सरकारों की सहायता के भरोसे रहोगे तो डायनासॉर की तरह लुप्त हो जाओगे !


 

कोरोना के दौर इस दौर में काम पर वापसी और ज़िंदा रहने के लिए बदलाव कितना जरुरी है बता रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार सुनील कुमार

चारों तरफ से दुख-तकलीफ की खबरों के बीच एक अच्छी खबर है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के एयरपोर्ट वाला गांव अपनी महिला सरपंच की अगुवाई में बाहर से लौटे मजदूरों को तुरंत ही सरकारी काम में मजदूरी दे रहा है। लोग आते ही काम पर लग गए, सरकारी रेट पर रोजी मिलने लगी। आज जब कोरोना ने पूरी दुनिया को उथल-पुथल कर दिया है, धरती से लेकर समंदर की गहराई तक, और उधर अंतरिक्ष में ओजोनलेयर के पार तक कोरोना की वजह से जिंदगी में आई तब्दीली दिख रही है।

बहुत से लोग यह नहीं समझ पा रहे हैं कि आगे की जिंदगी कैसी होगी। यह समझना सचमुच ही मुश्किल है। क्योंकि लोगों ने ऐसा कभी देखा नहीं था। 102 बरस पहले की भारत की महामारी के बारे में सुनाने वाले बाप-दादा अब बचे हुए नहीं होंगे। इसलिए लोग यह समझ नहीं पा रहे हैं कि लॉकडाऊन खत्म होने के बाद, धीरे-धीरे जिंदगी पटरी पर लौटने के बाद भी वह जिंदगी आज तक की जिंदगी जैसी नहीं रहेगी। वह एक अलग अर्थव्यवस्था रहेगी, अलग कारोबार और रोजगार रहेंगे।

जिंदगी का रोज का तौर-तरीका बिल्कुल अलग रहेगा। यह कुछ महीनों के लॉकडाऊन के बाद फिर से पुरानी जिंदगी बिल्कुल नहीं रहेगी। ऐसे में सबसे ज्यादा बचने की संभावना मजदूरों की होगी। मजदूर महीने भर पैदल चलकर आए, और अगले ही दिन कुदाली-फावड़ा लेकर मनरेगा में रोजी कमाने में लग गए। जो लोग इस रफ्तार से नई जगह, नए काम, नए हौसले पर नहीं पहुंच पाएंगे, वे पिछड़ जाएंगे।

हमारी किस्म के लोग जो दफ्तर में, मेज पर, कम्प्यूटर पर, एक खास किस्म का काम अब तक करते आए हैं। उम्मीद करेंगे कि कुछ महीने के फासले के बाद अब फिर वही पुराना काम करने लगेंगे, वे निराश होंगे। नाकामयाब भी होंगे। अब दुनिया पहले सरीखी नहीं रह जाने वाली है। लोगों को धर्म से लेकर आध्यात्म तक, अपनी पढ़ाई-लिखाई से लेकर कामकाज तक, दांतों को कुरेदकर पान-सुपारी निकालने की आदत छोड़कर, नाक-कान कुरेदने की आदत छोड़कर एक सावधानी बरतनी होगी। वरना दांत, नाक, कान वाला बदन ही नहीं बचेगा। लेकिन जो लोग नहीं बचेंगे वो तो फिर भी दिक्कत से दूर हो जाएंगे।

 

दिक्कत उनको अधिक होगी जो जिंदा रहेंगे, लेकिन काम का ढर्रा नहीं बदलेंगे। आज हिन्दुस्तान के कई राज्यों ने मजदूर कानूनों को बुलडोजर के नीचे कुचलकर चूर-चूर कर दिया है। अब 9 घंटे की शिफ्ट 12 घंटे हो गई, ओवरटाईम कहीं बाकी रहा, कहीं खत्म कर दिया गया। मजदूर विवादों का निपटारा अब संस्थान के भीतर कर दिया गया ताकि कोई लेबर कोर्ट न जा सके। पता नहीं ये सारे कानून, या ये तमाम फेरबदल सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचकर कायम रहेंगे या खारिज कर दिए जाएंगे, इन कानूनों से परे भी आज देश और दुनिया का कारोबारी माहौल यही रहने वाला है।

