पूछता है भारत…सुशांत की मौत ख़ुदकुशी निकली, अब नशे की किस पुड़िया की तलाश में सत्ता-मीडिया


 

आखिर पूरे तीन महीने तक टीवी चैनल जिस तरह से चीखते रहे, लगा देश का सबसे बड़ा मुद्दा यही है। अंत क्या हुआ एक तनावग्रस्त अदाकार ने ख़ुदकुशी कर ली, पर मीडिया और राजनीति ने जो चिलम भरी है उसका धुंआ महीनों हमें परेशान करता रहेगा। ..

सुनील कुमार (संपादक डेली छत्तीसगढ़ )

पिछले कुछ महीनों से इस देश की मीडिया का सबसे बड़ा हिस्सा मुम्बई के एक अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत को समर्पित रहा। पहली नजर में यह जाहिर तौर पर खुदकुशी का मामला था, लेकिन सुशांत के चुनाव के मुहाने पर खड़े बिहार का होने की वजह से बिहार सरकार इस मौत की जांच में कूद पड़ी, और जब कानूनी रूप से महाराष्ट्र उसका क्षेत्राधिकार नहीं बना तो बिहार सरकार के अनुरोध पर एक अटपटे तरीके से केन्द्र सरकार ने सीबीआई की जांच शुरू करवा दी।

अब सीबीआई-जांच के दौरान देश के सबसे बड़े अस्पताल, केन्द्र सरकार के एम्स के डॉक्टरों के एक पैनल ने यह राय दी है कि सुशांत के परिवार और उसके वकीलों का यह आरोप गलत पाया गया है कि सुशांत को जहर दिया गया था, और गला दबाकर मारा गया था। एम्स के दिग्गज डॉक्टरों के पैनल ने सीबीआई को अपनी मेडिको-लीगल राय देकर अपने पास यह केस बंद कर दिया है। इन डॉक्टरों ने मुम्बई के सरकारी अस्पताल के पोस्टमार्टम से सहमति जताई है।

अब जब देश के इस सबसे बड़े, और केन्द्र सरकार के मातहत इस अस्पताल की यह राय आ गई है तो कई सवाल खड़े होते हैं। एक साधारण मौत के मामले में राज्य सरकार के जांच के अधिकार को कुचलते हुए जिस तरह केन्द्र सरकार ने सीबीआई जांच शुरू की थी, वह मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में चल ही रहा है, और वहां से क्षेत्राधिकार का मुद्दा तय होना बाकी है।

केन्द्र और राज्य के बीच सीबीआई जांच को लेकर टकराव नया नहीं है, और छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल जैसे कई राज्य हैं जिन्होंने सीबीआई के आकर राज्य में जांच करने के अधिकार वापिस ले लिए हैं। अब राज्य सरकार की मर्जी के बिना, उसकी अनुमति के बिना सीबीआई राज्य के दायरे में आने वाले अपराधों या मामलों की जांच नहीं कर सकती। अभी भी सुशांत राजपूत की मौत की जांच को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आना बाकी है कि इस या ऐसे दूसरे मामलों में क्षेत्राधिकार किसका होगा।

अब सवाल यह उठता है कि जहां एक राज्य सरकार का पूरा-पूरा अधिकार था, और उसकी पूरी-पूरी जिम्मेदारी थी, वहां उसे अलग करने के लिए एक इतना बड़ा बवाल खड़ा किया गया जिसने पूरे देश के लोगों का ध्यान देश के जलते-सुलगते जमीनी मुद्दों से अलग करके इस एक मौत की तरफ खींच दिया। अब इस बात का खुलासा तो शायद ही कभी हो पाए कि यह कितना खींचा गया, कितना धकेला गया, हर घंटे मीडिया को हथियार और औजार की तरह कितना चारा पेश किया गया, मीडिया ने किस रफ्तार से उसे खाया, और फिर 24-24 घंटे उसकी जुगाली करते रहा।

यह पूरा सिलसिला शायद ही कभी उजागर हो क्योंकि मीडिया जिस तरह एक औजार की तरह मंडी में खड़ा हुआ दिखा, वैसा पहले किसी ने सोचा नहीं था। देश के इतने महीने एक निहायत फर्जी मुद्दे को लेकर गंवाए गए, और शायद सोच-समझकर किए गए ताकि इतने वक्त तक इस देश के बेवकूफ लोगों को उनके खुद के दुख-दर्द का अहसास न हो।

यहां पर यह भी समझने की जरूरत है कि चुनाव के मुहाने पर खड़े हुए बिहार में भाजपा ने ऐसे पोस्टर या स्टिकर छपवाए कि सुशांत की मौत को याद रखा जाएगा। यह पूरे का पूरा सिलसिला शुरू से ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की मदद से खड़े किए गए एक बेबुनियाद मुद्दा था।

