ठाकरे ने अमिताभ को ज़िंदगी दी, जया बच्चन वही कर्ज उतार रही !


 

जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करने जैसे संवाद सदन में बोलने वाली जया बच्चन दरअसल खुद की बात तो नहीं कर रहीं, बाल ठाकरे ने उन्हें बेटी अमिताभ को दामाद माना,इसलिए जया शिवसेना के सत्ता की थाली में छेद होने से बचाने के लिए कंगना को कोस रही है बता रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार विवेक चौरसिया

आपको क्या लगता है कि संसद में जया बच्चन इसलिए तिलमिलाई कि कंगना रानौत बॉलीवुड में ड्रग्स के खेल को उछाल रही है और रविकिशन ने इस गन्दगी को साफ़ करने की आवाज़ लोकसभा में उठा दी। नहीं, जया ने बॉलीवुड के बचाव की आड़ में शिवसेना का बचाव करने की नाकाम कोशिश की है। अभिनेत्री ने राज्यसभा में विरोध का अभिनय कर वहीं संवाद बोला जो शिवसेना ने उन्हें रटा कर भेजा था।

‘जिस थाली में खाते हैं, उसमें छेद करना बंद करें’ जैसी न तो जया की भाषा है, न कंगना या रविकिशन ने किसी थाली में छेद की जुर्रत की है। हाँ, जया ने यह डायलॉग बोलकर शिवसेना की थाली में होते छेद को रोकने में अपना योगदान देकर मातोश्री में खाई रोटियों का कर्ज़ जरूर उतार दिया है।

बहुत कम लोगों को पता हो कि भोपाल से ब्याह कर जब अमिताभ बच्चन नववधू जया को मुंबई लेकर गए तब शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने दूल्हा-दुल्हन दोनों को मातोश्री आमंत्रित किया था। जब दोनों पहुँचे तो ठाकरे की पत्नी मीना ने पूरे परिवार सहित जया का वैसा ही स्वागत किया था जैसे घर में नई बहू आई हो। ठाकरे ने जया को बेटी माना था और अमिताभ को जमाई।

वह दिन था और आज का दिन है, जया, ठाकरे परिवार की बेटी ही हैं। स्वाभाविक है सियासत के सबसे मुश्किल दौर में गुज़र रहे ‘भाई’ उद्धव की रक्षा में ‘बहन’ को ताव आ गया और उच्च सदन में बॉलीवुड को बदनाम करने के नाम पर ‘गरज’ पड़ी।

ज़माना जानता है कि 40 साल से भी ज्यादा समय से ठाकरे और बच्चन परिवार एक थाली में खाते आए हैं। दोनों कुनबों के बीच इतना गहरा रिश्ता है कि बस एक-दूसरे का सरनेम ही अदल-बदल कर इस्तेमाल नहीं करते वरना एक ही है। दोनों के कुल बुनियाद में कायस्थ है। दोनों राजनीति, फ़िल्म, ग्लेमर, गैलक्सी, दौलत, दिखावे, पॉवर और प्रभाव में समान हैं और परस्पर एक-दूसरे के सहयोगी रहे हैं।

अमिताभ सहित पूरा बच्चन परिवार जीवन भर बाल ठाकरे के चरणों में सार्वजनिक शीश झुकाता आया है। जब ठाकरे का देहांत हुआ, तब अमिताभ ने अपने ब्लॉग में लिखा था, ‘कुली फ़िल्म की शूटिंग के वक्त गम्भीर चोट लगने के बाद जब मुझे अर्ध चेतनावस्था में बेंगलुरु से मुंबई लाया गया तब यदि ठाकरे न होते तो मैं मर ही जाता।’ उस दिन मुंबई में खराब मौसम के कारण जब अमिताभ के लिए एम्बुलेंस न मिली तब ठाकरे ने ही एम्बुलेंस का इंतज़ाम कराया था। बकौल बच्चन ‘ठाकरे न होते तो मैं ज़िंदा न बचता। मेरी ज़िन्दगी उन्हीं की दी हुई है।’

जो ठाकरे साल में केवल एक बार दशहरे पर पार्टी की रैली के लिए मातोश्री से निकलते थे, वरना सिंहमुख उत्कीर्ण पायों वाले स्वयंभू सिंहासन पर अपने किले में ही बैठे रहते थे, वे उस दौर में उपचाररत बच्चन से मिलने अक्सर लीलावती अस्पताल जाते रहे।

