‘गद्दार’ सच .. ग्वालियर-चम्बल में सिंधिया का ‘चेहरा’ कभी नहीं जीता

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ग्वालियर ने महल को नहीं कांग्रेस को ही दिए वोट

मध्यप्रदेश में 27 सीटों पर उपचुनाव हो रहे हैं, इसमें से 16 सीटें ग्वालियर चम्बल की हैं, लोगों के बीच ये चर्चा रही कि इस इलाके में महाराज की ही चलती है, पर जब जमीनी तौर पर एक-एक सीट की पड़ताल कि तो सामने आया कि  महाराज के चेहरे पर कुछ सीटों को छोड़कर जनता ‘माफ़ करो महाराज’ ही कहती रही है। यदि सिंधिया इतने प्रभाव वाले होते तो विधानसभा चुनाव के सिर्फ पांच महीने बाद खुद सवा लाख वोट से नहीं हारते ..

पंकज मुकाती (राजनीतिक विश्लेषक )

दो सप्ताह पहले ग्वालियर-चम्बल में जब ज्योतिरादित्य सिंधिया ‘गद्दार’ गूंजा तो एक धक्का लगा। वो चेहरा जिसे हम ग्वालियर-चम्बल की जीत की गारंटी मान रहे हैं, वो गद्दार ? पहली नजर में लगा ये नारे राजनीतिक साजिश का हिस्सा हैं। पर जब इलाके की मैदानी पड़ताल की, तो चेहरे की चमक बेहद फीकी नजर आई।

सामने ये आया कि सिंधिया कभी इस इलाके में जनप्रिय नेता रहे ही नहीं। उनकी पूरी राजनीति ग्रे शेड वाली है। जनता ने कभी उनके चेहरे पर वोट दिए ही नहीं। यदि सिंधिया इलाके के जनप्रिय नेता होते तो 2018 विधानसभा चुनाव के ठीक पांच महीने बाद ही वे एक लाख पच्चीस हजार वोट से लोकसभा चुनाव नहीं हारते। आप इसे मोदी लहर की दीवार से ढांक सकते हैं, पर वो नेता ही क्या जो खुद अपना गढ़ न बचा सके। कमलनाथ की छिंदवाड़ा सीट अपने गढ़ बचाने की मिसाल है।

2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस छिंदवाड़ा जीती, पर गुना हार गई। अभी भी ग्वालियर-चम्बल की जनता ‘माफ़ करो महाराज’ के ही मूड में दिख रही है।

पूरे 16 विधायक भी सिंधिया के साथी नहीं

पिछले विधानसभा चुनाव (2018 ) में 34 में से 26 सीटें कांग्रेस ने जीती। इसमें से 16 सीटों पर उपचुनाव हो रहे हैं। इन सीटों के बारे में धारणा है कि यहां सिंधिया का जलवा रहेगा। जबकि हकीकत में ऐसा नहीं है। इस इलाके के 10 विधायक अब भी कांग्रेस के साथ हैं। इसके अलावा 16 सीटों में से छह विधायक  ऐसे हैं जो कभी सिंधिया के साथ रहे ही नहीं। वे अपने कारणों से कांग्रेस छोड़कर गए, सिंधिया के साथी बनकर नहीं।

ग्वालियर .. ज्योतिरादित्य के आने के बाद कांग्रेस लगातार हारी

ग्वालियर सीट को महल से जोड़कर देखा जाता है। सामान्य लोगों को लगता है कि ग्वालियर में सिंधिया घराने की तूती बोलती है। जो महाराज कहते हैं उसको वोट मिलते हैं, पर ऐसा है नहीं। ज्योतिरादित्य सिंधिया के राजनीति में आने के बाद से एक बार को छोड़कर यहां से कांग्रेस लगातार हारती रही है। इसका साफ़ मतलब है कि ग्वालियर में ज्योतिरादित्य सिंधिया की कोई पकड़ नहीं है। इससे ये भी साफ है कि ग्वालियर की विधानसभा सीटों में मिली जीत भी सिंधिया की नहीं कांग्रेस की अपनी जीत है।

