क्या भारतीय मीडिया में थोड़ी सी शर्म बची है ?


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सत्ता का प्रवक्ता बन चुका भारतीय मीडिया कोरोना के आंकड़ों से ज्यादा विश्लेषण तो आईपीएल के मैचों का करता है, अधूरा सच बता रहे  मीडिया को इस आपदाकाल में भी देश की नहीं, सत्ता की चिंता है…

पंकज मुकाती

क्या भारतीय मीडिया चापलूसी के संक्रमण से बाहर निकलेगा ? लगातार सत्ता भक्ति में रमे इस मीडिया को इस आपदाकाल में जनता के प्रति कोई ज़ज़्बा,जिम्मेदारी जागेगी? न्यूयॉर्क टाइम्स से हम कुछ सीखेंगे? न्यूयॉर्क टाइम्स के पहले पन्ने की दो दिनों से खूब चर्चा है। हिंदुस्तानी मीडिया भी उसकी वाहवाही कर रहा। 24 मई का न्यूयॉर्क टाइम्स का पहला पन्ना इसकी वजह है। अखबार ने अपना पहला पेज उन लोगों को समर्पित किया है, जो कोरोना से संक्रमित होकर दुनिया छोड़ गए। ये इस अखबार के शोक और श्रद्धांजलि का एक तरीका है। इस पन्ने पर मरने वालों के नाम की सूची छापी गई है।

इसका शीर्षक है –ये ऐसी क्षति है जिसका कोई हिसाब नहीं हो सकता, जिसकी कोई गिनती नहीं हो सकती। अख़बार ने लिखा है, वो सिर्फ़ लिस्ट के कुछ नाम नहीं थे, वो यहां हमारे साथ थे।

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की तानाशाही के बीच ऐसा अखबार निकालना भी एक साहस है। इस प्रयोग की प्रशंसा करते नहीं थक रहा भारतीय मीडिया इससे कुछ सीखेगा। ये मानेगा कि मरने वाले सिर्फ आंकड़ें नहीं है, वे हमारे ज़िंदगी के सदस्य है, उनके अपने परिवार है। अभी मीडिया मृतकों को सिर्फ नंबर्स की तरह ले रहा है, बिना किसी मानवीय संवेदना के। कारण साफ़ है, सत्ता यही चाहती है।

हिंदुस्तानी मीडिया का एक बड़ा हिस्सा, कह सकते हैं 95 फीसदी से ज्यादा, बने बनाये, रटे, रटाये फॉर्मूले पर चल रहा है। सबकी एक सी खबरें, एक ही थीम-सकारात्मक (सत्ता के प्रति) यहां सकारात्मकता के मायने हैं सच को छिपाना। अपने हिसाब से सच गढ़ना।

मीडिया वो कारीगर बनता जा रहा है, जो अपनी सुविधा के हिसाब से आंकड़ों से मूरत गढ़ता है। देश में कोरोना संक्रमितों की संख्या सवा लाख से ऊपर है। फिर भी पांच फीसदी (ये वो मीडिया है जिसकी कोई सुनता ही नहीं ) को छोड़कर मीडिया यही बताने में लगा है कि हमने बहुत काबू कर लिया। हम दूसरे देशों से बेहतर कर रहे हैं। हर तरफ हरा ही हरा नजर आ रहा है। 60 दिन के लॉकडाउन के बावजूद कहीं ये सवाल नहीं दिखता कि इतने दिनों के लॉक डाउन के बावजूद अभी भी 6 हजार से ज्यादा संक्रमित प्रतिदिन क्यों हैं? मीडिया ने सरकार से सवाल पूछना बंद कर दिया है। वो खुद सरकार की तरह से जवाब देने को बेताब रहता है। वो खुद ही सरकारी प्रवक्ता की भूमिका निबाह रहा है।

