अमेरिका तक पहुंचा धर्म का संक्रमण


हिंदुस्तान ही नहीं अमेरिका में भी धर्म के नाम पर वोट मांगे जाते हैं, कोरोना कॉल  में हम मंदिर बनाने में लगे हैं, तो अमेरिका में राष्ट्रपति पद के दावेदार मुस्लिमों को खुश करने में

पंकज मुकाती (राजनीतिक विश्लेषक )

शायद, पूरी दुनिया एक जैसी सोच रखती है। खासकर राजनेता और राजनीतिक दलों की सोच तो एक ही होती है। देश भले अमेरिका हो या हिंदुस्तान। राजनेता चुनाव के दौरान जाति,धर्म का मुखौटा पहन ही लेते हैं। विकास दूसरे नंबर पर आ जाता है। इससे नीचे भी हो सकता है।

पिछले पांच सालों में ये खूब देखा भी जा रहा है। दुनिया के सबसे विकासशील देश अमेरिका और हिंदुस्तान भी यहाँ एक सरीखे हैं। जब पूरा देश कोरोना की महामारी से लड़ रहा है, हिंदुस्तान में राम मंदिर के मुहूर्त निकाले जा रहें। प्रधानमंत्री को न्योता दिया जा रहा है। वे स्वीकार भी रहे है। सर्वाधिक संक्रमित अमेरिका राष्ट्रपति चुनाव की तैयारी में लगा है।

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के डेमोक्रेट उम्मीद्वार जो बिडेन मुस्लिमों को लुभाने में लगे हैं। अमेरिका की मुस्लिम संस्था के कार्यक्रम में जो बिडेन ने मुस्लिमों से अपील की है कि वे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को हराने में उनकी मदद करें। उन्होंने कहा कि अमेरिका के बड़े फैसलों में मुस्लिमों की राय को भी महत्त्व मिले, वे इसके विकास के आधार बने ऐसे मेरी मंशा है।

मुस्लिम देशों से आने वाले यात्रियों पर प्रतिबंध हटाने की भी वकालत भी की बिडेन ने। वे यहींनहीं रुके भारतीय राजनेताओं की तरह उन्होंने ऐसे प्रतिबन्ध को नीचता भी बताया। अमेरिका में नवंबर में चुनाव होने हैं। बिडेन के नीचता वाले शब्दों और धर्म विशेष के प्रति झुकाव ने हिंदुस्तान की याद दिला दी। हिंदुस्तान यूं ही बदनाम है, विकसित देश भी यही सब करते हैं।

ऐतिहासिक रूप से देखें तो यह पहली बार है कि डेमोक्रटिक पार्टी के किसी सदस्य ने इतना खुलकर मुस्लिम मतदाताओं का समर्थन किया है या मुस्लिम समूह के साथ सार्वजनिक तौर पर दिखाई दिए हैं। अमेरिका में ट्रम्प के पहले ऐसी राजनीति कभी नहीं रही। विदेश से आकर अमेरिका में बसे मतदाताओं को लुभाने, उनकी समस्याओं पर जरूर बात होती रही है। पर सीधे-सीधे धार्मिक तरीके से अमेरिका में ऐसा नहीं हुआ। हिंदुस्तान के धर्मांध नीति का मज़ाक बनाने वाले अमेरिका मैं भी
ट्रम्प के आने के बाद राजनीति में बड़े बदलाव आये हैं। शायद जैसे को तैसा का दौर है।

हिंदुस्तान में मंदिर की बहस छिड़ी हुई है। कई राज्यों में चुनाव होने हैं। मंदिर एक बड़ा जनभावना का मुद्दा है। सारे जरुरी मुद्दे भूलकर न्यूज़ चैनल से लेकर अख़बारों तक मंदिर ही बड़ी खबर है। जो बिडेन ने मुस्लिमों के लिए वोट मांगे। भारत में भी ऐसा ही एजेंडा है। एक पार्टी पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप है तो दूसरी पर सिर्फ हिन्दुओं के हिसाब से नीतियां बनाने का।

कुछ राजनेता तो सिर्फ किसी जाति, समुदाय या उसके एक हिस्से के भरोसे ही लगातार चुनाव जीतते आ रहे हैं। ये अलग बात है कि वे जातियां और समुदाय अभी तक विकास की तलाश में भटक रहे हैं। अमेरिका में बसे करीब 40 लाख हिन्दुस्तानियों को अपने प्रति समर्थन के लिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प भारत तक आ गए। नमस्ते ट्रम्प जैसे सरकारी आयोजन भी हुई। हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद को कट्टर दिखाने में कभी पीछे नहीं रहते। एक आयोजन में मोदी ने मंच पर मुस्लिम टोपी पहनने से इंकार कर दिया। खूब हल्ला मचा।पर वे कामयाब रहे सबसे बड़ी कौम को खुश करने में।

प्रधानमंत्री बनकर वे सारी धार्मिक रस्में निबाह रहे हैं। अजमेर शरीफ की दरगाह पर चादर भी भेजी
जा रही है। हिन्दुस्तान में विकास के नाम पर चुनाव लड़े गए। विकास से इंकार भी नहीं। खूब विकास हुआ। पर चुनाव के वक्त नेताओं को दुर्गा पूजा, छठ पूजा और रोजा इफ्तारी जैसे आयोजन और जुलूस की खूब याद आती है।

अमेरिका जो अब तक सिर्फ विकास पर वोट मांगता रहा,अब धर्म की राजनीतिकी तरफ बढ़ रहा है, और हिन्दुस्तान विकास की तरफ। दोनों तरफ मामला अभी आधा-आधा है। यानी चुनावी मैदान में दोनों एक सरीखे हैं।


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