गुना… अपने घर में सिंधिया का सिर्फ एक समर्थक

गुना लोकसभा सीट जिसे लेकर ज्योतिरादित्य सिंधिया खुद को बड़ा नेता मानते रहे। इस सीट से अपराजेय रहने का उनका गुरुर भी अब टूट चुका है। 2019 का लोकसभा चुनाव सिंधिया यहां से 1 लाख तीस हजार वोट से हार चुके हैं। इस इलाके में चार विधानसभा सीट हैं, इसमें से 2018 में तीन कांग्रेस ने जीती।

इन तीन सीटों में से सिर्फ एक सिंधिया समर्थक है। बमोरी से महेंद्र सिसोदिया। सिसोदिया की जीत सिंधिया का कोई करिश्मा या प्रभाव नहीं है। ये जीत भाजपा की बगावत से सिसोदिया को मिली। भाजपा ने यहां से अपने कद्दावर नेता और पूर्व मंत्री कन्हैयालाल अग्रवाल का टिकट काट दिया था। अग्रवाल निर्दलीय लड़े भाजपा के वोट की टूट का फायदा सिसोदिया को मिला।

अग्रवाल और भाजपा के उम्मीदवार के कुल वोट सिसोदिया के ज्यादा रहे थे। इसके अलावा दो सीट पर सिंधिया चाहकर भी नहीं कह सकते ये मेरी जीत है। चांचौड़ा से लक्ष्मण सिंह विधायक हैं, तो राघोगढ़ से जयवर्धन सिंह।

सिंधिया ने कई बड़े नेताओं को किया बर्बाद

ग्वालियर चम्बल क्षेत्र के मजबूत कांग्रेस नेताओं जैसे रामनिवास रावत, डॉ. गोविन्द सिंह, ग्वालियर से पूर्व मंत्री रहे बालेन्दु शुक्ल, भगवन सिंह यादव, रामसेवक सिंह गुर्जर, अशोक सिंह, शिवपुरी से हरिबल्लभ शुक्ल, के पी सिंह कक्काजू, दतिया के घनश्याम सिंह, महेंद्र बौद्ध, शिवपुरी के वीरेन्द्र रघुवंशी (जो वर्तमान में कोलारस से भाजपा विधायक हैं), जैसे अनेक नाम हैं जिन्हें ज्योतिरादित्य सिंधिया ने राजनितिक रूप से समाप्त करने के हर प्रयास किये।

भाजपा के लिए भी सिंधिया एक ‘भूल ‘

भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता का कहना है कि ग्वालियर-चम्बल में वोटों का एक ट्रेंड रहा है। पिछले चुनाव में शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ लोगों में बड़ी नाराजगी थी, दूसरा इस पूरे इलाके में कमलनाथ ने सर्वे के जरिये जमीनी नेताओं को टिकट दिए। जिसका नजीता ये रहा कि कांग्रेस ने बड़ी जीत हासिल की।

भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को भी लगता था कि सिंधिया ग्वालियर-चम्बल में बढ़त दिलाने वाला चेहरा होंगे। स्थानीय नेतृत्व शुरू से ही सिंधिया को शामिल करने के खिलाफ था। अब खुद भाजपा को भी लगने लगा है कि सिंधिया को लेना एक बड़ी भूल है। भाजपा भी अब सिंधिया के चेहरे को पोस्टर और प्रचार में बहुत आगे नहीं रख रही। सिंधिया अब उनके लिए हार का चेहरा बनते दिख रहे हैं।

कल पढ़िए…

जिसे कलदार समझा, वो तीन पैसे का सिक्का निकला, चलन से भी बाहर ..लोकसभा की हार और गद्दार के नारे के बाद तो ये नाम अब तीन पैसे के उस सिक्के की तरह हो गया जो न दिखने में अच्छा है न चलन में। अब ये सिर्फ तिजोरी (राज्यसभा ) में धरोहर के तौर पर रखा जा सकता है …

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