क्या मध्यप्रदेश में मीडिया बिकाऊ है ?


कांग्रेस विधायक के सवाल से शिवराज सरकार
और मीडिया दोनों का काम संदेह के घेरे में

भोपाल। मध्यप्रदेश विधानसभा में कांग्रेस विधायक जीतू पटवारी की टिपण्णी पर हलचल मची है. पटवारी ने सवाल उठाया कि शिवराज सरकार सिर्फ महिमा मंडन वाले पत्रकारों और मीडिया हाउस को विज्ञापन और दूसरे फायदे पहुंचाती है. पटवारी के इस सवाल पर सरकार से जयादा मीडिया  और पत्रकार नाराज हैं. क्यों? क्या वाकई मीडिया बिकाऊ है, जो शिवराज के इशारों पर ज़िंदा है. पटवारी  के मूल सवाल पर किसी मीडिया हाउस ने ध्यान नहीं दिया. पटवारी ने यही पूछा न किसे कितना विज्ञापन दिया. आखिर सरकार ये नाम क्यों नहीं बताना चाहती? क्योंकि शिवराज सरकार ने कागज़ों पर चलने वाले अख़बार बिना लाइसेंस वाले अवैध चैनलों को भी खूब पैसा बांटा है. कुछ अखबारों को तो मंत्री नरोत्तम मिश्रा और जनसम्पर्क मुखिया एस के मिश्रा ने बड़े फायदे पहुंचाएं हैं. पटवारी को कोसने से बेहतर है सरकार मिश्रा की जोड़ी का सच और अखबारों के नाम क्यों नहीं बताती।
मामला 600 करोड़ का !
मध्यप्रदेश विधानसभा से उपजे एक विवाद ने प्रदेश के मीडिया और राजनीतिक जगत में हलचल मचा दी है। मामला मध्यप्रदेश सरकार की तरफ से दिये जाने वाले कई सौ करोडों के विज्ञापन का है। कांग्रेस के विधायक जीतू पटवारी के एक सवाल से सत्तापक्ष समेत पूरे मीडिया जगत में खलबली मच गई। दरअसल पटवारी ने सरकार से सवाल पूछा कि किस-किस मीडिया को अब तक कितना-कितना विज्ञापन दिया गया है। सरकार ने सवाल का जवाब तो दिया नहीं बल्कि जीतू पटवारी के कथित असंसदीय शब्दों पर बखेडा खडा करते हुए उनकी जमकर घेराबंदी कर दी, यहां तक की पटवारी पर विशेषाधिकार हनन का मामला भी समिति को सौंप दिया। सरकार ने पटवारी पर कार्रवाई तो शुरु कर दी लेकिन बडा सवाल यह है कि सरकार पटवारी के सवाल का जवाब क्यों नहीं दे पा रही है। सरकार ने इस बात का खुलासा क्यों नहीं किया कि करीब 600 करोड की रेवडियां आखिर किन-किन मीडिया घरानों को बांटी गई।