पहले दो लॉकडाउन में दिल्ली के निजामुद्दीन के मरकज़ से निकली जमात को दोषी बताते रहे। अब मजदूरों पर तोहमत है। तीसरा और चौथा लॉकडाउन मजदूरों को दोषी बताने में गुजर जाएगा।आखिर मरकज़ के कुछ हजार लोगों के लिए सवा करोड़ के साथ अन्याय क्यों ? मजदूर क्यों सड़क पर हैं, इस पर कोई सीधा सवाल क्यों खड़ा करने का साहस नहीं करता ? दोनों ही मामलों में सरकार को क्लीन चिट, क्यों ? सामान्य दिनों में तो देश अपने आप चलता ही है, ऐसे आपदाकाल के लिए ही सरकारें चुनी जाती है। यही वक्त है सरकार के अपनी काबिलियत दिखाने का और मीडिया को सरकार से सवाल पूछने का। पर दोनों इस वक्त नाकाबिल साबित हो रहे हैं।

देश में मरने वालों और संक्रमितों की संख्या अब मौसम विभाग के तापमान के आंकड़ों की तरह होते जा रहे हैं। आईपीएल के मैचों के स्कोर बोर्ड पर भी भारतीय मीडिया ढेरों ग्राफिक्स पेश करता हैं। कप्तान की कमी, कोच की खामी और आने वाले मैचों पर सलाह तक देता हैं। पर कोरोना के आंकड़ों पर ऐसा कोई काम नहीं दिख रहा। जो भी ग्राफ़िक्स आ रहे हैं, उनमे वही कारीगरी है। जिसमे ये दर्शाया जा रहा है कि हम कैसे दुनिया से बेहतर कर रहे हैं। ये सवाल कोई नहीं कर रहा कि अमेरिका में प्रतिदिन लाखों की संख्या में टेस्ट हो रहे हैं, और हमारे यहां 40 हजार  भी औसत टेस्ट नहीं हो रहे हैं। रेड जोन वाले शहरों में भी टेस्टिंग किट कमी है, तो बाकी हिस्सों को छोड़ ही दीजिये। अगली तोहमत के लिए फिर कुछ नई मूर्तियां न्यूज़रूम में गढ़ी जा रही है। बस इशारे का इंतज़ार है।

अब देश के भीतर एक नया खेल शुरू हो गया है। भाजपा शासित राज्य, गैर भाजपा शासित राज्यों के आंकड़े अलग-अलग करने का। अब ये साबित करने की होड़ मची है कि गैर भाजपा शासित राज्यों में संक्रमण ठीक से काबू नहीं हुआ।मीडिया हाउस का गणित तो सरकारी डर और रुपयों की गिनती ने ऐसा गड़बड़ाया है कि वे दो दूनी बाईस कहने में भी नहीं चूक रहे। गणित का सामान्य सिद्धांत है कि तुलना समान इकाई में होती है। पर रेड जोन वाले 20 से तीस लाख की आबादी वाले शहर अपने नंबर्स की तुलना मुंबई, अहमदाबाद से करके कॉलर ऊँची करके घूम रहे हैं कि हमारे यहां उनसे कम संक्रमण हैं। ये बेमेल तुलना से सत्ता भले खुश हो जाए पर जनता की जान से खिलवाड़ हो रहा है। वो खुश है कि हम बेहतर हैं, जबकि शहरों में संक्रमण बढ़ रहा है।

जरुरी है कि भारतीय मीडिया कुछ दिनों के लिए सत्ता को बचाने के बजाय पाठकों से ईमानदारी दिखाए। आंकड़ों को अपने बीच का हिस्सा मानें। संवेदना और इंसानियत का धर्म निभाने का यही वक्त है।

बस इतना करिये, आप जो भी अखबार, न्यूज़ बुलेटिन निकाल रहे हैं, इत्मीनान से एक घंटा उसे खुद पढ़िए, ईमानदारी से। आपको समझ आ जायेगा कि कितना अधूरा सच हम प्रकाशित कर रहे है। लोगों के दर्द को महसूस करिये, आपको खुद से शर्म आने लगेगी।


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