राष्ट्रवाद के नाम पर आज़ादी छीनने का दौर…


 

कब कह सकेंगे-मैं आज़ाद हूँ

देश में विधायक बिकने को खड़े हैं, उनको कैद क़रना पड रहा है, लोगों को मॉब लिंचिंग के नाम पर घेरकर मारा जा रहा है, रंगों से देशभक्ति मापी जा रही है, आज ये जानना जरुरी है कि पिछले कुछ सालों में कैसे हमारी आज़ादी धीरे-धीरे छीनी जा रही है,राष्ट्रवाद के नाम पर

पंकज मुकाती (राजनीतिक विश्लेषक)

हिंदुस्तान अपनी आज़ादी का 74 वां साल मना रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालकिले से सातवीं बार भाषण दिया। अब वे लाल किले से आज़ादी दिवस पर भाषण देने वाले प्रधानमंत्रियों में चौथे नंबर पर आ गए हैं। उनसे आगे अब मनमोहन सिंह, इंदिरा गांधी और जवाहरलाल नेहरू हैं। नेहरू ने 14, इंदिरा ने 11 और मनमोहन ने 10 बार ये सौभाग्य हासिल किया।

देश की विकास की गाथा और आज़ादी के तराने हम इतने सालों से सुन रहे हैं। देशभक्ति का ज़ज़्बा उस वक्त सबसे ऊपर होता है, जब प्रधानमंत्री तिरंगा फहराते हैं, उस वक्त हर हिंदुस्तानी का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। पर क्या वाकई पूरा हिंदुस्तान आज़ाद है ? सबको समान अधिकार मिले हैं। ऐसे कई सवाल भी इस किले की प्राचीर पर हर साल मंडराते हैं। जन प्रतिनिधियों की बाड़ाबंदी की नौबत आ रही। उन्हें कैद करके रखना पड़ रहा है। कहीं कोई दल उन्हें चुरा न ले।

राजस्थान के मामले में तो सब विधायकों को एक साथ भी भाजपा ने नहीं रखा। शायद, ये डर था कि एक दूसरे से बात करने से इनकी मति न फिर जाए। क्या यह आज़ादी है ? जब विधायक तक कैद हैं, या कहिये बेशर्मी से बाज़ार में बिकने को खड़े हों, तब कैसे देश के संविधान और आज़ादी के भाषणों पर ताली पीटी जाए। क्या भाषण और उनपर तालियां सिर्फ रस्म अदायगी है।

देश में आज़ादी के बाद कहां-कहां आज़ादी खत्म हो गई या कैद कर ली गई, इसे भी ध्यान रखना होगा। अदम गोंडवी ने लिखा था- सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद हैं, दिल पे रखकर हाथ कहिए देश क्या आजाद है? मामला इससे बहुत अलग नहीं है। मंदिर, मस्जिद से आगे अब तिरंगे के रंगों को भी धर्म से जोड़ दिया गया है। सोचिए यदि कोई हिन्दू हरे रंग की टोपी या कपड़ा पहन ले, यदि कोई मुस्लिम भगवा दुपट्टा डाल ले। हम ऐसे ही रंगों से अब हिंदुस्तानी और देशद्रोही की पहचान कर रहे हैं। धर्म के निशान भी बहस का मुद्दा हो गए।

राम की पूजा भी कुछ लोग अपने ही कब्ज़े में रखना चाहते हैं। दो दिन पहले टीवी चैनल पर एक हिन्दू आदमी तिलक लगाकर चला गया, तो उस पर एक विरोधी हिन्दू पार्टी के विशाल-तिलकधारी प्रवक्ता ने इतने हमले किए, इतने हमले किए कि वह मर गया। अब 70 बरस के बाद भी अगर तिलक की आजादी नहीं मिल पाई है, एक हिन्दू को भी तिलक लगाने पर गालियां मिल रही हैं, तो फिर धार्मिक आजादी किसे और कैसे मिलेगी? क्या ये संविधान के मूलभूत अधिकारों का हनन नहीं है।

देश के सबसे अभिन्न अंग कश्मीर की आजादी को सस्पेंड किए एक पूरा बरस हो गया है। हिन्दुस्तान में धरती की जन्नत कहे जाने वाले कश्मीर के इन हालातों पर चर्चा करने को कितने लोग राजी हैं ? यदि ये सवाल उठाया जाएगा तो हम देशद्रोही कहलायेंगे। कश्मीर से बेदखल कश्मीरी पंडित उनके मुद्दे को सबसे तल्खी से उठाने वाली भाजपा की अटल सरकार के छह बरस पहले देख चुके, और अब मोदी सरकार के छह बरस देख रहे हैं। अब भी वे कश्मीर को दूर से देख रहे हैं। वे शायद जाकर अपने घर, अपनी जमीन को भी देखने की हालत में इन दो सरकारों के इन बारह बरसों में नहीं आ सके हैं।

ये दो अलग-अलग तबके हैं, दशकों पहले कश्मीर से बेदखल पंडित, और आज कश्मीर में बाकी बचे तमाम मुस्लिम, इन दोनों की आजादी का सवाल भी जरुरी है। देश में दलितों के साथ अन्याय अब भी जारी है। मॉब लिंचिंग हिंसा और बदले का एक नया तरीका है। जिसकी भी आज़ादी या आज़ाद जीवन आपको नहीं सुहाता है, उसे भीड़ घेरकर मार देगी। हम इसे न्याय कहेंगे।

गौवंश की रक्षा जरुरी है, पर उसके नाम पर मनुष्य की जान लेने की आज़ादी आपको किसने दी ? कोरोना संक्रमण के दौर में निजी अस्पतालों की लूट, आम आदमी को अपने घर पहुंचने की दिक्कतें। राज्य सरकारों द्वारा चुन-चुनकर दूसरे राज्यों के मजदूरों को अपने राज्य से निकालना। क्या अखंड भारत के इसी सपने के लिए आज़ादी हासिल की थी ? क्या हम सामंती व्यवस्था की तरफ लौटते नहीं दिख रहे ?
हिन्दुस्तान सबका है। असली आजादी तभी है, जब हर आदमी कह सके-मैं आजाद हूं। जय हिन्द


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