केजरीवाल के कोरोना की तीसरी लहर के ट्वीट से सिंगापुर खफा, भारतीय विदेश मंत्री ने केजरीवाल को लिया आड़े हाथों, आखिर किसी मुख्यमंत्री
को ट्वीट तक की आज़ादी नहीं है क्या ?

सुनील कुमार (संपादक, डेली छत्तीसगढ़ )

 

करोना वैसे तो एक वायरस है, लेकिन यह भारत में कई चीजों को परखने के लिए एक बड़ी कसौटी की तरह भी सामने आया है, और इनमें से एक बात है केंद्र और राज्य के संबंध। बहुत से मामलों में केंद्र और राज्य के संबंध कोरोना ऐसे एक बार फिर चर्चा में आ रहे हैं और उनकी बारीकियों पर लोग बात कर रहे हैं।

अभी जब यह खबर आई कि सिंगापुर में कोरोना का एक कोई नया वेरिएंट आ गया है और वहां की स्कूलों को उसकी वजह से बंद किया जा रहा है, तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने ट्वीट करके कहा कि ‘सिंगापुर में आया कोरोना का नया रूप बच्चों के लिए बेहद ख़तरनाक बताया जा रहा है, भारत में ये तीसरी लहर के रूप में आ सकता है।

सिंगापुर से हिंदुस्तान की हवाई सेवा बंद कर देनी चाहिए’, इस बात को लेकर भारत के विदेश मंत्री केजरीवाल पर भड़क गए हैं और भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने यह कहा कि सिंगापुर सरकार ने वहां पर भारतीय उच्चायुक्त को बुलाकर दिल्ली के मुख्यमंत्री के ट्वीट पर नाराजगी जाहिर की है।

भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा है कि उन्होंने सिंगापुर सरकार को बताया कि अरविंद केजरीवाल कोरोना के वेरिएंट और सिविल एविएशन नीति पर बोलने का अधिकार नहीं रखते। यह बात विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने ट्विटर पर सार्वजनिक रूप से लिखी और सिंगापुर सरकार को अपनी कही हुई बात भी लिखी।

प्रवक्ता के ट्वीट को विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी रीट्वीट किया यानी वे भी इस बात से सहमत हैं. उन्होंने यह भी लिखा कि सिंगापुर और भारत कोरोना के खिलाफ लड़ाई में मजबूत साझेदार हैं और कोरोना के भारत को सामान की आवाजाही में मदद मिल रही है और सिंगापुर में अपने फौजी विमान भी भारत भेजे हैं जिससे पता चलता है कि हमारे संबंध कितने खास हैं।

जयशंकर ने यह भी लिखा है कि गैर जिम्मेदार बयान देने वालों को पता होना चाहिए कि उनकी इस तरह की टिप्पणी से लंबे समय की साझेदारी वाली दोस्ती को नुकसान पहुंच सकता है. उन्होंने कहा कि वे यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि दिल्ली के मुख्यमंत्री का बयान भारत का बयान नहीं है।

आज कोरोना ने ही यह नौबत ला दी है कि भारत में केंद्र और राज्य के संबंध इस तरह से सोशल मीडिया पर खुलासे कर रहे हैं और विदेश मंत्रालय का एक प्रवक्ता भारत के एक निर्वाचित मुख्यमंत्री की इस तरह से खुली आलोचना कर रहा है।

यह आलोचना उसी सरकार का प्रवक्ता कर रहा है जिस सरकार ने अभी कुछ हफ्ते पहले प्रधानमंत्री के साथ एक बैठक में केजरीवाल द्वारा प्रोटोकॉल तोड़ने की तोहमत लगाते हुए उनकी जमकर आलोचना की थी. सरकारों के बीच के प्रोटोकॉल में यह बात भी शामिल है कि एक निर्वाचित प्रतिनिधि के खिलाफ किसी सरकार का एक अफसर या प्रवक्ता इस तरह का कोई बयान ना दे।

 

अब हम मुद्दे की बात पर आएं क्योंकि प्रोटोकॉल तो दूसरे दर्जे की बात है, और उसे निभाना या न निभाना लोगों की अपनी सभ्यता, या शिष्टाचार की उनकी समझ पर भी निर्भर करता है। आज बात जरूरी यह है कि देश की राजधानी का मुख्यमंत्री इस तरह का कोई बयान देने का अधिकार रखता है, या नहीं रखता है?

