पंकज मुकाती
ओलिंपिक में भारत ने कई पदक जीते। भारतीय हॉकी की रौनक फिर लौटी। पुरुषों ने कांस्य पदक जीता। ये कारनामा पूरे 41 साल बाद हुआ। हॉकी हमारा राष्ट्रीय खेल। पर इस पर एक चक दे इंडिया फिल्म के अलावा हिन्दुस्तानियों को कोई बड़ी बात याद नहीं।
सरकारों ने भी इसे राष्ट्रीय धरोहर की तरह ही उपयोग किया। जब हॉकी में की बारी आती है, तो सरकारों के बजट कम पड़ जाते हैं। पर जब खिलाडी अपने पसीने के निचोड़ में पदक लाते हैं, तब देश के प्रधानमंत्री से लेकर राज्यों के मुख्यमंत्री तक सीना चौड़ा करके आ जाते हैं।
प्रधानमंत्री ने तो एक-एक हॉकी खिलाडी के जीवन उसके खेल पर ट्वीट कर देश को उन से परिचित कराया। ऐसे नेता खिलाडियों की मजबूरियों उनकी दिक्कतों पर कभी आगे क्यों नहीं आते।
देश की सरकार ने इस राष्ट्रीय खेल को स्पांसर क्यों नहीं किया। क्यों उड़ीसा राज्य को इसकी जिम्मेदारी लेनी पड़ी ? ऐसे ही हाल हॉकी सहित दूसरे खेलो में भी है। हॉकी की टीम को स्पांसर करने के दौरान और न ही उसकी जीत के बाद उड़ीसा के मुख्यमंत्री ने किसी तरह का वीडियो शेयर किया न श्रेय लेने का कोई प्रायोजित अभियान चलाया।
खिलाडियों का परिचय करवाने का काम वैसे नवीन पटनायक को करना चाहिए, वे इसके असली हकदार हैं। खिलाडियों को भी उन्हें धन्यवाद देना चाहिए। राज्यों ने अलग-अलग इनामी योजना चला रखी है। जीतोगे तो करोड़ रुपये मिलेंगे।
ये सरकारें जीत के पहले खिलाड़ियों पर खेल पर पैसा क्यों नहीं खर्चती। जीत के बाद अपनी कमजोरी ढंकने को ऐसी इनामी योजना लाकर वे क्या साबित करना चाहते हैं। हिंदुस्तान के खेल का बजट बढ़ना चाहिए। जो खिलाडी अपने दम पर राष्ट्रीय स्तर तक आ जाते हैं, उन्हें उनका हक़ मिलना ही चाहिए न कि जीतने पर ही इनाम।
सरकार की एक योजना है-खेलो इंडिया ये कही कागज़ों में ही खेल रही है। नया नारा होना चाहिए-खेलो इंडिया, शाबाशी नेताजी लेंगे।
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