एक बार तो स्वचित्रित एक कार्टून लेकर पहुँचे थे जिस पर लिखा था, ‘हार गए यमराज!’ अस्पताल से घर आने के बाद भी बच्चन के लिए लंदन से जरूरी दवाइयां ठाकरे ही मंगवाते रहे। मतलब मदद से लेकर मोहब्बत तक और हौसला अफ़जाई से लेकर सौजन्य तक सब कुछ दोनों तरफ़ से ख़ूब चला।

किसे नहीं पता कि साल 2012 में जब बाल ठाकरे अंतिम सांसें ले रहे थे, बच्चन बराबर मातोश्री में हाज़री देते रहे। तब शायद आराध्या का जन्मदिन भी आया था और ‘घर के बुजुर्ग’ की नाज़ुक हालत के चलते ‘जलसा’ में पोती के जन्मदिन का जलसा टाल दिया गया था।

यहाँ तक कि ठाकरे के लगभग अंतिम दोनों में जब बच्चन पिता-पुत्र दोनों उनसे मिलने के लिए मातोश्री पहुँचे तो भावुकता के आवेग में भड़के शिवसेना के मवालियों ने अमिताभ और अभिषेक पर ही भड़ास निकाल दी थी और दोनों के कपड़े तक फाड़ डाले थे। मातोश्री में ही दोनों बाप-बेटे मरहम पट्टी कराकर घर आए थे और एक शब्द भी शिवसेना के खिलाफ न फूटा था।

याद कीजिए जब ठाकरे मरे तब अमिताभ की प्रतिक्रिया थी, ‘वे मेरे लिए पिता समान थे। भगवान बाला साहब की आत्मा को शांति दे। वे एक युग पुरूष थे। उनके जाने से एक युग का अंत हो गया है। उनकी क्षति को कोई नहीं भर सकता है।

‘ जब ठाकरे का अंतिम संस्कार हुआ तब दोनों बाप-बेटे उनकी अर्थी आने से पहले ही श्मशान में खड़े थे और अस्थि संचय के बाद ही हिले थे। बाल ठाकरे के अधिकांश कार्यक्रमों में अमिताभ बच्चन ‘परिजन’ की तरह शामिल होते रहे और मुसीबत की घड़ी शरणागत भी रहे।

आपको याद होगा कि मुंबई में ‘शिवसैनिक’ दाऊद इब्राहिम की करतूत से साल 1993 में हुए बम धमाकों पर मणिरत्नम की फ़िल्म ‘बॉम्बे’ आई थी। ऑन रेकॉर्ड इस बहुचर्चित फ़िल्म का वितरक कोई और था मगर ऑफ़ द रेकॉर्ड अमिताभ थे।

फ़िल्म में एक किरदार बाल ठाकरे से प्रेरित था जो टीनू आनन्द ने निभाया था। दम्भी ठाकरे को यह किरदार, ख़ासकर उसका एक डायलॉग जँचा नहीं और उन्होंने मुंबई में फ़िल्म की रिलीज़ पर रोक ठोक दी। कहते थे तब अमिताभ, ठाकरे के पास गुहार लगाने पहुँचे।

उनका मुनाफ़ा जो फँस रहा था। बच्चन ने पूछा, ‘बाला साहेब! क्या फ़िल्म में शिव सैनिकों को दंगाइयों के रूप में दिखाए जाने से आप नाराज़ हैं? तब ठाकरे ने कहा था, ‘नहीं, बल्कि इसलिए कि मेरी कॉपी का जो किरदार है, वह दंगे के लिए अफ़सोस ज़ाहिर करता है। यह मुझे पसंद नहीं आया क्योंकि मैं कभी अपने किए पर अफ़सोस नहीं जताता।’ दोनों में ठहाका लगा और ‘आशीर्वाद’ के साथ फ़िल्म रिलीज़ हो गई।

यह भी याद कीजिए कि रामगोपाल वर्मा की बनाई फिल्मों ‘सरकार’ और ‘सरकार राज़’ दोनों ही बाल ठाकरे से प्रेरित थी और दोनों में ठाकरे का किरदार अमिताभ ने निभाया था। दोनों में छोटे बच्चन भी थे और दूसरी में बहू ऐश्वर्या भी। फिल्में देखकर ‘अंधे’ की भी आंखें खुल सकती है कि जीवन भर ठाकरे और उनकी गुंडा सेना ने मुंबई और महाराष्ट्र में क्या गुल खिलाए।

