सिंधिया नरेशों की कटी नाक !


Disclaimer…इस पोस्ट को मध्यप्रदेश के उपचुनावों से जोड़कर बिलकुल न देखा जाए। ये पूरी तरह से गैर राजनीतिक पोस्ट है, जिसे एक घूमंतु पत्रकार ने लिखा है।

शम्भूनाथ शुक्ल (वरिष्ठ पत्रकार )

मैं ऐसे कमीजनुमा कुरते नहीं पहनता और न बदन के ऊपर इतना झिलमिल करते वस्त्र। हुआ यह कि एक दिन मैं पलवल गया हुआ था। वहां अपने एक जाट मित्र मिल गए और योजना बनी कि दतिया के पीताम्बरा पीठ में चला जाए। उनका विश्वास था कि पीताम्बरा पीठ शक्तिपीठ है और उन्हें चूँकि हरियाणा विधानसभा में पहुंचना है तो इसमें पीताम्बरा पीठ पक्का मदद करेगी।

मैंने कहा न तो घर में किसी को सूचना है न अपने पास पहने हुए वस्त्रों के अलावा अन्य कपड़े हैं। मित्र ने कहा घर पर सूचना मोबाइल से दे दी जाए और कुरता-पजामा मेरा आपको फिट हो जाएगा। रह गए अन्तःवस्त्र तो आगरे में खरीद लेंगे। और गाड़ी आप लाए ही हैं। फिर क्या और चाहिए! अपन ठहरे फक्कड़ मियाँ सो चल दिए।

शाम तक आगरा लगे जाकर। वहाँ के एक माल से अन्तःवस्त्र खरीदे गए और एक ब्लैकबेरी की पैंट तथा लुइस फिलिप की शर्ट भी। रात 9 बजे ग्वालियर पहुंचे, वहीँ एक सामान्य-से होटल में रात्रि विश्राम किया और सुबह नाश्ते के उपरांत चल दिए। रास्ता अच्छा नहीं था। किंतु दोपहर तक दतिया के पीताम्बर पीठ पहुंचे। यह नानकपंथी उदासीन सम्प्रदाय की एक पीठ है।

दतिया यूपी और एमपी की सीमा पर एक छोटा-सा क़स्बा है। वहाँ बुंदेले राजाओं का एक पुराना क़िला है। उस समय मध्य प्रदेश में पर्यटन मंत्री थे, नरोत्तम मिश्रा। वे आजकल मध्य प्रदेश के गृह मंत्री हैं। मिश्रा जी दतिया से ही विधायक थे, उन्होंने दतिया के सर्किट हाउस में मेरी रुकने की व्यवस्था कर दी। किंतु यह शहर बहुत छोटा है, और ऊँची पहाड़ी पर स्थित एक ध्वस्त क़िले और पीताम्बर पीठ के अलावा कुछ नहीं है, इसलिए मैंने यहाँ रात्रि निवास नहीं किया।

पीताम्बर पीठ यहाँ की सिद्ध पीठ समझी जाती है, और यहाँ बगलामुखी देवी का मंदिर है। इसकी देख-रेख उदासीन अखाड़े के साधुओं के पास है। वह जुलाई का महीना था और मंदिर के चारों तरफ़ टिड्डे बहुत थे। उनसे बचते हुए हमने मंदिर में दर्शन किए और चल दिए। शहर के बाहर आते ही फ़ोर लेन हाई वे दिखा, हम उसी पर आगे बढ़े। यह हाई वे शिवपुरी की तरफ़ जा रहा था।

हम इसी पर आगे बढ़े। शिवपुरी के माधव राष्ट्रीय उद्यान में रुकने की मेरी इच्छा थी। माधव राष्ट्रीय उद्यान देखने लायक जंगल है और घड़ियालों से भरी झील भी है। झील के किनारे ग्वालियर के सिन्धिया राजाओं का बनवाया महल है, जो अब मप्र वन विभाग के अधीन है। वहां अपने मित्र और वरिष्ठ पत्रकार श्री प्रमोद भार्गव ने एक शूट की व्यवस्था करवा दी।

भोजन के लिए कुक था बस उसे राशन-पानी का खर्च देना था। रात का नज़ारा तो अद्भुत होता है। सुबह जंगल की तरफ गया जहाँ इस उजाड़ पड़े जार्ज कैसल को देखा। इसे तब बनवाया गया था जब 1912 में दिल्ली दरबार के दौरान जार्ज पंचम आए तो तय हुआ था कि यह अंग्रेज राज कुंवर शिवपुरी शिकार के लिए आएगा और यहीं रात गुजारेगा।

सिंधिया नरेशों ने अपनी राज-भक्ति का परिचय देते हुए मकराना के संगेमरमर से यह कैसल बनवाया मगर दुर्भाग्य कि जार्ज पंचम आए नहीं और सिंधियाओं की नाक कट गई। मारे गुस्से के सिंधिया राजा ने अपनी नाक काटकर फेक दी और नकली नाक लगा ली। यह कैसल तब से बंद पड़ा है। जंगल के बीचोबीच बने इस जंगल में अब सियार रोते हैं और बियाते हैं।

बहरहाल, सिंधियाओं का यह कैसल बना शानदार है। इस कैसल में नीचे बैठका है और ऊपर दो सुइट। विशालकाय संगमरमर के पत्थर से बने पलंग और बाथरूम के बाथटब ऐसे कि प्राचीन नरेशों की जलक्रीड़ा याद आ गई। किंतु सब अछूते पड़े हैं। बहरहाल शिवपुरी के जंगल देखे और वापस दिल्ली लौट आए।

‘गद्दार’ सच .. ग्वालियर-चम्बल में सिंधिया का ‘चेहरा’ कभी नहीं जीता

 


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