बाजार के हिसाब से अभी बुरा वक्त आया ही नहीं है जो कुछ बुरा होना है वह तकरीबन पूरे का पूरा बचा हुआ है और आगे आएगा। ऐसे वक्त में कारोबारियों को अपने धंधे के बारे में सोचना चाहिए कि वे सच में चलाने लायक हैं, या बंद कर देने के लायक हैं। उनमें काम करने वाले कर्मचारियों को यह सोचने की जरूरत है कि क्या वे सचमुच ही अपने संस्थान के लिए इतने अधिक उपयोगी हैं कि उनके बिना काम नहीं चल सकेगा, या उन्हें हटा देने से संस्थान पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।

आज मालिक से लेकर नौकर तक, स्वरोजगारी से लेकर मजदूर तक, हर किसी को अपने आपको बेहतर बनाने, अधिक उत्पादक बनाने, और भविष्य का थोड़ा अंदाज लगा लेने की जरूरत है। जो लोग ऐसा नहीं करेंगे वे महाराष्ट्र में पटरी पर सोए हुए मजदूरों की तरह रहेंगे जिनके ऊपर से वक्त की ट्रेन धड़धड़ाते हुए निकल जाएगी, और उन्हें पता ही नहीं चलेगा कि वे कब खत्म हो गए।

ऐसे माहौल में जो मजदूर देह की जमकर मेहनत करने के लिए तैयार रहेंगे, उन्हीं के बचने का आसार सबसे अधिक रहेगा। इंसानों में मजदूर, और बाकी प्राणियों में तिलचट्टा। तिलचट्टे के बारे में कहा जाता है कि वह किसी भी स्थिति में, कुछ भी खाकर जिंदा रह लेते हैं, यहां तक कि सीमेंट खाकर भी जिंदा रह लेते हैं। यह बात वैज्ञानिक सच है या नहीं, यह तो नहीं पता, लेकिन यह बात तय है कि हालात के मुताबिक अपने आपको ढाल लेना जरूरी है, और आज हर किसी को अपने हुनर को बेहतर बनाने के साथ-साथ हालात के मुताबिक अपने को ढाल भी लेना चाहिए क्योंकि बीते कल से कोई तुलना अब किसी काम नहीं आने वाली है।

यहां तक कि सरकार की अपनी ताकत भी इन दो महीनों में ही बुरी तरह चुक चुकी है। छत्तीसगढ़ ने अपने बजट को सीधा 30 फीसदी काट दिया है, और सरकारी विभागों को कहा है कि वे 70 फीसदी से अधिक का उपयोग नहीं कर पाएंगे। बजट में तीन फीसदी बढ़वाने के लिए मंत्री और अफसरों को जान लगा देनी पड़ती है, और अब बजट एकमुश्त 20 फीसदी कट गया।

देश की बड़ी-बड़ी कंपनियों ने अपने कर्मचारियों की तनख्वाह घटा दी है, कल ही एक दर्दनाक कार्टून कहीं छपा है कि घरेलू नौकर-नौकरानी मालिक की इमारत के सामने खड़े होकर खाली कटोरे बजा रहे हैं कि उनकी तनख्वाह दी जाए। अभी तक देश में कारोबार का एक बड़ा हिस्सा बंद है, इसलिए अभी मजदूर विवाद सामने नहीं आ पा रहे हैं, और आगे जाकर बहुत से राज्योंं में मजदूर कानून ऐसे होने वाले हैं कि विवाद सामने आ भी नहीं सकेंगे।

कोरोना की मार ने जितना इंसानों को मारा है, उससे कहीं अधिक कारोबार मारे हैं, मजदूर कानून मारे हैं। इस बदले हुए हालात को समझना इसलिए जरूरी है कि धरती पर एक वक्त चट्टान जैसी मजबूती और पहाड़ जैसे आकार वाले डायनासॉर हुआ करते थे। उनके बारे में यह धारणा प्रचलित है कि वे वक्त के साथ अपने को नहीं बदल पाए, इसलिए खत्म हो गए। आज छोटे-बड़े तमाम लोगों को डायनासॉर बनने से बचना चाहिए। महज मजदूर ही ऐसे रहेंगे जो किसी भी नौबत में जिंदा रह लेंगे।


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