अमिताभ ने बाल ठाकरे को बहुत नज़दीक से जो देखा था, इसलिए अभिनय में जो जान डाली वह फ़िल्म में लोगों की जान लेते वक्त जीवंत कर दी थी। तभी तो जीते जी ठाकरे अपने बेटे जैसे काबिल ‘जमाई’ के लिए कहते थे, ‘इसे भारत रत्न मिलना चाहिए।’

इतिहास गवाह है कि साल 1966 में मुंबई में कम्यूनिस्ट आंदोलन की काट करने के लिए इंदिरा गाँधी ने ही बाल ठाकरे का सियासी इज़ाद किया था। आपातकाल लगाने पर यही ‘शेर’ ठाकरे महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री शंकरराव चव्हाण की धमकी पर इंदिरा के फैसले की हाँ में हाँ मिलाने को तैयार हुए थे।

चव्हाण का फ़तवा पहुँचा था कि या तो जेल जाओ या आधे घण्टे में मुंबई के दूरदर्शन स्टूडियो पहुँचकर आपातकाल का समर्थन करो। कहा जाता है तब ठाकरे महज़ 15 मिनट में घर के बाहर आ खड़े हुए थे।

फिर बच्चन परिवार तो नेहरू-गाँधी परिवार का अनन्यतम हैं ही। राजीव-संजीव और अमिताभ-अजिताभ साथ बड़े हुए हैं। राजीव से शादी के पहले सोनिया, बच्चन के ही घर रुकी थी और अमिताभ की माँ तेज़ी ने अपनी ख़ास सहेली इंदिरा के कहने पर भावी बहू को भारत और भारतीयता के ‘संस्कार’ दिए थे।

अमिताभ कांग्रेस से ही सांसद बने थे और इंदिरा के बलिदान की लहर में इलाहाबाद में हेमवतीनंदन बहुगुणा को पटखनी देकर दोस्त राजीव के सहायक बन बोफ़ोर्स में नाम आने तक नेता बने फिरते रहे थे।

सार यह कि दोनों शुरू से आज तक इतने एक है कि ‘एक’ शब्द उनकी व्याख्या के लिए छोटा है। दोनों के लिए केवल अपने मतलब मुख्य है बाक़ी सब दो कौड़ी का है। स्वार्थ के लिए कांग्रेसी तो मौका पड़ने पर समाजवादी। दोनों ‘नशे’ में हैं, इसलिए दोनों को क़दाचित ‘नशे’ की परवाह नहीं।

असम्भव हैं कि 45 साल से फिल्मों में सक्रिय जया बॉलीवुड में ड्रग्स संस्कृति से अनजान हो! पुरानी पीढ़ी शराब के नशे में झूमती थी तो नई का नया शौक ड्रग्स है। माना कि सब नशेड़ी नहीं हैं मगर संजय दत्त से फरदीन खान तक, प्रतीक बब्बर से हनी सिंह तक, रणवीर कपूर से सुशांतसिंह तक और कंगना से रिया तक सबका अतीत और वर्तमान उसी बदनामी का सबब है जो आज बॉलीवुड के हिस्से आ रही है। कीचड़ है तो उछल रहा है।

मैं निजी तौर पर अमिताभ और जया दोनों का फ़िल्मी प्रशंसक हूँ लेकिन इस बार जया ने इस पूरे कांड में अपनी मौकापरस्ती दिखाकर दिल ही दु:खाया है। जो अभिनेत्री अभिव्यक्ति के दर्ज़नों राष्ट्रीय व सामाजिक मौकों पर अपनी फिल्मों की तरह मौन ‘गुड्डी’ बनी रही उसने शिवसेना में अपने ‘भाई’ की मदद के लिए संसद के मंच का इस्तेमाल कर अपनी मतलबी मानसिकता ही सरेआम की है।

सम्भव है कुछ लोग थाली में छेद कर रहे हो मगर ठाकरे-बच्चन उन लोगों में हैं जो किचन में सुलगते गैस सिलेंडर पर ही हाथ तापने बैठ गए हैं। इतिहास उत्कृष्ट अभिनय के लिए भले बच्चन दम्पत्ति को जरूर याद करें लेकिन कल राज्यसभा में किये ‘अभिनय’ के लिए जया को शायद ही क्षमा कर सकेगा।


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