजपा आदिवासी दिवस को ही भूल गई।

राम मंदिर भूमिपूजन के ठीक चार दिन बाद आदिवासी दिवस मनाया गया। राम के इन सेवकों के लिए पूरी भाजपा ने कही कोई आयोजन नहीं किया, अलबत्ता मध्यप्रदेश कांग्रेस ने एक अच्छा आयोजन किया। लिक्खाड़ पार्टी के तमाम थिंक टैंकों की कलम भी खामोश रही। दूसरा राम मंदिर भूमि पूजन के आयोजन में राष्ट्रपति रामनाथ कोविद को नहीं बुलाया गया। क्यों ? जब देश के प्रधानमंत्री, प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और राज्यपाल आनंदी बेन पटेल इसमें शामिल हो सकती हैं तो राष्ट्रपति क्यों नहीं ? क्या कोविद अनुसूचित जनजाति से आते हैं इसलिए उनसे परहेज किया गया ?

नरेंद्र मोदी मुख्य और योगी आदित्यनाथ व आनंदी बेन पटेल जो कि उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री व राज्यपाल हैं सहायक जजमान रहे। समूचे देश में भावना पूर्ण लहर थी। यदि किसी की कमी खटक रही थी तो वे थे देश के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद।रामनाथ कोविंद को क्यों नहीं बुलाया गया..इसका भाजपा के पास तर्कपूर्ण जवाब नहीं।

स्मरण हो कि कांग्रेस सरकार के काल में जब गुजरात में सोमनाथ मंदिर का पुनरोद्धार होना था तो उस पुण्यकार्य का शुभारंभ तत्कालीन राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद से करवाया गया था। प्रतीकात्मक ही सही राष्ट्रपति को देश का प्रमुख माना जाता है और सभी कार्य उन्हीं के नाम से होता है।

अयोध्या का राममंदिर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के पश्चात हो रहा है, इसलिए राष्ट्रपति के आने को लेकर न कोई संविधानिक अड़चन खड़ी होती न ही प्रोटोकॉल आड़े आता। वस्तुतः श्री कोविंद अनुसूचित जनजाति से आते हैं इसलिए मंदिर में पूजन के कार्य में उनकी उसस्थिति से परहेज रखा गया..।

यदि यह कारण नहीं तो प्रधानमंत्री मोदी को यह बात देशवासियों को साफ-साफ बतानी चाहिए, क्योंकि देश का विशाल आदिवासी समाज इस उपेक्षा से आहत महसूस कर रहा है।

भाजपा नेतृत्व द्वारा आदिवासी समाज की उपेक्षा की उज्जवल परंपरा रही है..। यदि वास्तव में वह उनकी हितचिंतक होती तो मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री पदपर थावरचंद गहलोत होते या फग्गनसिंह कुलस्ते। इनका इस्तेमाल सिर्फ प्रतीकात्मक रूप से किया जा रहा है। कभी किसी आदिवासी नेतृत्व को सत्ता या संगठन दोनों में प्रदेश में जगह नहीं मिली।

थोड़ा पीछे चलें। 2000 में जब छत्तीसगढ़ बना तब कांग्रेस ने शुक्ल बंधुओं व उनके समर्थकों के हिंसक विरोध के बावजूद आदिवासी नेता अजीत जोगी को मुख्यमंत्री पद पर आसीन कराया। पचास से साठ फीसदी दलित-आदिवासी आबादी वाले छत्तीसगढ़ के लिए यही न्यायोचित था।

भाजपा ने नेता प्रतिपक्ष के तौर पर नंदकुमार साय को सामने किया तो लगा कि वह वास्तव में आदिवासी नेतृत्व गढ़ने में लगी है। लेकिन इसकी पोल तब खुली जब 2003 में बहुमत आने के बाद जशपुर के राजा दिलीप सिंह जूदेव को आगे किया गया। दुर्भाग्य से वे स्टिंग आपरेशन के शिकार हो गए। यह मौका था कि नंदकुमार साय या किसी नौजवान आदिवासी को नेतृत्व सौंपा जाता लेकिन अचानक इंट्री हो गई सामंती पृष्ठभूमि के रमन सिंह की जिन्होंने अपने पंद्रह साल के मुख्यमंत्री काल में एक भी आदिवासी नेता को सिर नहीं उठाने दिया।

यदि हम कांग्रेस की बात करें तो शिवभानु सिंह सोलंकी, जमुना देवी से लेकर कांतिलाल भूरिया,अरविन्द नेताम महेन्द्र कर्मा, बाला बच्चन , उमंग सिंगार, तक सत्ता की मुख्यधारा में महत्वपूर्ण रहे। वे मुख्यमंत्री के विकल्प के रूप में सामने आते रहे।