जानकारों का कहना है कि सरकार ने उन मीडिया घरानों को ही खास तरह से उपकृत किया है जो सरकार की वंदना करते हैं या फिर ये घराने सरकार पर भारी हैं। खबर तो यह भी है कि कई सारा मीडिया तो ऐसा है जिसका या तो कोई वजूद ही नहीं है या फिर बाहरी प्रदेशों और विदेशी मीडिया को लाखों-करोडों के विज्ञापन जारी कर दिए गए। तो क्या यह मान लिया जाए कि जनता की गाढी कमाई का पैसा सरकार ने अपनी मनमानी से ‘अंधा बाटे रेवडी, अपने-अपने को दे’ की तर्ज पर बांट दिया। यह बात इससे भी साफ होती है कि नर्मदा सेवा यात्रा का एक विज्ञापन बीते दिनों एक विदेशी मीडिया में प्रकाशित होने का मामला जोर पकडा था।
जीतू ने चोर कहा तो आप सिद्ध करो चोर नहीं हो !
बीते हफ्ते इंदौर के राऊ से कांग्रेस के विधायक जीतू पटवारी ने सदन में सरकार से सवाल पूछा- सरकार अब तक प्रचार-प्रसार और सरकारी गुणगान के लिए किस-किस मीडिया को कितना-कितना पैसा बांट चुकी है। इसी दौरान हंगामें के चलते जीतू पटवारी ने कहा कि ‘ये चोरों की मंडली है और चोरों को विज्ञापन देते हैं’. इस बात में कहीं भी जीतू पटवारी ने यह बात मीडिया के लिए कही हो ऐसा साफ नहीं था लेकिन यह साफ था कि संसदीय कार्य एंव जनसंपर्क मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने इसमें मीडिया शब्द को जोडते हुए विधायक पटवारी की घेराबंदी करते हुए खुद को मीडिया का हिमायती बताया। यह मान भी लिया जाए कि जीतू पटवारी ने असंसदीय शब्दों का इस्तेमाल मीडिया के लिए किया है तो सरकार की भी यह जिम्मेदार थी वह उनके पूछे सवाव का ईमानदारी से जवाब दे ताकि जनता के सामने पारदर्शिता को रखा जा सके। मीडिया के बेजा इस्तेमाल पर खुद प्रदेश के जनसंपर्क मंत्री ही ‘पेड न्यूज’ के मामले में फंसे हुए हैं। सरकार ने पटवारी के सवाल का जो जवाब दिया उसके मुताबिक बीते पांच वर्षों में सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में प्रचार पर 1,19,99, 82,879 रुपए की राशि खर्च की गई। इसके अलावा विशेष अवसरों पर प्रचार पर 1,95,43,72,353 रुपए के विज्ञापन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को दिए गए। जनसंपर्क मंत्री नरोत्तम मिश्रा द्वारा सदन में दिए गए जवाब के मुताबिक इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को पांच वर्षों में दिए गए विज्ञापन पर 3,15,43,55,232 रुपए खर्च हुआ है। जीतू पटवारी का आरोप है कि उन्होनें उन संस्थानों की सूची मांगी थी, जिन्हें विज्ञापन जारी किए गए हैं, लेकिन वह सूची उपलब्ध नहीं कराई गई।

सरकार ने इस तीखे सवाल को स्वींग कर दिया। दो साल पहले जब सरकार से यही सवाल तत्कालिन उपनेता प्रतिपक्ष बाला बच्चन ने पूछा था तो जवाब में कई ऐसे मीडिया हाऊस का जिक्र आया था जिसमें कुछ तो नाम मात्र के थे या फिर कुछ सरकार के निकटतम लोगों को महज उपकृत करने के लिए लाखों-करोडों का विज्ञापन दे दिया गया था। इस सूची के आने के बाद देशभर में यह मुद्दा जमकर उठा था। एक नेशनल मीडिया ने तो बकायदा इसे लेकर आधे घंटे की प्राईम टाईम स्टोरी भी चलाई। कई पत्रकार अपने मीडिया हाऊस की आड में वेबसाईट बनाकर सरकार से लाखों रुपये हजम कर चुके थे तो कुछ ऐसे पत्रकार जिनके पास सरकार की नब्ज दबी हुई थी, उन्होनें भी जमकर इन रेवडियों को लूटा। सूची के बाहर आने के बाद कई पत्रकारों को मीडिया घरानों ने बाहर का रास्ता दिखा दिया था।
जो मिश्रा जी कहे,करे वही सही !
प्रदेश में चलने वाले कई न्यूज चैनलों की रीढ सरकार से मिलने वाले भारी भरकम विज्ञापन ही हैं। सरकार अपना आभा मंडल बढाने के लिए छोटे-छोटे कार्यक्रमों में ओबी वेन खडी कर लाईव करवाती है। जनसंपर्क विभाग के आला अफसर जिनका नाम ही सत्यकाम है. खुद तय करता हैं कि किस चैनल की ओबी वेन कहां खडी रहेगी। प्रदेश में कई सारी फर्जी वेबसाईट और अखबार चल रहे हैं जो सिर्फ फाईल कॉपियां छापते हैं लेकिन उन्हें विज्ञापन के नाम पर भारी भरकम रकम दी जाती है।

सरकार के लिए जीतू पटवारी का यह सवाल गले की हड्डी साबित हो सकती थी लेकिन सरकार ने जीतू पटवारी पर ही पलटवार करते हुए तगडी घेराबंदी कर दी। सदन में इस सवाल पर दोनों पक्षों में जमकर नोंकझोंक हुई। सरकार ने मीडिया का ध्यान भटकाते हुए पटवारी पर विशेषाधिकार हनन के मामले की जांच समिति को सौंप दी है। दूसरी तरफ कांग्रेस के विधायक रामनिवास तिवारी ने कहा कि यह घटना सदन की कार्रवाई से विलोपित कर दी गई थी और विलोपित कार्रवाई वाली घटना पर विशेषाधिकार हनन का मामला नहीं बनता है।

 


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