महात्मा की ताकत … यदि गांधी न मरे होते तो गोडसे उनपर जान लुटा देने वाला अंगरक्षक बनता


 

अशोक कुमार पांडेय के की पुस्तक “उसने गांधी को क्यों मारा” पर की समीक्षा कर रहे हैं
वरिष्ठ पत्रकार शम्भुनाथ शुक्ला

यह बात कुछ अजीब लग सकती है, किंतु मेरा पुख़्ता तौर पर मानना है, कि यदि 30 जनवरी 1948 को गांधी जी गोडसे की गोलियों से मरते नहीं, बच जाते, तो नथूराम गोडसे गांधी का हत्यारा नहीं बल्कि भविष्य में उनके लिए सर्वस्व न्योछावर कर देने वाला उनका अंगरक्षक बनता।

गांधी में विरोधी को अपने पाले में ले आने की अद्भुत शक्ति थी। और यह शक्ति वैचारिक रूप से सबल और सक्षम लोगों के पास ही होती है। गांधी दृढ़-प्रतिज्ञ थे, जबकि गोडसे एक उन्मादी और वैचारिक रूप से दुर्बल। वह जिस विचारधारा के हिरावल दस्ते का सदस्य था, उसके नेता भी उसके बचाव में नहीं उतरे, बल्कि उसे अकेला छोड़ दिया।

यह कुछ वैसी ही विचारधारा था, जैसी कि आतंक फैलाने वाले अतिवादियों की होती है। बिप्लव दासगुप्ता ने अपनी मशहूर पुस्तक- ‘नक्सलाइट्स’ में लिखा है, कि 1967-71 के बीच हथेली में सरसों उगा लेने की हवाई कल्पना लेकर जिन लोगों ने सशस्त्र क्रांति का आह्वान बंगाल के जलपाई गुड़ी से किया था, वे लोग खाते-पीते उच्च मध्यम वर्गीय परिवारों से आए युवा थे और जो सब कुछ फटाफट चाहते थे।

क्योंकि वे आज़ादी के 20 वर्षों बाद की नीरस जीवन-शैली से ऊब चुके थे। अब चूँकि क्रांति के लिए सेना चाहिए, इसलिए उन्होंने समाज विरोधी लुम्पेन तत्त्वों को अपने साथ लिया तथा निम्न मध्यम वर्ग के निर्दोष और भोले-भाले नवयुवकों को भरमा लिया। इसीलिए उनका आंदोलन धड़ाम हो गया।

गांधी हत्या के पीछे भी ऐसे ही तत्त्व काम कर रहे थे, जो मानते थे, कि हिंदू-मुसलमान कभी साथ नहीं रह सकते। इसके पीछे धार्मिक कट्टरपंथी थे, गोटियाँ बिछाने में माहिर राजनीतिक थे और अति महत्त्वाकांक्षी लोग भी। इनके रास्ते में रोड़ा गांधी थे, इसलिए उनको रास्ते से हटाना इनका मुख्य लक्ष्य।

जाने-माने लेखक और इतिहासकार अशोक कुमार पांडेय ने अपनी पुस्तक- “उसने गांधी को क्यों मारा” में इसी तथ्य की बारीकी से पड़ताल की है। यह सवाल किया जा सकता है, कि गांधी हत्या के 72 साल बाद इस तरह की पुस्तक की ज़रूरत क्यों? इसकी मुख्य वजह है, कि गांधी जी की हत्या पर हिंदी में एक भी पुस्तक नहीं है।

जो चार-पाँच किताबें आईं भी वे सब अंग्रेज़ी में हैं। हालाँकि कई जाँच आयोग भी अपनी रिपोर्ट्स दे चुके हैं। इसलिए ऐसी पुस्तक की ज़रूरत आज बहुत थी। उदारवाद और कट्टरपंथ की लड़ाई रुकने वाली नहीं। हो सकता है, कि एक दौर में यह मद्धम पड़ जाए पर ख़त्म हो जाए, यह संभव नहीं।