कांतिलाल भूरिया प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भी रहे और 2013 में मुख्यमंत्री पद का चेहरा भी पार्टी ने उन्हें बनाया।। झाबुआ के कद्दावर नेता दिलीप सिंह भूरिया को लोभ-लालच के साथ कांग्रेस से तोड़कर भाजपा में लाया तो गया पर यहां उनकी ऐसी गति बना दी गई कि अब कोई नाम लेवा नहीं। आदिवासी नेतृत्व को ख़तम करना भाजपा की परंपरा में शामिल हो गया है।

आदिवासियों को समर्थवान बनाने के लिए जितनी भी फ्लैगशिप योजनाएं हैं सभी कांग्रेस की देन हैं। चाहे तेंदूपत्ता की ठेकेदारों से मुक्ति का कानून हो या आवास के लिए सरकारी भूमि के पट्टे। आदिवासियों के कल्याण के लिए कांग्रेस ने अलग मंत्रालय बनाया जो संभवतः दूसरे व तीसरे क्रम के बड़े बजट का विभाग हुआ करता था।

लेकिन भाजपा शासनकाल में इसे लूप लाइन का समझा जाता है। पंद्रह बरसों में भाजपा ने स्मार्ट सिटी, मेट्रो जैसे काम खूब किया पर आदिवसियों से जुडी योजनाओं और उनके नेतृत्व को अनदेखा ही किया।

9अगस्त में पूरी दुनिया में आदिवासी दिवस मनाया जाता है। पर भाजपा को इसके लिए फुर्सत नहीं मिली। कोरोना संक्रमण का बहाना भी नहीं बनाया जा सकता क्योंकि जब पूरे देश में चुनावी सभाएं, बैठके हो रही है। तो आदिवासियों पर ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता था। सब नियत पर निर्भर कररा है।

भाजपा के बड़े नेता बिहार के चुनावों व अन्य मुद्दों को लेकर लगातार वर्चुअल रैलियां कर रहे हैं। इससे उनकी नीति और नियति स्पष्ट हो जाती है..कि उन्हें इस विशाल वर्ग की कितनी चिंता है। प्रदेश में विधायकों की तोड़फोड़ संक्रमण काल में शुरू हुई और अब तक जारी है। बाकायदा भाजपा कार्यालय में आयोजन के साथ भगवा ओढ़ाया जा रहा है। अयोध्या में दो सौ से जयादा लोगों को आयोजन होता है, फिर रामभक्त आदिवासियों से दूरी क्यों ? क्या सिर्फ चुनाव के वक्त ही आदिवासी और दलितों के घर भोज करेंगे, बाकी दिन उनकी सुध नहीं लेंगे ?

दो घटनाएं मर्माहत करने वाली हैं..अभी हाल ही में आईएस रमेश थेटे रोते हुए सेवानिवृत्त हुए। ये वही रमेश थेटे हैं जिन्होंने आयुक्त रहते हुए जबलपुर की हुलिया बदलकर महानगर की श्रेणी में खड़ा कर दिया।

होनहार थेटे को दलित होने की सजा मिली वे न कभी कलेक्टर बन पाए न ही उन्हें किसी महत्वपूर्ण विभाग का दायित्व मिला न ही प्रमोशन। वजह स्वाभिमानी थेटे ने भाजपा के आला नेताओं के पाँव छूने से मना कर दिया और पूरे सेवा काल में बाबासाहेब अंबेडकर के विचारों की झंडाबरदारी की।

शशि कर्णावत की कहानी तो इससे भी दुखद है। गरीब दलित परिवार की इस मेधावी महिला आईएएस को साधारण से आरोपों में बर्खास्त कर दिया गया। जबकि इसी प्रदेश में ऐसे दर्जन भर आईएएस हैं जो अकूत नामी बेनामी संपत्तियों के मालिक हैं। ये सभी के सब भाजपा के आश्रयी रहे हैं जिन्होंने नेताओं के साथ मिलबांट कर भ्रष्टाचार किया। केद्रीय सतर्कता आयोग की सूची में देश के बीस श्रेष्ठ भ्रष्टाचारी नौकरशाहों की सूची में पाँच से ज्यादा इसी मध्यप्रदेश के हैं।

इलायची… भाजपा के संगठन में भी आदिवासी वर्ग के नेतृत्व का बुरा हाल है। इस वर्ग का कोई नेता सोच भी नहीं सकता कि वह कभी प्रदेश का अध्यक्ष बन सकता है। वस्तुतः भाजपा के एजेन्डे में आदिवासी ‘भोगो और भागों’ यानी कि यूज एन्ड थ्रो की कोटि का है। यहां यही उसका भविष्य है और यही उसकी वास्तविक नियति।


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