प्रवीण कक्कड़ को कांग्रेस में बड़ी जिम्मेदारी

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चुनावी रणनीति और प्रबंधन में माहिर कक्कड़
को कमलनाथ ने दी ख़ास तवज्जो

.मध्यप्रदेश में कमलनाथ के कमान संभालते ही कांग्रेस में सक्रियता दिखने लगी है. विधानसभा चुनाव के लिए मंगलवार को घोषित समितियों ने इसे साबित किया. सभी बड़े नेताओं को उनकी योग्यता और अनुभव के हिसाब से जिम्मेदारी सौपी गई है. इसी क्रम में कमलनाथ ने पूर्व पुलिस अफसर प्रवीण कक्कड़ को भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है. इस नियुक्ति ने ये साबित किया कि कांग्रेस इस बार चुनाव में काबिल लोगों को जोड़ेगी प्रवीण कक्कड़ को चुनाव प्रबंधन और रणनीति की समिति में शामिल किया गया है. इस समिति का नेतृत्व पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचौरी के हाथ में है.
प्रवीण कक्कड़ ने 2004 में पुलिस की नौकरी से इस्तीफा दिया. उसके बाद से वे पुर्व केंद्रीय मंत्री कांतिलाल भूरिया के ओ एस डी की जिम्मेदारी संभालते रहे. राजनीति में रहकर भी राजनीति से दूर रहना कक्कड़ की खूबी है. यही कारण है कि वे सबके दोस्त है. शांत रहकर अपने काम को अंजाम देना उनकी आदत है. राजनीति खासकर चुनावी गणित की उन्हें बेहद मजबूत पकड़ है. वे चुपचाप राजनीतिक बदलावों पर नजर रखते है, नेताओं की कमियों और खूबियों को पढ़ने में भी वे माहिर है

प्रवीण कक्कड़ की रणनीति का ही कमाल रहा है कि 2015 में झाबुआ-रतलाम सीट के उपचुनाव में कांतिलाल भूरिया जीतकर आये. मोदी लहर के दौर में उस सीट को निकालना आसान नहीं था कांतिलाल भूरिया का भी पूरा भरोसा प्रवीण कक्कड़ पर रहा है. यही कारण है कि भूरिया ने उन्हें हमेशा फ्री हैंड दिया। कमलनाथ के बारे में कहा जाता है कि वे आदमी की काबिलियत पढ़ने का विशेष गुर जानते हैं. ये कमलनाथ की ही खूबी है कि उन्होंने प्रवीण कक्कड़ की चुनावी रणनीति और प्रबंधन को समझा और उन्हें ये बड़ी जिम्मेदारी सौपीं. कक्कड़ मिलनसारिता और एकजुटता से काम करने और करवाने का गुण बखूबी जानते हैं, ऐसे में वे यहां भी सफल होंगे. कांतिलाल भूरिया के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहते वे चुनाव प्रबंधन और रणनीति का काम संभालते रहे हैं. उनका वो कार्यकाल आज भी सराहा जाता है.श्री प्रवीण कक्कड़ केंद्रीय कृषि, उपभोक्ता मामलों एवं आदिवासी मामलों के मंत्रालय में कार्य करने का अनुभव भी रखते हैं. साथ ही मालवा-निमाड़ और दलित आदिवासी सीटों के नेताओं और कार्यकर्ताओं के बीच जेंटलमैन के तौर पर पहचाने जाते हैं. करीब सौ से ज्यादा ऐसी सीटों के पिछले चुनावों के रिकॉर्ड और हार-जीत के समीकरण उन्हें जुबानी याद हैं. इन सीटों पर उनका जीवंत संपर्क भी हैं.

 


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