उदारवाद को निरंतर कट्टरपंथ के विरुद्ध संघर्षरत रहना चाहिए। अशोक कुमार पांडेय ने इसी को रेखांकित किया है। अतः यह पुस्तक आज के समाज के लिए अपरिहार्य है। आज जब इन दोनों ही विचारों के बीच संघर्ष जारी है, किंतु उदारपंथी लोग कमजोर पड़ते जा रहे हैं। कट्टरपंथ कभी मॉब लिंचिंग तो कभी ट्रोलिंग के ज़रिए अलग रास्ते में चल रहे लोगों के पीछे पड़ा हो तो ज़रूरी हो जाता है, कि ऐसे बौद्धिक जन आगे आएँ और निर्भीक होकर तथ्यों के साथ अपनी बात रखें, ताकि आँखों पर पड़ा जाला साफ़ हो सके।

लेखक ने गांधी हत्या के पूर्वाभ्यास से चीजों को उठाया है। वे कैसे राजनीतिक हालात थे, जिनके चलते गांधी को रास्ते से हटा देने की कुटिल रणनीति बनी, कैसे-कैसे लोग इस मुहीम में लाए गए और उनके सामने किस तरह की पेशवाई का खाका खींचा गया? इसी के साथ मुस्लिम लीग क्यों गांधी जी को नापसंद करती थी? क्योंकि मुस्लिम लीग को भी लगता था, कि यदि गांधी रहे तो उनका पाकिस्तान का सपना साकार नहीं हो सकता।

ख़ुद कांग्रेस के भीतर ऐसे तत्त्व थे, जिन्हें गांधी की धार्मिक उदारता भाती नहीं थी। लेकिन गांधी सब कुछ जानते हुए भी कट्टरपंथी शक्तियों से न सिर्फ़ लोहा लिए थे बल्कि वे उस दौर में अकेले व्यक्ति थे जो कट्टरपंथ कि आँखों में आँख डाल कर उन्हें झुका लेते थे। अन्यथा गांधी नोवाख़ाली न जा पाते, जहां डायरेक्ट एक्शन के तहत पूरा इलाक़ा हिंदुओं से रहित कर दिया गया था, जो बचे भी थे, वे अपने समुदाय की पहचान छिपा कर ही।

ठीक वैसे ही जैसे 1984 में दिल्ली के अंदर सिख समुदाय के तमाम लोगों ने अपनी धार्मिक पहचान छिपाने के लिए अपने केश कटवा लिए थे। तब भी ऐसे ही कट्टरपंथी तत्त्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या का बदला लेने की ख़ातिर पूरी सिख क़ौम को ख़त्म कर देना चाहते थे। सही बात तो यह है, कि कट्टरपंथ एक ऐसा भूत है, जो हर दल, हर समाज और हर समुदाय के साथ लगा ही रहता है। इसलिए जब भी मौक़ा मिलता है, वह अपना फन फैला लेता है।

इस पुस्तक में बताया गया है, कि महाराष्ट्र के पेशवा शासकों के वंशज सदैव अपने वर्चस्व को लेकर हिंदुत्त्व का सहारा लेते रहे। वह हिंदू धर्म, जिसमें उदारता, सहनशीलता और सहिष्णुता व विविधता की तमाम परतें छिपी हुई हैं, उसे उग्र बनाने के लिए कुछ लोग सतत प्रयासरत रहे।

उनको लगता रहा, कि उनकी पेशवाई सिर्फ़ हिंदुत्त्व के सहारे ही बच सकती है। और इसीलिए उन्होंने ख़ुद को एकमेव हिंदू हित-रक्षक के तौर पर पेश किया। ठीक वैसे ही जैसे जिन्ना और उत्तर प्रदेश एवं बिहार के ज़मींदार मुस्लिमों ने इस्लाम के भरोसे एक अलग देश बनाने का खाका अपने दिमाग़ में खींचा।