यह बात बहुत साफ है कि विदेशों से आने वाले लोगों से हिंदुस्तान में कोरोना की मार उन शहरों या प्रदेशों पर अधिक हुई जहां पर अंतरराष्ट्रीय उड़ानें आती हैं। दिल्ली में कोरोना की हालत पर केंद्र सरकार की सत्तारूढ़ पार्टी और केंद्र सरकार के मंत्री लगातार केजरीवाल सरकार पर हमले करते हैं।

कांग्रेस पार्टी भी केजरीवाल पर कोरोना की बदइंतजामी की तोहमत लगाती है । ऐसे में क्या एक राज्य के मुख्यमंत्री को अपने राज्य को किसी देश से आने वाले खतरे के बारे में चर्चा करने का अधिकार भी नहीं है? केजरीवाल ने सिंगापुर के साथ संबंध तोड़ने की बात नहीं कही है, केजरीवाल ने महज सिंगापुर से उड़ानों का आना रोकने के लिए कहा है, जो कि किसी भी एक राज्य के मुख्यमंत्री का अपना अधिकार है।

 

इस बात को सिंगापुर के खिलाफ मानकर और एक मित्र राष्ट्र से संबंध खराब होने का खतरा मानकर जिस तरह से केंद्र सरकार का विदेश मंत्रालय केजरीवाल पर झपटा है वह पूरी तरह नाजायज बात है। आज पूरी दुनिया के देश जिन देशों से आने वाले लोगों को लेकर उन्हें खतरा लगता है, उनकी उड़ानें रोक रहे हैं. खुद हिंदुस्तान से आज बहुत से देशों देशों के लिए उड़ानें नहीं जा सकतीं।

ऐसे में अगर भारत का एक निर्वाचित मुख्यमंत्री केंद्र सरकार से यह मांग कर रहा है तो यह मांग पूरी तरह से घरेलू मांग है, और उसे सार्वजनिक रूप से भी इस बात को कहने का हक है। केजरीवाल ने यह बात सिंगापुर सरकार से नहीं कही है कि यह विदेश नीति में दखल मानी जाए. यह बात एक राज्य ने केंद्र सरकार से कही है जिसे कि उसका पूरा हक है।

इसके पहले भी तमिलनाडु के बहुत से मुख्यमंत्री श्रीलंका के तमिलों को लेकर भारत सरकार से कई किस्मों की पहल करने की मांग करते रहे हैं जो कि इसके मुकाबले कई गुना अधिक गंभीर दखल थी, लेकिन भारत के किसी राज्य को केंद्र सरकार के सामने अपनी सोच रखने का हक है।

कश्मीर और पंजाब के कितने ही मुख्यमंत्री समय-समय पर भारत सरकार से पाकिस्तान को लेकर तरह-तरह की बात रखते आए हैं। आज केंद्र में जिस एनडीए की सरकार है, उसी एनडीए की सरकार जब कश्मीर में भी थी, तब उस सरकार की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने कई बार पाकिस्तान से बातचीत करने की सलाह भारत सरकार को दी थी ।

वह तो सीधे-सीधे भारत सरकार की विदेश नीति को लेकर एक सलाह थी वह तो किसी महामारी के खतरे को घटाने के लिए नहीं थी। आज तो केजरीवाल की यह राय महामारी के खतरे को देखते हुए है.

दिल्ली आज हिंदुस्तान में सबसे खतरनाक जगह बनी हुई है, ऐसे में अगर केजरीवाल ने एक बहुत जायज सी वजह से यह मांग की है तो भारत सरकार को इतनी समझ होनी चाहिए कि वह सिंगापुर को यह समझा सके कि भारत के संघीय ढांचे में अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग विचारधाराओं की सरकारें हैं, और वहां के मुख्यमंत्रियों को, वहां की निर्वाचित सरकारों को, अपनी-अपनी राय सामने रखने का अधिकार है, लेकिन उस पर अंतिम फैसला लेने और विदेश नीति के हिसाब से देश की प्रतिरक्षा नीति के हिसाब से कुछ तय करने का अधिकार भारत सरकार को ही है।

यह पूरी तरह से भारत का एक घरेलू मामला है और सिंगापुर भी इस बात को अच्छी तरह जानता है कि भारत का एक प्रदेश किसी देश से आने वाली उड़ानों को नहीं रोक सकता। ऐसे में उसकी प्रतिक्रिया भी भारत सरकार से बंद कमरे की प्रतिक्रिया होनी चाहिए थी और उस बात को खुद भारत सरकार का विदेश मंत्रालय जिस तरह खुलासे के साथ, जिस अंदाज़ में लोगों के सामने रख रहा है, और सरकार का एक नौकरीपेशा प्रवक्ता एक निर्वाचित मुख्यमंत्री के लिए अपमानजनक बात कह रहा है, वह अधिक खराब बात है।

हमारा मानना है कि केजरीवाल को अपने प्रदेश को महामारी से बचाने के लिए ऐसी राय अपने देश की सरकार को देने का पूरा हक है। अगर केजरीवाल ने यह बात सिंगापुर को लिखी होती तो उस पर कोई आपत्ति हो सकती थी। केंद्र में सत्तारूढ़ गठबंधन का अगर केजरीवाल सरकार से कोई राजनीतिक हिसाब चुकता करना है, तो वह विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता के मार्फत नहीं होना चाहिए, सिंगापुर के रास्ते नहीं होना चाहिए ।

 

भारत की सत्तारूढ़ भाजपा ही केजरीवाल की मांग का जवाब दे सकती थी. केंद्र सरकार के विदेश मंत्रालय का ऐसा रुख भारत की मौजूदा केंद्र सरकार के मन में राज्यों के लिए हिकारत का एक सुबूत है। किसी भी जिम्मेदार केंद्र सरकार को इससे बचना चाहिए।

 

 

 


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