सच तो यह है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जब दिन में चार-छह घंटे यही मौत दिखा रहा है, उससे जुड़े हुए दूसरे ग्लैमरस स्कैंडल खड़े कर रहा है, उससे जुड़े हुए नशे के मामलों के लिए देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी वहां कूद पड़ी है, और एक ऐसा माहौल बनाया गया कि मुम्बई फिल्म इंडस्ट्री सांस कम लेती है, नशे का धुआं ज्यादा लेती है।

यह माहौल कुछ ऐसा भी था कि मानो हिन्दुस्तान में कहीं और कोई नशा नहीं होता, और सुशांत के आसपास के लोग ही नशा कर रहे थे, उसे नशा करवा रहे थे। इस दौरान यह भी याद रखने की बात है कि जिस दिल्ली से जाकर नार्कोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के डायरेक्टर तक मुम्बई में डेरा डाले बैठे थे, उसी दिल्ली में नशे का जखीरा पकड़ा रहा था, और वहां पर जब्त 160 किलो मरिजुआना में से कुल एक किलो जमा कराकर पुलिसवालों ने 159 किलो बेच मारा।

उधर मुम्बई में छांटे गए निशानों से 25-50 ग्राम गांजे की पूछताछ एक राष्ट्रीय मुद्दे की तरह चल रही थी। यह भी याद रखने की बात है कि इसी दौरान भाजपा सरकार वाले कर्नाटक में एक पूरी गाड़ी भरकर गांजे के साथ भाजपा का एक स्थानीय नेता पकड़ाया, लेकिन वह भी एनसीबी के लिए मानो पर्याप्त बड़ा नहीं था क्योंकि उसके साथ बिहार के किसी सपूत की मौत जुड़ी हुई नहीं थी, और कर्नाटक में अभी चुनाव नहीं था।

सुशांत की मौत को लेकर खड़े किए गए इस पूरे बवाल से केन्द्र और राज्य के संबंधों पर भी आंच आती है। जिस तरह बिहार के कल के डीजीपी और आज के राजनीतिक कार्यकर्ता ने इस मामले में ओछी और घटिया बयानबाजी की थी, उससे भी एक राज्य के रूप में बिहार ने भरपूर निराश किया था। अब इस देश में करोड़ों के नशे के रोज के कारोबार को छोडक़र देश की सबसे बड़ी नशाविरोधी जांच एजेंसी एक-एक फिल्म एक्ट्रेस की एक-एक सिगरेट को सूंघते हुए बैठी है, यह देश के लिए एक बहुत ही शर्मनाक नौबत है। सरकार की जांच की सीमित क्षमता होती है, और इस क्षमता को संगठित नशा-कारोबार के पीछे लगाने के बजाय कंगना रनौत नाम की एक अभिनेत्री को नापसंद लोगों के पीछे लगाकर एक बहुत ही बुरी मिसाल पेश की गई है।

इस देश के मूर्ख लोगों को भी यह समझने की जरूरत है कि उनकी अपनी जिंदगी की तकलीफों की तरफ से उनका ध्यान हटाने के लिए किस तरह उन्हें सुशांत की मौत की एक सनसनीखेज अपराधकथा पेश की गई थी, उसमें रोजाना किसी नए ग्लैमर का तडक़ा लगाना जारी रखा गया था, और ईडियट बॉक्स कहे जाने वाले टीवी के सामने वे कैसे ईडियट की तरह बैठकर परोसी हुई गंदगी को चाट रहे थे। जिन लोगों ने भी अपनी जिंदगी के ये महीने इस प्रायोजित मैला-भोज को समर्पित किए हैं, उन्हें अपनी समझ पर शर्म से डूब मरना चाहिए।

अब जब सुशांत राजपूत की मौत निर्विवाद रूप से आत्महत्या साबित हो चुकी है, अब सीबीआई के पास और कोई मेडिको-लीगल विकल्प बचा नहीं है, तो बिहार के चुनाव तक सुशांत राजपूत की लाश का इस्तेमाल और किस तरह हो सकेगा इसके लिए राजनीतिक-कल्पनाशीलता की ऊंचाईयां सामने आना अभी बाकी है।

राजनीतिक ताकतों की तमाम कोशिशों के बावजूद आज भी कहीं-कहीं पर सच को सांस लेने की गुंजाइश मिल जाती है, और इस बार यह ऑक्सीजन एम्स के डॉक्टरों ने दी है। एक वक्त की अपराध-पत्रिका मनोहर कहानियां को इस देश में राष्ट्रीय पत्रिका का दर्जा देना भर बाकी है। अब अगली किसी सनसनी का इंतजार करें, और हमें पूरा भरोसा है कि वह अधिक दूर नहीं है, जल्द ही आपके साथ होगी।


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