उनका मानना था, कि अंग्रेज यदि कांग्रेस को सत्ता सौंप कर चले गए तो देश में हिंदुओं का राज होगा, वह भी सवर्ण हिंदुओं का। वे लगातार इसी प्रयास में रहे, कि कांग्रेस अपने हिंदू रूप में ही रहे, ताकि वे आसानी से अलग पाकिस्तान ले सकें। लेकिन गांधी जी की समरसता और पारस्परिक समन्वय का सिद्धांत मुस्लिम लीग, जिन्ना एवं हिंदू महासभा तथा उसके नेता सावरकर दोनों के आड़े आ रहा था।

गांधी जी वह व्यक्ति थे, जिन्होंने हिंदू-मुस्लिम दोनों को झकझोर दिया था और दोनों अपना कट्टरपंथ छोड़ कर साथ रहने को राज़ी थे। पर चीजें बिखर गईं और द्वि-राष्ट्रवाद की थ्योरी ने मुस्लिम लीग को पाकिस्तान दे दिया।

गांधी वह शख़्सियत थे, जिनके नोवाख़ाली जाने के बाद हिंदू समाज के बड़े-बड़े धर्माचार्यों ने भी रीति-रिवाज बदल डाले। कहा गया, डायरेक्ट एक्शन के दौरान धर्मांतरित हो चुके हिंदू पुनः अपने धर्म में वापस आ सकते हैं। बलात्कार की शिकार हुई महिलाएँ हर तरह के पाप-बोध से मुक्त होंगी और जिनके पति मारे गए, वे पुनर्विवाह कर सकती हैं। रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी पुस्तक “संस्कृति के चार अध्याय” में लिखा है, कि जो काम बुद्ध, महाबीर आदि अनेक समाज सुधारक न कर सके, वह काम गांधी ने नोवाख़ाली जाकर कर दिखाया। हिंदू एक धर्म के रूप में गांधी के समक्ष नत था। ऐसे गांधी को कट्टरपंथ कैसे बर्दाश्त करता?

अशोक कुमार पांडेय ने अपनी पुस्तक में गांधी के इस पारस्परिक समरसता को बहुत अच्छे तरीक़े से पूरे तथ्यों के साथ रखा है। पुस्तक में तीन खंड हैं। पहले खंड में वे गांधी हत्या की साज़िश का खुलासा करते हैं। और दूसरे खंड में बताते हैं कि पूना के कुछ चितपावनों की पेशवाई की आग दिल्ली तक कैसे पहुँची।

तीसरे खंड में वे बताते हैं, कि गांधी हत्या की दोषी विचारधारा ने कैसे जनमत को अपनी तरफ़ करने के लिए साज़िशें की। मसलन प्रचारित किया गया कि गांधी जी 55 करोड़ रुपए पाकिस्तान को देना चाहते थे तथा कश्मीर का झूठा प्रचार। गांधी उनकी विचारधारा, उनका व्यक्तित्त्व और उनकी हत्या को आतुर शक्तियों के विषैले प्रचार को समझने के लिए इस पुस्तक- “उसने गांधी को क्यों मारा” ज़रूर पढ़नी चाहिए।

हो सकता है, कुछ तथ्य आपके भरोसे और विश्वास को तोड़ें। पर विश्वास का दूसरा रूप देखने को मिलेगा, जो आपको प्रभावित करेगा। हिंदी में ऐसी पुस्तकें नहीं हैं। ऐसे में अशोक पांडेय की पुस्तक आशा का संचार करती है। भाषा सरल, सहज और बोधगम्य है। पुस्तक का कलेवर और प्रिंटिंग भी।

कुल 276 पेज की इस पुस्तक के पेपरबैक संस्करण की क़ीमत है 299 रुपए। पुस्तक को राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली ने प्रकाशित किया है


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